दिव्यांग बाल वैज्ञानिक ने मल्टीप्लेयर सरक्यूलर चेस बनाया, इसे 60 लोग 100 तरीके से तरह से खेल सकतें हैं

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हृदयेश्वर सिंह ने 9 साल की उम्र में जापान के52 तरीके से खेलने वाला शतरंज का रिकॉर्ड तोड़ा था।
जयपुर : जयपुर के हृदयेश्वर सिंह भाटी (17) को 22 जनवरी को प्रधानमंत्री राष्ट्रीय बाल शक्ति पुरस्कार दिया जाएगा। हृदयेश्वर का 85% शरीर ड्यूशिन सिंड्रोम के कारण दिव्यांग है। उनकी उंगलियां कांपती हैं। लेकिन दिमाग वैज्ञानिक का है। लोग उन्हें छोटा स्टीफन हाकिंग्स और प्यार से हार्डी भी कहते हैं। हार्डी ने 9 साल की उम्र में गोलाकार शतरंज तैयार किया था। इसे मल्टीप्लेयर सरक्यूलर चेस कहा जाता है। इसे तीन आकारों में बनाया गया। पहले को 6, दूसरे को 12 और तीसरे को 60 लोग एक साथ खेल सकते हैं। पहले शतरंज को 11, दूसरे को 27 और तीसरे को 62 तरीके से खेला जा सकता है। इस तरह कुल 100 तरीके से खेला जा सकता है। जापान ने 52 तरीके से खेलने वाला शतरंज बनाया है। हार्डी ने उसका रिकॉर्ड तोड़ा।
ऐसे मिली प्रेरणा
8 साल की उम्र में हार्डी पिता के साथ शतरंज खेल रहे थे। तभी कुछ दोस्त घर आए। दोस्तों ने भी शतरंज खेलने की इच्छा जाहिर की। पिता ने कहा कि शतरंज तो दो खिलाड़ियों के लिए ही बना है। तब हार्डी ने ऐसा शतरंज बनाने का निश्चय किया, जिसे दो से ज्यादा लोग खेल सकें। उन्होंने छह महीने तक रिसर्च की और काम में जुट गए। हार्डी कहते हैं- सबसे बड़ी विकलांगता हौसलों की कमी है, जो चल नहीं सकता, वह हौसलों के दम पर उड़ सकता है।
7 पेटेंट हासिल; स्कूल छूटा, इंटरनेट के जरिए पढ़ाई करते हैं
सरकार ने हार्डी को मोस्ट आउटस्टैंडिंग क्रिएटिव इंवेंटर टीन अवार्ड से नवाजा है। उनके पास 7 पेटेंट हैं। इनमें खुद का बनाया शतरंज भी शमिल है। हार्डी स्कूल नहीं जा पाते, लेकिन घर से ही पूरी दुनिया को यूनिवर्सिटी बनाकर तालीम लेते हैं। वह हर दिन 10 घंटे इंटरनेट और टीवी के जरिए देश-दुनिया की जानकारी लेते हैं। उन्हें भारतीय, पश्चिमी संगीत पसंद है। हार्डी की माता डॉ. मीनाक्षी कंवर स्कूल में अंग्रेजी की शिक्षिका हैं। पिता सरोवर सिंह भाटी गणित में राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता हैं।
(साभार – दैनिक भास्कर)

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