जिन्दगी से हारकर भी बोर्ड और दिल की परीक्षा में अव्वल आ गया नीलेश

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कोलकाता : जीवन बहुत विचित्र है…और नियति आँखों में एक साथ आँसू और हँसी, दोनों ला सकती है। एक ऐसा मेधावी छात्र जिसे कैंसर ने छीन लिया हो और उसके जाने के बाद जब यह पता चले कि उसने अपनी दसवीं की बोर्ड परीक्षा 91 प्रतिशत अंकों के साथ पास कर ली….कल्पना कीजिए कि उस माता – पिता, स्कूल और खुद उसके दोस्तों पर क्या गुजरेगी। यह हृदयविदारक घटना इसी शहर की है। हम बात कर रहे हैं आर्मी पब्लिक स्कूल बैरकपुर के एक मेधावी छात्र नीलेश सरकार की। नीलेश ने बेहद चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में 2020 में अपनी कक्षा 10 बी बोर्ड परीक्षा (सीबीएसई) की परीक्षा दी और 91 प्रतिशत अंक बटोरे। उनका जन्म 16 अक्टूबर 2001 और बैरकपुर के निवासी के रूप में हुआ था। उनके पिता का नाम भास्कर सरकार और माता का नाम पियाली सरकार है।


वह साल 2017 था जब पता चला कि नीलेश को ओस्टियोसारकोमा है और बीमारी बेहद चरम स्थिति में पहुँच चुकी है। उसका इलाज सी•एम•सी• वेल्लोर में चल रहा था जहाँ उसकी कई सर्जरी हुई और जानलेवा समस्याओं का सामना करना पड़ा। साल 2018 में उसका दाहिना पैर 2018 में काट देना पड़ा और वह उस साल अपनी बोर्ड परीक्षा नहीं दे सका। 2019 में, उसने स्कूल जाना शुरू जरूर किया लेकिन नियमित रूप से स्कूल नहीं जा सका। उसे पढ़ाई को लेकर सामंजस्य बैठाना और नजर रखना कठिन लगने लगा था। महज 1 -2 एक या दो महीने में ही कैंसर उसके दूसरे अंगों मसलन फेफड़े में फैलने लगा । वह जनवरी 2020 में सर्जरी से गुजरा मगर यह सर्जरी असफल रही। नीलेश की जबरदस्त लगन और इच्छाशक्ति को देखते हुए उसे 16वीं फरवरी 2020 को बैरकपुर लाया गया।

उनकी बोर्ड परीक्षा 20 फरवरी से शुरू हुई और 18 मार्च 2020 को समाप्त हो गयी । नीलेश ने 22 अप्रैल 2020 को अपनी बीमारी के कारण दम तोड़ दिया और अब नतीजे निकले तो पता चला है कि नीलेश को 91% अंक मिले हैं।
नीलेश शख्सियत नहीं बल्कि एक असीम सहनशक्ति से भरी प्रेरणा था। वह सिर्फ पढ़ाई में ही अच्छा नहीं था बल्कि उसे फुटबॉल, फोटोग्राफी और लेखन भी पसन्द था। वह विचारक था, कई उद्धरण उसने लिखे हैं। उसने पेंसिल स्केचिंग की और गिटार भी बजाया करता था । वह ट्रेकिंग भी करता था। उसके द्वारा लिखे गये अद्भुत उद्धरण उसकी अंतर्निहित मानसिक क्षमता और शक्ति को प्रकट करते हैं।


वह अपनी आंतरिक प्रेरणा को विकसित करने पर ध्यान केंद्रित करता था। उसने उस विषय पर शोध किया,जिसने उसे गंभीर रूप से सोचने को प्रेरित किया। वह खूब पढ़ता औऱ उत्साह के साथ पढ़ता। उसे क्रिकेट और फुटबॉल मैच देखना बहुत पसंद था। वह कड़ी मेहनत में विश्वास करता था और सबसे अच्छी बात कि वह खुद पर विश्वास करता था।
स्वभाव से बहुत दयालु और विनम्र था वह. सबके लिए उसके दिल में प्यार था। जीवन ऊर्जा औऱ दृढ़ संकल्प शक्ति विद्यार्थियों के लिए ही नहीं, सबके लिए एक प्रेरणा है। उसके चेहरे पर हमेशा मुस्कान रहती थी।

उसकी आकांक्षा: उसके अंतिम लेखन में दिखती है, “मैं कौन हूं?” उसने उल्लेख किया, “मैं नीलेश हूं और मैं बी•ई• बनना चाहता हूं।”
उसका पसंदीदा स्वरचित उद्धरण है –
“जीवन मुझे मेरे घुटनों तक हरा सकता है, यह मुझे मजबूत बनाता गया है।”
“आप विरासत का निर्माण करते हैं, केवल तभी जब आप एक निरपेक्ष शून्य से गुज़रे हो।”
और बहुत से, हर कोई एक-दूसरे से बेहतर है ………नीलेश गया नहीं…वह यहीं हैं…प्रेरणा में…।

  • प्रस्तुति – निखिता पांडेय

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