देश प्रेम की राह से ही गुजरता है कवि गुरु का विश्व प्रेम

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सुषमा त्रिपाठी कनुप्रिया

रवीन्द्रनाथ…विश्वकवि…कवि गुरु और बंगाल के प्राण हैं रवीन्द्रनाथ ठाकुर। रवीन्द्रनाथ के एक विचार को लेकर कहा जाता है कि उन्होंने मानवता को देश प्रेम से अधिक महत्व दिया…लेकिन लोग यह बताना भूल जाते हैं कि कवि गुरु की मानवता और विश्व प्रेम देश प्रेम के मार्ग से होकर ही गुजरते हैं। रवीन्द्रनाथ ने कभी देश प्रेम का विरोध नहीं किया…जो लोग यह कहते हैं कि वे उग्र राष्ट्रवाद के विरोधी थे…उनको एक बार महाजाति सदन जरूर देखना चाहिए जिसका शिलान्यास उन्होंने किया था और इस महाजाति सदन की स्थापना के पीछे किसी और का नहीं बल्कि हमारे नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की ही परिकल्पना और योगदान था। रवीन्द्रनाथ 12 वेलिंग्टन स्क्वायर पर स्थित राजा सुबोध मलिक बासु के घर आते थे और यहीं आया करते थे अरविंद घोष…जो कि उस समय क्रांतिकारी विचारधारा से ही प्रेरित थे और इसी दिशा में काम भी कर रहे थे। रवींद्रनाथ संभवतः ऐसे अकेले व्यक्ति थे जिन्होंने दो देशों भारत और बांग्लादेश के लिए राष्ट्रीय गान लिखा। बचपन से कुशाग्र बुद्धि के रवींद्रनाथ ने देशी और विदेशी साहित्य दर्शन संस्कृति आदि को अपने अंदर समाहित कर लिया था और वह मानवता को विशेष महत्व देते थे। इसकी झलक उनकी रचनाओं में भी स्पष्ट रूप से प्रदर्शित होती है।
रवीन्द्रनाथ को गाते हुए हम बड़े हुए…काबुलीवाला कहानी हम सबने पढ़ी है…उसमें भी देश प्रेम अप्रत्यक्ष रूप से दिख सकता है…काबुली वाले की तड़प में काले पानी की सजा पाने वाले क्रांतिकारियों की व्यथा सी दिख पड़ती है मुझे। इस बार के बंगाल चुनाव में जिस तरह से ‘खेला होबे’ और ‘खेला शेष होबे’ के नारे उछले…जिस तरह से जय बांग्ला के राग बेसुरा किया गया…उसने मन को विचलित कर दिया है…सोचती हूँ…ऐसे नारों पर कवि गुरु की क्या प्रतिक्रिया होती, वो कवि जिसने अपने सृजन संसार में पूरे विश्व को समाहित कर लिया….वह जिसने पूरे विश्व को अपनाया…जिसने यह तक कह दिया कि “जब तक जिंदा हूं, मानवता के ऊपर राष्ट्रभक्ति की जीत नहीं होने दूंगा।”….उन पर क्षेत्रीयता का बोझ लाद दिया गया,…किसी भी बड़े व्यक्तित्व से प्रेरित होना कोई बड़ी बात नहीं…हम सब होते हैं…तभी तो गाँधी का चरखा देश में चल पाया…मगर आज उसी राज्य में जब इस प्रेरणा में कटाक्ष खोजा जाता है तो मन डूबकर फिर से कवि गुरु को खोजना चाहता है….इसीलिए आज पहली बार मैं लिख भी रही हूँ…रवीन्द्र संगीत को गाने के लिए भी पहले उसे पढ़ना पड़ता है…समझना पड़ता है…स्कूल के दिनों से ही रवीन्द्र संगीत गाती आ रही हूँ और कॉलेज में तो समझा भी…संगीत सीखते हुए भी रवीन्द्र संगीत गाया…’तुमि कैमोन करे गान…करो हे गुनि’…मुझे तो कभी नहीं लगा कि रवीन्द्र सिर्फ बंगाल के हैं और मैं बिहार से हूँ,,’अबांगाली’ हूँ इसलिए मेरा रवीन्द्रनाथ पर कोई अधिकार नहीं,,,,हम सबको सिखाते हुए कभी भी हमारी शिक्षिकाओं ने यह भेद नहीं किया…फिर वह कौन लोग हैं जो हमारे कवि गुरु को अपनी संकीर्णताओं में लपेट लेना चाहते हैं..?


इस देश ने भगवा वस्त्रों में आध्यात्मिकता खोजी है….आप रक्त खोज लेते हैं.. आपको राम से चिढ़ है…ठाकुर के तो नाम में ही राम है…रामकृष्ण परमहंस…भगवा स्वामी विवेकानंद समेत कई विभूतियों का गौरव है…उसे राजनीतिक हथियार बना देने का अधिकार आपको किसने दे दिया….जब लिख रही हूँ तो बादल छाए हैं….और गीत याद आ रहा है….मन मोरो मेघेर संगी….बादल की भी कोई जाति या राज्य होता है भला…कविगुरु समेत अन्य विभूतियाँ भी तो इन बादलों की तरह ही हैं….साहित्य का अमृत बरसाती हैं…समुद्र मंथन से निकला अमृत अगर समुद्र में रह जाता तो क्या होता इस संसार का….इसी तरह रवीन्द्र का गौरव अगर बंगाल तक ही रह जाए..गाँधी गुजरात तक ही रह जायें…दिनकर बिहार तक ही रह जायें तो क्या होगा इस देश का…इस देश की संस्कृति का?
भारत के राष्ट्रगान को लेकर भी कहा जाता रहा है कि यह जॉर्ज पंचम के स्वागत में लिखा गया है…जो भी हो…जो चयनित अंश हमारे संविधान में स्वीकृत है…वह हमारा गौरव है मगर इन पंक्तियों को देखें –
रात्रि प्रभातिल उदिल रविच्छवि
पूरब-उदय-गिरि-भाले,
साहे विहन्गम, पून्नो समीरण
नव-जीवन-रस ढाले,
तव करुणारुण-रागे
निद्रित भारत जागे
तव चरणे नत माथा,
जय जय जय हे, जय राजेश्वर,
भारत-भाग्य-विधाता,
जय हे, जय हे, जय हे,
जय जय जय जय हे
यहाँ राजेश्वर का सम्बोधन किसके लिए है…यह जानने की प्रबल इच्छा है…इन पंक्तियों को देखिए –
‘আমার সোনার বাংলা, আমি তোমায় ভালোবাসি।
চিরদিন তোমার আকাশ, তোমার বাতাস, আমার প্রাণে বাজায় বাঁশি।

आमार सोनार बांग्ला, आमि तोमाय भालोबासि
चिरदिन तोमार आकाश, तोमार बाताश, आमार प्राणे बाजाय बांशि।
क्या इसमें आपको स्वदेश प्रेम नहीं दिखता….निश्चित रूप से बंगाल की वंदना है इन पंक्तियों में, लेकिन रवीन्द्र देश की बात भी करते हैं…
‘ও আমার দেশের মাটি, তোমার ‘পরে ঠেকাই মাথা।
তোমাতে বিশ্বময়ীর তোমাতে বিশ্বমায়ের আঁচল পাতা।
তুমি মিশেছ মোর দেহের সনে, তুমি মিলেছ মোর প্রাণের সনে,
তোমার ওই শ্যামলবরণ কোমল মূর্তি মর্মে গাঁথা।
ওগো মা, তোমার কোলে জনম আমার, মরণ তোমার বুকে।’

– ओ आमार देशेर माटि, तोमार परे ठेकाई माथा।
तोमाते विश्वमयीर तोमाते, विश्व मायेर आंचल पाता।
तुमि मिशेछो मोर देहेर सने, तुमि मिलेछो मोर प्राणेर सने,
तोमार ओई श्यामल वरण कोमल मूर्ति मर्मे गाँथा।
ओ गो मा, तोमार कोले जनम आमार, मरण तोमार बूके।

मातृ भूमि को माँ कहकर कवि गुरु ने अनेक गीत लिखे हैं और मातृभूमि का गौरव गान किया है…कवि विश्व से प्रेम अवश्य करते हैं मगर उनका यह प्रेम देश और मातृभूमि की वन्दना से होकर गुजरता है। एक उक्ति को लेकर उसका सन्दर्भ बिगाड़ देना भी अपराध ही है जो कि तथाकथित बुद्धिजीवी न जाने कब से करते आ रहे हैं। इन पंक्तियों को देखिए –
‘সার্থক জনম আমার জন্মেছি এই দেশে।
সার্থক জনম, মা গো তোমায় ভালোবেসে।
জানিনে তোর ধনরতন আছে কিনা রাণীর মতন;
শুধু জানি আমার অঙ্গ জুড়ায় তোমার ছায়ায় এসে।
কোন বনেতে জানি নে ফুল গন্ধে এমন করে আকুল,
কোন গগনে ওঠে রে চাঁদ এমন হাসি হেসে।
আঁখি মেলে তোমার আলো প্রথম আমার চোখ জুড়ালো,
ওই আলোতেই নয়ন রেখে মুদব নয়ন শেষে

सार्थक जनम आमार जन्मेछि ऐई देशे
सार्थक जनम, माँ गो तोमा. भालोबेसे
जानिने तोर धनरतन आछे किना रानीर मतन
शूधू जानि आमार अंग जुड़ाय तोमार छाया एशे।
कोन गगने उछे रे चाँद एमन हासि हेंसे।
आँखि मेले तोमार आलो प्रथम आमार चोख जुड़ालो,
ओई आलोतेई नयन रेखे मूदेर नयन शेषे।

रवीन्द्रनाथ जिन्होंने जलियावाला बाग हत्याकांड के विरोध में नाइटहुड की उपाधि लौटा दी…जिन्होंने बंग भंग के विरोध में राखी बन्धन किया…उन रवीन्द्रनाथ को बंगाल और गुजरात में बाँटने चले हैं आप…लज्जा नहीं आती…? रवीन्द्रनाथ वह हैं जो असहमतियों को सम्मान देते रहे…महात्मा गाँधी से भी उनकी असहमतियाँ रहीं मगर एक दूसरे को दोनों ने सम्मान दिया…गाँधी उसी गुजरात से आते हैं जिनकी प्रतिमा के नीचे बैठकर आमरण अनशन होते हैं..आज उसी गुजरात की आलोचना करते आप नहीं थकते। यहाँ न्यूज क्लिक वेबसाइट पर मिले प्रदीप सिंह के एक आलेख का उल्लेख करना भी प्रासंगिक है। लेखक कहते हैं, ‘टैगोर और गांधी के विचार, व्यवहार और समझ में जमीन-आसमान का अंतर था। दोनों का यह रिश्ता बराबरी का नहीं एक ‘शिक्षक’ और एक ‘छात्र’ के संदर्भ में है।
टैगोर एक उत्कृष्ट कवि थे जो ‘गुरुदेव’ के नाम से जाने जाते हैं और मोहनदास करमचंद गांधी ‘महात्मा गांधी’ के रूप में लोकप्रिय हुए। आइए हम यह देखते हैं कि आधुनिक भारत के दो महान शख्सियतों को ‘गुरुदेव’ और ‘महात्मा’ का पदनाम कैसे मिला ?

गांधी जी जब भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से गहरे रूप से जुड़े तब यह आंदोलन नेतृत्वहीनता का शिकार था। अरबिंदो घोष और बाल गंगाधर तिलक के राष्ट्रीय आंदोलन से दूर जाने से देश की राजनीति में एक शून्य आ गया था। दरअसल, अलीपुर बम कांड के बाद अरविंदो घोष ने सक्रिय राजनीति से हट कर आध्यात्मिक मार्ग अपना लिया। लंबे समय से स्वराज का अलख लगाते-लगाते तिलक का निधन हो गया था।

इस परिदृश्य का चित्रण करते हुए काकासाहेब कालेलकर लिखते हैं, “एक अंधकारमय और निराशावादी समय”, “भ्रम की एक गहरी अवधि” ने और “निराशा” को जन्म दिया। इसी समय रबींद्रनाथ टैगोर की नजर गांधी पर आकर टिक गयी। जब टैगोर ने इस आंदोलन का नेतृत्व करने के लिए गांधी को चुना था, तो वह भी केवल इसलिए की उनके सामने उपलब्ध विकल्पों में शायद वह सबसे बेहतर थे।

यह टैगोर ही हैं जिन्होंने गांधी के लिए ‘महात्मा’ शब्द का प्रयोग किया था। टैगोर ने स्पष्ट किया, “‘महात्मा एक स्वतन्त्र आत्मा को संदर्भित करता है जो स्व अब व्यक्तिगत स्तर तक सीमित नहीं है। यह एक ऐसा स्व है जिसमें सभी शामिल हैं” लेकिन जब टैगोर ने गांधी को ‘महात्मा’ कहा, तो वे अभी तक एक मुक्त आत्मा नहीं थे। इसलिए ‘महात्मा’ शब्द की व्याख्या करते हुए गांधी का वर्णन नहीं था क्योंकि वे उस समय तक ‘महात्मा’ होने के बिंदु पर थे, लेकिन अभी महात्मा बनने के लिए उन्हें अपनी क्षमताओं का और अधिक विकास करना था।गांधी ने टैगोर द्वारा दिए गए इस पदनाम पर खरा उतरने की उम्मीद के बीच अपने को असमर्थ महसूस किया और टैगोर की मदद मांगी। उन्होंने टैगोर को ‘गुरुदेव’ के नाम से संबोधित करते हुए कहा कि यदि वे चाहते हैं कि ‘गांधी’ महात्मा’ बने तो उन्हें गांधी का ‘गुरु’ बनना होगा। इस प्रकार गांधी का ‘महात्मा’ बनना गांधी और टैगोर का एक संयुक्त प्रयास था।
जब पूना में आमरण अनशन के दौरान गांधी की तबीयत खराब हो गई, तो टैगोर उनसे मिलने के लिए शांतिनिकेतन से पूना पहुंचे थे। जब गांधी ने उपवास तोड़ा, तो उनके सचिव, महादेव देसाई ने टैगोर से गांधी की पसंद की गीतांजलि की एक कविता सुनाने का अनुरोध किया। बाद में टैगोर ने बताया कि गांधी की उपस्थिति में, वह उस धुन को भूल गए थे जिसमें उन्होंने मूल रूप से कविता की रचना की थी, लेकिन फिर भी उन्होंने इसे गाया।
गांधी और टैगोर विचार औऱ व्यवहार के दो भावभूमि पर खड़े थे। लेकिन दोनों का सपना एक था। वह सपना देश को पराधीनता की बेड़ी से मुक्त करके भौतिक संसाधनों से युक्त और आद्यात्मिकता से सराबोर देश बनाना था। साझा स्वप्न को साकार करने के लिए दोनों महापुरुष एक दूसरे के करीब आए। यहां विचार कभी आड़े नहीं आया। लेकिन वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य को देखा जाए तो महज चुनाव जीतने के लिए विचार परिवर्तन और भिन्न मत रखने वालों पर तीखे हमले किए जा रहे हैं। जबकि दोनों पक्षों का दावा देशहित होता है।’
आपको जिस हिन्दी से शिकायत है…और जिसे लेकर आप अपनी भाषा के प्रति असुरक्षित हो जाते हैं….कवि गुरु ने उस भाषा के महत्व को समझा और यही कारण है कि विश्व भारती में एक हिन्दी भवन भी स्थापित हुआ। रवीन्द्र नाथ कहा करते थे, “शान्ति निकेतन को समस्त जातिगत तथा भौगोलिक बन्धनों से अलग हटाना होगा, यही मेरे मन में है। समस्त मानव-जाति की विजय-ध्वजा यहीं गड़ेगी। पृथ्वी के स्वादेशिक अभिमान के बंधन को छिन्न-भिन्न करना ही मेरे जीवन का शेष कार्य रहेगा।” यही हिन्दी भवन आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का कार्यक्षेत्र रहा…उस हिन्दी को अपमानित करना क्या कविगुरु के विचारों का अपमान करना नहीं है?
अपने इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए टैगोर ने 1921 में शान्तिनिकेतन में ‘यत्र विश्वम भवत्येकनीडम’ (सारा विश्व एक घर है) के नए आदर्श वाक्य के साथ विश्व भारती विश्वविद्यालय की स्थापना की। विश्वकवि गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर (टैगोर) को मान देते हुए 1935 में काशी हिंदू विश्वविद्यालय ने उन्हें डी-लिट उपाधि से अलंकृत किया। इस आयोजन के बाद वह प्रयागराज चले गए थे। तब महामना मदन मोहन मालवीय ने स्वयं पत्र लिखकर गुरुदेव को काशी बुलाया था। रवींद्रनाथ टैगोर ने 1888 में छह महीने तक प्रवास किया और यहां का छोटा सा इतिहास भी लिखा। यहीं पर मानसी की अधिकांश कविताएं व नौका डूबी के कई अंश लिखे। उनके प्रवास स्थान पर एक पार्क है। रवींद्र नाथ टैगोर अपने दूर के रिश्तेदार गगनचंद्र राय के यहां गोराबाजार आवास पर ठहरे थे। यहां रहते गुरुदेव की घनिष्टता एक अंग्रेज सिविल सर्जन से हो गई। रवींद्रनाथ अपनी कविताओं का अनुवाद उन्हें सुनाया करते थे। गुरुदेव यहां लार्ड कार्नवालिस समाधि उद्यान में शाम को घूमने जाया करते थे।
चलिए हमने तो कवि गुरु पर अपनी बात कही….लगे हाथों आप भी बता दीजिए कि आपने प्रसाद, निराला, तुलसी, सूर…कबीर को कितना पढ़ा है…बांग्ला में प्रेमचंद को छोड़कर कितने साहित्यकारों को सम्मान मिलता है,,,,क्या आप भी हिन्दी व अन्य भारतीय भाषाओं के साहित्यकारों को वैसे ही सेलिब्रेट करते हैं,,,,जैसे हम रवीन्द्रनाथ को कर रहे हैं,,,,और करते रहेंगे….। मुझे लगता है कि किसी देश का होने के लिए उस देश का जन्म लेना ही काफी नहीं है…उस देश को समझना..और अपना बनाना जरूरी है,…तभी तो सिस्टर निवेदिता, मीरा बेन और मदर टेरेसा से लेकर फादर कामिल बुल्के को हम उतना ही सम्मान देते हैं..।
आप बात तो विश्व को गाँव बनाने की करते हैं मगर सत्य यह है कि अपनी कुंठाओं के गाँव को आपने दुनिया समझ लिया है। आप चाहते हैं कि आपकी भाषा, आपकी संस्कृति का जयगान हो और आप श्रेष्ठता का दर्प लिये घूमते रहें,.,,,सम्मान एक हाथ से नहीं मिलता,,,सम्मान पाने के लिए पहले सम्मान देना पड़ता है…हमारे लिए कवि गुरु, नेता जी की पहचान इसलिए नहीं है कि वे बंगाल में जन्मे,,,,वह हमारे मन में इसलिए हैं कि उन्होंने खुद को एक क्षेत्र में सीमित नहीं रखा,,,बल्कि इस भारत देश को ,,,समूचे विश्व को अपना लिया….वह कुंठित लोग नहीं थे…नेता जी ने “कोलकाता चलो’ का नारा नहीं दिया…”दिल्ली चलो’ कहा…इसलिए इस देश के लोकगीतों में वह अब तक बसे हुए हैं….ये लोग आपकी कुंठाओं से बहुत ऊपर हैं…उनको समझना पड़ता है…समझ भाषा, जाति, संस्कृति….क्षेत्र नहीं देखती…देखती तो कार्ल मार्क्स आपके पुरोधा न होते…कवि गुरु बंगाली अस्मिता से अधिक भारतीय वसुधेव कुटुम्बकम के परिचायक हैं,….अब जाते – जाते द्विजेन्द्रलाल राय का एक गीत भी आपके लिए
দ্বিজেন্দ্রলাল রায়
ধনধান্য পুষ্পভরা
ধনধান্য পুষ্পভরা আমাদের এই বসুন্ধরা;
তাহার মাঝে আছে দেশ এক- সকল দেশের সেরা;
সে যে স্বপ্ন দিয়ে তৈরি সে দেশ স্মৃতি দিয়ে ঘেরা;
এমন দেশটি কোথাও খুঁজে পাবে নাকো তুমি,
সকল দেশের রানী সে যে-আমার জন্মভূমি।

धनधान्य पुष्पभरा आमादेर एई वसुन्धरा
ताहार माझे आछे देश एक..सकल देशेर शेरा
शे जे स्वप्न दिये तेरि से देश स्मृति दिये घेरा
एमन देशटि कोथाओ खूँजे पाबे नाको तूमि,
सकल देशेर रानी से जे, आमार जन्मभूमि

स्त्रोत साभार

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