ढाई अक्षर प्रेम’ के….

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बलवंत सिंह गौतम 
प्रेम! क्या कहूँ। कैसे कहूँ। किस रूप में कहूँ। प्रेम की कोई व्याख्या नहीं कोई परिभाषा नहीं। प्रेम एक एहसास हैं जो ह्रदय को ख़ुशियों से भर देता हैं ।प्रेम से भक्ति-भावना जाग्रत होती है और एक अलौकिक शक्ति भी मिलती हैं । प्रेम ही आत्मा हैं, और परमात्मा हैं। प्रेम शाश्वत सत्य हैं, सनातन हैं, प्रेम ही दिव्य रस हैं। प्रेम तो एक लगाव हैं, ईश्वरीय अनुभूति हैं।प्रेम एक ऐसा मंदिर हैं, जिसके अनेक पुजारी हैं।जिसके पूजने के तरीके, विधियाँ अलग अलग हैं। प्रेम ही सच्चा जीवन हैं। ‘दो ’ अक्षर की मौत और ‘तीन’ अक्षर के जीवन में हम ढाई अक्षर के ‘प्रेम’ के चारों तरफ ही तो घूम रहे हैं। प्रेम की नमी की कमी हो तो ज़िंदगी के खेत में उत्तम बीज पड़ने पर भी कुछ नहीं उगता। प्रेम ही सार तत्व है। यदि किसी ने सच्चा प्रेम पा लिया या महसूस कर लिया अथवा इसकी बारीकियों को समझ लिया तो मानो उसका जीवन धन्य हो गया। प्रेम एक हैं पर उसके स्वरूप अनेक हैं ! प्रेम केवल स्त्री-पुरुष के संबंधों तक सीमित नहीं हैं। प्रेम स्त्री-पुरुष के मध्य होने वाले स्वाभाविक आकर्षण मात्र नहीं हैं। यदि ऐसा हैं तो वो प्रेम एक आसक्ति मात्र हैं और आसक्ति केवल स्वंय के स्वार्थसिद्धि की ही पूरक होती हैं । भारत में प्रेम की परिभाषा विराट हैं, अनंत हैं। भगवान -भक्त, माता-पिता,भाई-बहन, पुत्र-पुत्री, मित्र-बन्धु, गुरु-शिष्य,पति-भार्या, प्रेमी-प्रेमिका ! पर सबसे ऊपर हैं देशप्रेम ! राष्ट्र प्रेम से बढ़कर कुछ हो ही नहीं सकता हैं। सच्चा प्रेम हमें स्वर्गीय अनुभूति प्रदान करता हैं। भारतीय संस्कृति में सच्चे प्रेम का वास्तविक अर्थ व्यापकता के साथ बताया गया हैं। कभी श्रवण कुमार के माँ-बाप की सेवा की कथाओं में, कभी महाकवि विद्यापति के मां गंगे की भक्ति में, कभी महादेवी वर्मा के पशु पक्षियों से लगाव में, कभी हरिप्रसाद की बांसुरी में, तो कभी दशरथ माँझी के संकल्प में, कभी भरत की भातृ प्रेम में, कभी राधा की चाहत में, कभी मीरा के इंतज़ार में,कभी अहिल्या के उद्धार में, कभी रुक्मिणी के समर्पण में, तो कभी शबरी के जूठे बैर अर्पण में हमें निःस्वार्थ प्रेम की झलक मिलती हैं । हम भारतीय का प्रेम अनोखा हैं, निराला हैं। हर एक मानव से प्रेम, प्रकृति से प्रेम, वन सम्पति से प्रेम, जल, थल, नभ के सभी जीवों से प्रेम जग ज़ाहिर हैं । प्रेम तो भारत के पेड़-पौधों में, पशु पक्षियों में, नदियों में, पहाड़ों में, वादियों में, हवाओं में भारत की प्रकृति के कण – कण में हैं।सिर्फ इसे महसूस करने की जरूरत हैं ।लेकिन आज मानवीय स्वार्थ के वशीभूत होकर हम प्राकृतिक संरचना के साथ छेड़छाड़ करने से भी नहीं हिचकते। प्रकृति से प्रतिस्पर्धा की बड़ी कीमत आज कोरोना वायरस, उत्तराखंड में हुई आपदा के द्वारा हमें चुकानी पड़ रही हैं। जिस भारत में भक्ति रस की गंगा बहती थी और दिलो में प्रेम धड़कता था, आज वहाँ नफरत की आग दहक रही हैं।आतंक अपना साम्राज्य विस्तार कर रहा हैं। हमारी भारतीय संस्कृति की रक्षा संतों ने ही की है और संतों ने ही समाज का निर्माण किया हैं।आइए इस बसंत हम सभी प्रण ले कि भारत में ही नहीं पूरे संसार में फैले हुए आतंक को खत्म करके रहेंगे ।आइए आज हम सब मिलकर संकल्प लेते हैं प्रकृति और ईश्वर की बनाई रचना से फिर से प्रेम करने का, उनकी रक्षा करने का।

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