‘जुगल प्रिया’ बन चित्त चातक स्याम स्वाँती मेहु’

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प्रो. गीता दूबे

सभी सखियों को नमस्कार। सखियों, आज मैं आपका परिचय मध्यकालीन कवयित्री जुगलप्रिया से करवाऊंगी। जुगलप्रिया का संबंध बुंदेलखंड के जगत प्रसिद्ध ओरक्षा राज्य से है। कालांतर में वहाँ के राजा ने अपनी राजधानी टीकमगढ़ में स्थापित कर दी। यहीं राजा महेन्द्र प्रताप सिंह जू देव बहादुर एवं रानी वृषभानु कुंवरि के घर 1871 में कमल कुमारी देवी का जन्म हुआ था जो जुगलप्रिया नाम से जानी गईं। माता वृषभानु कुंवरि देवी राम की अनन्य भक्त थीं। स्वप्न में श्रीराम का आदेश पाकर अयोध्या का कनक भवन इन्हीं ने बनवाया था। माता से भक्ति का संस्कार सहजता से पुत्री में गया। वह भी माता के साथ पूजा- पाठ, व्रत- उपवास आदि नियमपूर्वक किया करती थीं। इनका विवाह छतरपुर राज्य के राजा श्रीमान विश्वनाथ सिंह जू देव के साथ हुआ। संसार धर्म ने इनकी भक्तिधारा को बाधित नहीं किया बल्कि उत्तरोत्तर वह और प्रगाढ़ होती गई। पहले उन्होंने अयोध्या के वैष्णव संप्रदाय में दीक्षा ली और बाद में वह वृंदावन में श्रीकृष्ण भक्ति में डूब गईं। शंकर सम्प्रदाय का भी इनपर प्रभाव था। उदार ह्रदय जुगलप्रिया सभी भक्ति संप्रदायों के प्रति श्रद्धा भाव रखती थीं। कहा जाता है कि उन्होंने इन संप्रदायों के सिद्धांतों का गहन अध्ययन किया था। बड़े- बड़े विद्वान भी उनके ज्ञान और भक्ति के समक्ष सिर झुकाते थे। उन्हें “चार संप्रदाय का महंत” कहा जाता था।
जुगलप्रिया के जीवन का अधिकांश समय भगवद्भजन, साधु सेवा और तीर्थाटन में बीता। बेहद सादगीपूर्ण जीवन जीते हुए तमाम सांसारिक मोह को तिलांजलि देकर उन्होंने अपना जीवन ईश- सेवा को समर्पित कर दिया था और भक्तिभाव में डूबकर उन्होंने काव्य रचना की। रीतिकाल के अंतिम चरण में सक्रिय कवयित्री जुगलप्रिया ने ईश्वरीय प्रेम डूबकर जिन पदों का सृजन किया उनमें भक्ति और नीति के साथ शृंगार का चित्रण भी हुआ है। आलोचकों का मानना है कि उनका शृंगार चित्रण अत्यंत संयत और मर्यादित था। वह अपने पदों में जुगलप्रिया उपनाम लिखा करती थीं और इसी नाम से वह साहित्य जगत में परिचित हुईं। श्री वियोगी हरि जो उनके शिष्य थे, ने उनके पदों का संग्रह “जुगलप्रिया-पदावली” नाम से प्रकाशित करवाया। उनके पदों में प्रेमविह्वलता के साथ ईश्वरीय ‌स्वरूप का मनोहर वर्णन हुआ है। प्रस्तुत पद में कृष्ण के मनोहर रूप का सरस वर्णन है-
“जुगल छवि कब नैनन में आवै

मोर मुकुट की लटक चन्द्रिका सटकारो लट भावै

नर गुंजा गजरा फूलन के फूल से बैन सुनावै

नील दुकूल पीत पट भूषण मन भावन दरसावै

कटि किंकिनि कंकण कर कमलनि वचनित मधुर छवि छाबै

‘जुगलप्रिया’ पद-पदुम परसि कै अनल नहीं सचुपावैं ”
कृष्ण के प्रति उनकी प्रगाढ़ भक्ति उनके पदों में एक प्रेयसी की प्रतीक्षा, याचना और मिलन की आकांक्षा के रूप में मार्मिकता के साथ व्यंजित हुई है। साथ ही माधुर्य भाव की भक्ति का वह उपालंभ भाव भी सहजता से लक्षित किया जा सकता है जिसके तहत भक्त कवयित्री अपने आराध्य पर व्यंग या दोषारोपण करने से भी नहीं चूकती। प्रस्तुत पद में कवयित्री कृष्ण को झूठा तक कह जाती हैं क्योंकि वह जुगलप्रिया की मनोवांछा की पूर्ति नहीं कर रहे हैं। शिकवा- शिकायत की नोंक-झोंक ने पद को सरसता से भर दिया है-
“नाथ अनाथन की सब जानै

ठाढ़ी द्वार पुकार करति हौं श्रवन सुनत नहिं कहा रिसानै

की बहु खोट जानि जिय मेरी की कछु स्वारथ हित अरगानै

दीन बन्धु मनसा के दाता गुन औगुन कैधो मन आनै

आप एक हम पतित अनेकन यही देखि का मन सकुचानै

झूँठो अपनो नाम धरायो समझ रहे हैं हमहि सयानै

तजो टेक मनमोहन मेरो ‘जुगलप्रिया’ दीजै रस दानै।”
भक्ति की माधुरी में आपाद मस्तक आप्लावित कवयित्री प्रिय के विरह में वियोगिनी नायिका की भांति व्याकुल हो उठती है और अपने ह्रदय की छटपटाहट या तड़प को कविता में इस तरह उड़ेल देती है-
“सखी मेरी नैनन नींद दुरी

पिय सो नहि मेरो बस कछु री

तलफि तलफि यों ही निसि बीतति नीर बिना मछुरी

उड़ि उड़ि जात प्रान पंछी तहँ बजत जहाँ बसुरी

‘जुगलप्रिया’ पिया कैसे पाऊँ प्रगट सुप्रीति जुरी।”
कृष्ण प्रेम में डूबी जुगलप्रिया ब्रजमंडल में कृष्ण जन्म के अवसर पर होनेवाले उत्सव और ब्रजवासियों के आनंदोल्लास का अत्यंत प्राणवंत वर्णन करती है। काव्य- कला का उत्कृष्ट प्रमाण भी इनके पदों में मिलता है‌। अलंकारों का कुशल प्रयोग और भाषा का प्रवाह पदों को सहज ग्राह्य बना देता है। प्रस्तुत पद को पढ़ते हुए पाठकों का मन आनंद- सागर में अवगाहन करता है। ब्रजमंडल में होनेवाली अमृत वर्षा पाठकों के ह्रदय को भी रससिक्त कर देती है-
“ब्रजमंडल अमरत बरसै री।
जसुदानंदन गोप-गोपिन को सुख सोहाग उपजै सरसै री॥
बाढ़ी लहर अंग-अंगन में जमुना तीर नीर उछरै री।
बरसत कुसुम देव अंबरतें सुरतिय दरसन हित तरसै री॥
कदलौ बंदनवार बंधाये तोरन धुज सौथिया दरसै री।
हरद दूब दधि रोचन साजै मंगल कलस देख हरसै री॥
नाचै गावै रंग बढ़ावै जो जाके मन में भावै री।
शुभ सहनाई बजत रात-दिन चहुँदिसि आनंदघन छावै री॥
ढाढ़ी ढाढ़िन नाचि रिझावै जो चाहे जो, सो पावै री।
पलना ललना झूल रही है जसुदा मंगल गुन गावै री॥
करै निछाबर तन मन सरबस जो ब्रजनंदन को जावै री।
जुगल प्रिया यह नंद महोत्सव दिन प्रति वा ब्रज में होवै री॥”
भक्ति मार्ग पर चलने के लिए मन की स्थिरता और ह्रदय की एकाग्रता आवश्यक है। कवयित्री अपने मन को एकाग्र भाव से भक्ति भाव में लीन करने हेतु अपने नेत्रों से चंचलता का त्याग करने का आग्रह करती हैं। चातक और चकोर के एकनिष्ठ प्रेम का दृष्टांत देती हुई वह उन्हीं के आदर्श को अपने जीवन में उतारना चाहती हैं-
“दृग तुम चपलता तजि देहु।
गुंजरहु चरनार विंदनि होय मधुप सनेहु॥
दसहुँ दिसि जित तित फिरहु किन सकल जग रस लेहु।
पै न मिलि है अमित सुख कहुं जो मिलै या गेहु॥
गहौ प्रीति प्रतीत दृढ़ ज्यों रटत चातक मेहु।

बनो चारु चकोर पिय मुख-चंद छवि रस एहु॥”
मन की शुद्धि भी भक्ति भाव के लिए अति आवश्यक है। पूरे भक्तिकाव्य में बार- बार मन और ह्रदय की शुद्धि पर बल दिया गया है। जुगलप्रिया भी मन को मांजने पर बल देती हुई उसे मलिनता से दूर ले जाकर कृष्ण की भक्ति में डुबो देना चाहती हैं-
“मन तुम मलिनता तजि देहु।
सरन गहु गोविंद की अब करत कासो नेहु॥
कौन अपने आप काके परे माया सेहु।
आज दिन लौं कहा पायो कहा पैहौ खेहु॥
विपिन वृंदा वास करु जो सब सुखनि को गेहु।
नाम मुख मे ध्यान हिय मे नैन दरसन लेहु॥
छाँड़ि कपट कलंक जग में सार साँचो एहु।
‘जुगल प्रिया’ बन चित्त चातक स्याम स्वाँती मेहु॥”
भक्ति के पावन और कठिन राह को बहुत से पाखंडी अपने दुष्कर्मों से दूषित करने से नहीं चूकते। कवयित्री इन छद्मवेशी बगुला भगतों से सावधान रहने की सलाह भी देती हैं-
“बगुला भक्तन सों डरिये री।
इक पग ठाढ़े ध्यान धरत है दीन मीन लौं किमि बचिए री।
ऊपरते उज्जल रंग दीखत हिये कपट हिंसक लखिये री॥
इतने दूर ही रहे भलाई निकट गये फंदनि फँसिये री।
जुगल प्रिया मायावी पूरे भूलि न इन संग पल बसिए री॥”
सांसारिक माया मोह से बचकर ईश्वर के चरणों की भक्ति में समर्पण की बात सभी कवियों ने बार- बार की है। कवयित्री जुगलप्रिया भी इस नश्वर संसार की असारता की ओर संकेत करती हुई कृष्ण की भक्ति में लीन हो जाना चाहती हैं-
“यह तन इक दिन होय जु छारा।
नाम, निशान न रहि है रंचहु भूलि जायगो सब संसारा।
काल घरी पूजी जब हू है लगै न छोड़त भ्रम जारा॥
या माया नरिन के बस में भूलि गयौ सुखसिंधु अपारा।
जुगल प्रिया अजहूँ किन चेतत मिलि हैं प्रीतम प्यारा॥”
जुगलप्रिया ने एक आदर्श भक्त की तरह राजसी सुख और वैभव का त्याग कर बहुत ही सादगीपूर्ण जीवन जीते हुए भक्त जनों के बीच अपना अन्यतम स्थान बनाया। उनकी जीवनयात्रा बहुत लंबी नहीं रही। तकरीबन पचास वर्ष की उम्र में 1921 में इनका निधन हुआ। उनकी रचनाओं में भक्ति, नीति और शृंगार की अद्भुत त्रिवेणी प्रवाहित होती है। भक्तिकाव्य के प्रमुख पूर्ववर्ती कवियों से प्रभाव ग्रहण करने के बावजूद भावाभिव्यक्ति की उनकी अपनी शैली है। उनके पदों में एक सहज -स्वाभाविक सौंदर्य है जो अपनी कलात्मकता, मार्मिकता और सरसता के कारण अपनी अलग छाप छोड़ने में सफल होते हैं।

 

 

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