जुर्म इन्सान ने किया है, वक्त को दोष मत दीजिए, तारीखें गुनाह नहीं करतीं

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नया साल आ गया मगर गुजरे हुए साल के प्रति नाराजगी कम नहीं हो रही है। कोविड -19 ने सब कुछ अस्त – व्यस्त कर दिया और नये साल का जश्न भी तो ठीक से नहीं मन पाया। लोग दुआ कर रहे हैं कि ऐसा साल फिर न आये। यहाँ तक कि नये साल पर भेजे जाने वाले शुभकामना सन्देशों में भी 2020 को गालियाँ ही पड़ रही हैं…लेकिन सोचिए तो क्या वाकई कोई तारीख किसी बात की जिम्मेदार है…इन्सान की फितरत अजीब है…वह अपनी गलतियों का ठीकरा फोड़ने के लिए कोई न कोई कंधा तलाश ही लेता है। कोविड -19 का जिम्मेदार वक्त तो था नहीं….हमारी और आपकी गलतियाँ थीं। प्रकृति का दोहन समय नहीं कर रहा था…कोई कैलेंडर नदियों में कचरा नहीं डाल रहा था…कोई तारीख जंगल नहीं काट रही थी तो जो हुआ, वह तो होना ही था.. 2020 में नहीं होता तो 10 या 20 साल बाद होता मगर होता तो जरूर….। अब इस लिहाज से सोचिए तो क्या प्रकृति ने यह महामारी देकर हमको सोचने पर क्या मजबूर नहीं किया..।
यह सही है कि महामारी ने विनाश किया….मगर हमें एक बार मनुष्य बनने का मौका भी दिया है। भागती – दौड़ती जिन्दगी की रफ्तार पर जब रोक लगी तो चैन की साँस आपने भी ली है। जिनके चेहरे देखने को तरस जाया करते थे, वह चेहरे आपने देखे। आत्मनिर्भरता की ओर सबका ध्यान गया, स्थानीय बाजार और उत्पादों का महत्व समझ में आया। ये समझ में आया कि जिनको हम कुछ नहीं समझते,,,उनके बगैर जिन्दगी कितनी मुश्किल है। इस लॉकडाउन ने चेहरों से जब नकाब उतारे तो जो मोहभंग हुआ, उसने कदमों और इच्छा शक्ति को मजबूत किया….आप अब समझ सकते हैं कि कौन आपके साथ है और कौन नहीं…ईश्वर को धन्यवाद कहिए क्योंकि ये सृष्टि मनुष्य की नहीं, उसकी है…और वह बेहतर जानता है कि अपनी सृष्टि का ख्याल कैसे रखेगा…तभी तो उसने इन्सानों को बंद किया…जिससे प्रकृति खुलकर साँस ले सके, तभी तो विलुप्त प्राणी भी अचानक आ गये…सड़कों पर मोर दिखे और खिड़की से बर्फीली चोटियाँ। नदियाँ थोड़ी साफ हुईं और वायुमण्डल के छेद थोड़े कम हुए…याद कीजिए क्योंकि तारीखें कभी गुनाह नहीं करती, जुर्म इन्सान करता है वक्त नहीं। नये साल पर थोड़ी सी समझ और विस्तार पाए। इन शुभकामनाओं के साथ नये साल की खूब बधाई।

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