जीने का अधिकार रखती हूँ

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  • टिना लामा

“जीने का अधिकार सबको है आज”
रोज सुबह उठकर
मेरा खुद से ही संघर्ष होता हैं
कैसे कटेगा दिन
यह सोच मन झंझोड़ लेता हैं
क्यों मुश्किल हो जाता हैं
अपने अरमान पूरे करना?
कचोट लेता हैं मन
क्या स्वीकार करेगा
यह समाज मेरा कहना?
कहता हैं समाज
जीने का अधिकार सबको हैं आज
फिर क्यों सुनाता हैं समाज
हमें ताने बार बार और करता हैं
हमसे भेदभाव का व्यापार
क्यों काबिलियत को
लिंग के नाम पर तोला जाता हैं
सड़को पर निकलते ही
देखा जाता हैं घृणित भाव से
हाँ किन्नर हूं मैं
जिसे जिंदगी जीने से रोका जाता हैं
बुलाते हमें हिजड़ा,
किन्नर,छक्का और भी नामों से
पर क्यों भूल जाता है समाज
शिव का आधा रूप
हैं हम अब भी आज
मुश्किलों से डर कर पीछे हट जाए
यह हमारी चाह नहीं
कोशिश करके पाऐंगे
एक न एक दिन मंजिल सही
यही सोच कर अपने पंखों को उड़ान देती हूँ
किन्नर हूँ तो क्या
इंसान हूँ मैं
ज़िंदगी जीने का अधिकार रखती हूँ !

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