नवीनता लाए, जनमुद्दे उठाए, तकनीकी रूप से आत्मनिर्भर बने मीडिया – हरिवंश

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कोलकाता मई का अंतिम सप्ताह हिन्दी पत्रकारिता के उत्स का प्रतीक है। देश में कई बड़े आयोजन होते भी हैं। इस बार ऐसा ही भव्य आयोजन कोलकाता में हुआ और देश के दिग्गज पत्रकार, शिक्षा एवं संस्कृति के प्रतिनिधि जुटे। गत 30 मई को हिन्दी पत्रकारिता दिवस था। इस अवसर पर छपते – छपते हिन्दी दैनिक एवं ताजा टीवी द्वारा कोलकाता प्रेस क्लब के सहयोग से  गत 30 एवं 31 मई को आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय पत्रकारिता सम्मेलन का आयोजन एक सार्थक बहस और समाधान की रूपरेखा का केन्द्र बिन्दु बना। एक नये परिप्रेक्ष्य में पत्रकारिता और उसकी चुनौतियों को देखना और उस पर होने वाली चर्चा निश्चित रूप से ऐतिहासिक और मील का पत्थर है। बात पत्रकारिता की पक्षधरिता, संवेदना, जवाबदेही, इतिहास, भाषा और पत्रकारों की स्थितियों पर हुई। यह बात हुई कि जब समाज के हर क्षेत्र में गिरावट आयी है तो पत्रकारिता में भी गिरावट आना स्वाभाविक है क्योंकि पत्रकारिता के क्षेत्र में जो लोग आते हैं, वे इसी समाज से आते हैं। पत्रकारिता के क्षेत्र में काम करने वालों की अपनी चुनौतियाँ हैं और उनसे अपेक्षाएँ मिशनरी पत्रकारिता की हैं। बहरहाल आपके लिए इस विचारोत्तेजक सम्मेलन के दिग्गजों के विचार हम प्रस्तुत कर रहे हैं,इस उम्मीद के साथ कि आप जब भी मीडिया की आलोचना करें, उसकी चुनौतियों के प्रति भी थोड़ी संवेदना रखें और अखबार खरीदकर पढ़ें –

भारतीय पत्रकारिता की पहचान उसके भाषायी अखबारों के कारण है
हरिवंश नारायण सिंह (राज्यसभा के उपसभापति )
कोलकाता हमेशा से चेतना, चिंतन और पुर्नजागरण का केंद्र रहा है। स्वाधीनता आन्दोलन के समय भाषायी पत्रकारिता ने नयी दिशा दी। भविष्य में जितनी दूर तक अपनी पहचान बनाना चाहते हैं तो अतीत की ओर देखिए, अतीत से ही ताकत मिलती है पहचान बनाने के लिए। भाषायी पत्रकारिता देश को नयी दिशा देने वालों को समर्पित है। 196 साल पहले 30 मई को हिन्दी पत्रकारिता आरम्भ हुई थी। 1700 से 2000 का समय है, वह विचारों का समय है। यह प्रेस भी विचारों की देन है। गुटेनबर्ग एक सुनार थे। दुनिया में विचारों का दौर था, अखबार इसी की देन हैं जिन्होंने वैचारिक तौर पर समाज को तैयार किया और वैचारिक क्रांति का नेतृत्व किया। माना जाता था कि गरीबी ईश्वर की देन है मगर मार्क्स ने विरोध किया और उनके विचार का विस्तार हुआ। आज तकनीक का दौर है, हमारी चुनौती प्रिंट मीडिया की जो है, उसे हम पहचान नहीं पा रहे हैं। तकनीक हमें नियंत्रित कर रही है। तकनीक आज हमारे जीवन को विचाररहित कर रही है। चीजें तकनीक पूरी तरह बदल चुकी है। मीडिया के सामने साख का संकट है। मिशन पत्रकारिता के अखबार मुख्यधारा के नहीं थे पर अपने ध्येय को लेकर चलते रहे। इनके संस्थापक पत्रकार उद्यमी भी थे। भारतीय पत्रकारिता की पहचान उसके भाषायी अखबारों के कारण है। उदारीकरण के बाद बाजार, पूंजी और तकनीक दुनिया को नियंत्रित कर रही है और इसमें अधिक से अधिक लाभ चाहिए। पत्रकारिता में वित्तीय असुरक्षा का सवाल है। प्रेस खोलने के लिए करोड़ों चाहिए, वेज बोर्ड चाहिए। अखबारों को मुफ्त पढ़ाने की होड़ है। लोगों को मुफ्त और ईमानदार अखबार चाहिए। पत्रकारिता व्यवसाय़ है तो व्यवसाय़ की तरह ही चलेगी। बाजार और विपणन और टीआरपी से ही यह चलेगा।
खबरों को लिखने की प्रकृति भी मानसिक प्रभाव डाल रही है। यह गम्भीरता से सोचने का विषय है। पहले परम्परा थी कि जब तक सभी की प्रतिक्रिया न मिले, खबर नहीं छापी जाती थी। लोग मुख्यधारा के प्रेस पर विश्वास करते थे, आज खबरों पर विश्वास नहीं किया जा रहा है। दुनिया में क्रांति तकनीक से हुई और तकनीक ही क्रांति के खिलाफ है। इस पर हमें विचार करना चाहिए। अब तो आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस पर बात होनी चाहिए। बड़ी टेक कम्पनियों का आपके दिमाग पर कब्जा है। नये मुद्दों को उठाएंगे तो लोग पढ़ेंगे। टेक कम्पनियों की जवाबदेही क्या हैं, इन पर सोचना होगा। रुस – यूक्रेन युद्ध में वित्तीय तकनीक हथियार इस्तेमाल की जा रही है। क्या हम आर्टिफिशियिल तकनीक के प्रति लोगों को सचेत कर रहे हैं? दिग्गज वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग ने कहा कि पर्यावरण और तकनीक, अगर इससे हम बच नहीं सके तो एक नयी दुनिया खोज लेनी होगी। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस भविष्य हैं तो एक खतरा भी है। अखबारों को इनका मुकाबला करने के लिए खुद को मजबूत होने की जरूरत है। जागरुक मानसिकता के कारण लोग ओटीटी जैसे माध्यमों से हट रहे हैं। अखबारों को नवीनता के साथ सोचने की जरूरत है। हमें संवेदनशील मुद्दों को उठाना होगा। फेसबुक पर करोड़ी फर्जी खबरें फैल रही हैं, 64 प्रतिशत भारतीय फर्जी खबरों से परेशान हैं मगर सख्त सजा नहीं है। अंग्रेजों के जमाने के कानून से सोशल मीडिया से नहीं लड़ा जा सकता।

सत्ता से दुश्मनी नहीं होनी चाहिए पर सत्ता को आईना दिखाते रहना चाहिए
विनोद अग्निहोत्री (अमर उजाला के सलाहकार सम्पादक)
कोलकाता पहली बार आया हूँ। मैं नहीं मानता कि पत्रकारिता में सब कुछ खराब है पर यह एक लोकतांत्रिक पेशा है इसलिए हम अपनी आलोचना भी करते हैं। मैं जब आया तो वह पत्रकारिता का अच्छा दौर था। मुझे दिग्गज पत्रकारों के साथ काम करने का मौका मिला। उसी दौर में नवभारत टाइम्स में परीक्षा दी, चयन हुआ। मुझे राजेन्द्र माथुर, रामपाल सिंह, उदयन शर्मा, सुरेन्द्र प्रताप सिंह, कन्हैया लाल नंदन, आलोक मेहता समेत कई और लोगों के साथ काम करने का मौका मिला। दरअसल पत्रकारिता और समाज का जल और मछली का रिश्ता है, समाज सड़ेगा तो पत्रकारिता भी सड़ेगी, समाज जीवन्त होगा तो पत्रकारिता भी जीवन्त होगी। आजादी के बाद हिन्दी समेत भाषायी ने पत्रकारिता राष्ट्र निर्माण का रास्ता बनाया। एक समय था जब यह पारिवारिक पत्रकारिता बनी और जयप्रकाश के आन्दोलन के बाद इसने फिर गति बदली। पत्रकारिता को समाज से अलग करके हम नहीं देख सकते, जब हर ओर अवमूल्यन की स्थिति हो तो पत्रकारिता में भी अवमूल्यन होगा क्योंकि यहाँ भी इसी समाज से लोग आते हैं। कोरोना के दौरान 50 प्रतिशत छंटनी हुई, उन चुनौतियों का सामना मिलकर किया गया। पत्रकारिता मिशन भी है, व्यवसाय भी है और बिजनेस भी है और इसमें सन्तुलन हो तो स्वस्थ पत्रकारिता होगी, यह जरूरी है। बदलते परिवेश में कारोबार, तकनीक और मिशन के सटीक मिश्रण की जरूरत है, जिससे इस उद्योग की साख बच सके।
जब हम अखबार सुबह देखते हैं तो खबरें बासी लगती हैं। एक सप्ताह अखबार न पढ़ें तो भी फर्क नहीं पड़ेगा, यह सोचने का विषय है कि क्या नया किया जाये, यह एक चुनौती है। यह चुनौती मैंने महसूस की है। हम नया क्या दें, इस पर विचार हो, यह समस्या हल हुई तो अखबार फिर लोकप्रिय होंगे। बच्चों को लेकर पत्रकारिता नहीं हो रही है, हम जब छोटे थे तो पराग, चंदामामा, जैसी बाल पत्रिकाएं थीं और हम खूब पढ़ते थे। आज तो बच्चों को पत्रकारिता से बाहर कर दिया गया है, उनको कैसे साथ लाया जाए, इस पर विचार हो, महिलाएं, किसानों के मुद्दे हों। गाँवों में हिन्दी अखबार अधिक पढ़े जा रहे हैं। पाठकों की चिट्ठियाँ नहीं आतीं, लोग ट्विटर पर ही सब कुछ लिख दे रहे हैं। प्रिंट मीडिया का स्वरूप बदलना होगा। सम्भव है कि अखबार की जगह पीडीएफ मिले, तकनीक की आदत डालनी होगी। अंग्रेजी की पत्रकारिता शासन और अमीरों की पत्रकारिता थी पर 60 के दशक के बाद उनको चुनौती मिली और आज हम बराबर हैं। हिन्दी और भाषायी पत्रकारिता का अन्योयाश्रित सम्बन्ध है। समस्या यह है कि उर्दू और हिन्दी की पत्रकारिता की बात हो, तो हिन्दी पत्रकारिता हिन्दू और उर्दू पत्रकारिता मुस्लिम पत्रकारिता हो जाती है, इससे बचना चाहिए। पत्रकारिता निष्पक्ष नहीं हो सकती, वह सत्य और तथ्य के साथ होगी, तटस्थ नहीं हो सकती, उसके विचार होंगे पर पार्टी लाइन नहीं होगी। हमारे अपने विचार होंगे। हमें सत्य और तथ्य के साथ गहराई में जाना होगा, जनपक्षधरता के साथ होना चाहिए। सत्ता से दुश्मनी नहीं होनी चाहिए पर सत्ता को आईना दिखाते रहना चाहिए, कमजोरियाँ जरूर बताते रहना चाहिए।
एक समय था जब हम आकाशवाणी, दूरदर्शन और अखबार देखकर भाषा सीखते थे पर आज भाषा बिगड़ जा रही है। अंग्रेजी के शब्द हों मगर उनको ठूंसा न जाये, यह अखरता है क्योंकि यह भाषा को बिगाड़ रहा है। प्रभाष जोशी देशज भाषा के पक्ष में थे। भाषा बाजारू नहीं होनी चाहिए। इस पर गम्भीरता से बात होनी चाहिए। अभी इस पर अखबारों या चैनलों में ध्यान नहीं दिया जा रहा है। दुःख की बात यह है कि आज न्यूज रूम में नयी पीढ़ी को गढ़ने की प्रक्रिया बंद हो गयी है। अखबार, समाज और लोकतंत्र का अन्योयाश्रित सम्बन्ध है और इनके बीच सन्तुलन होना आवश्यक है।

पत्रकार की राजनीतिक लाइन हो सकती है पर उसकी पार्टी लाइन नहीं होनी चाहिए
प्रो. संजय द्विवेदी (भारतीय जन संचार संस्थान के महानिदेशक)
30 मई को कोलकाता से ही उदन्त मार्तंड निकला था। भाषाएं कैसे जोड़ती हैं, कोलकाता की भूमि इसका उदाहरण है। पत्रकारिता को लेकर आलोचनाओं का दौर गर्म है। दुनिया में हर कोई अपने कार्यक्षेत्र को लेकर आशावादी है। समाज के हर क्षेत्र में जब अवमूल्यन है तो पत्रकारिता में उत्कर्ष की उम्मीद कैसे करते हैं? यह सम्भव नहीं है कि जब हर क्षेत्र में अवमूल्यन हो तो पत्रकारिता में उत्कर्ष हो। आजादी के दौरान मुख्यधारा के मीडिया ने अंग्रेजों का साथ दिया, उनको भी देखा जाना चाहिए। हम आजादी के दिनों की पत्रकारिता को लेकर अधूरा सच बताते हैं। हर अखबार और पत्र – पत्रिकाओं के संकल्प अलग हैं। वह अपनी व्यावसायिक चुनौतियों से अलग नहीं हो सकता। किसी भी व्यवसाय में सुधार की हमेशा सम्भावना रहती है, उसकी गुणवत्ता और जनपक्षधरिता पर भी बात होनी चाहिए। सोशल मीडिया पर जो हो रहा है, उसके लिए पत्रकारिता और पत्रकार जिम्मेदार नहीं ठहराई जा सकती है। पत्रकारिता एक अनुशासन का नाम है। हम जो पत्रकारिता में हैं, हम समाचार के व्यवसाय में हैं, सूचना के व्यवसाय में नहीं हैं। समाज में विभिन्न मंचों से दी जा रहीं सूचनाओं की जिम्मेदारी पत्रकार नहीं ले सकता। लाइक और शेयर के समय को पत्रकारिता पर आरोपित करने का प्रयास हो रहा है। पत्रकार की राजनीतिक लाइन हो सकती है पर उसकी पार्टी लाइन नहीं होनी चाहिए। राजनीतिक आदर्श हो सकते हैं मगर उसे पार्टी लाइन नहीं बनाना चाहिए। पत्रकारिता लोककल्याण के लिए हैं, लोकमंगल के लिए है। जब हम राष्ट्र की बात करते हैं तो व्यक्ति ही केन्द्र में हैं। हमारी जिम्मेदारी है। हमें आत्मपरिष्कार करना होगा। जनभावनाओं को सर्वोच्च रखते हुए राष्ट्र निर्माण के लिए पत्रकारों को काम करना होगा। आने वाले समय को अमृत समय में बदलें। सूचना और समाचार में अंतर होता है। सूचना गलत हो सकती है, लेकिन समाचार गलत नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा कि पत्रकार का धर्म आधा सच बताना नहीं है, बल्कि एक भारत और श्रेष्ठ भारत के लिए ईमानदारी से काम करना है।

पाठक सही सूचनाओं के लिए पैसे खर्च करता है, यह याद रखना होगा
सुमन गुप्ता (भारतीय प्रेस परिषद की सदस्य और ‘जनमोर्चा’ की संपादक )
आज हिन्दुस्तानों में अखबारों के जीवन पर भी विचार करना चाहिए। अखबार पंजीकृत तो होते हैं पर संचालित नहीं हो पाते। मिशनरी पत्रकारिता समय के साथ बदलती गयी है। अगर शक्तियाँ कुछ हाथों में सीमित हो गयीं तो क्या लोकतंत्र रह जाएगा? अखबारों के पाठक कम हुए, ग्राहक बढ़ गये हैं, सम्पादकों के नाम पाठकों के पत्र जैसे स्तम्भ सिमट गये हैं। सूचनाओं से वंचित और भ्रमित करने का काम जारी है। अखबारों में खबरों का प्राथमिक स्त्रोत खत्म हो रहा है। फील्ड की रिपोर्टिंग की जगह इंटरनेट की सामग्री का उपयोग बढ़ गयी है जिसका सत्यापन नहीं हो रहा है। एजेंसियों का कथन ही हमारा वर्जन बन गया है। हम ओपिनियन बनाने का काम करते हैं तो एकतरफा ओपिनियन क्यों बना रहे हैं। पाठक सही सूचनाओं के लिए पैसे खर्च करता है। सोशल मीडिया अनगाइडेड मिसाइल है पर बहुत सी चीजें सामने ला रहा है। नागरिकों की आजादी के अधिकार का उपयोग का मीडिया कर रहा है, इस पर भी सोचना चाहिए।

जब भी राजनीति में अन्धेरा हुआ है, मीडिया सूर्योदय लाया है
डॉ. शम्भुनाथ (भारतीय भाषा परिषद के निदेशक एवं वागर्थ के सम्पादक)
– 1826 में प्रकाशित हिन्दी का पहला पत्र उदन्त मार्तंड डेढ़ साल से अधिक नहीं चल सकता। आज कलम की जगह माउस आ गया है, कागज की जगह कम्प्यूटर स्क्रीन आ गया है पर उदन्त मार्तंड के जमाने में अखबार निकालना तोप के सामने खड़ा होना था। जुगल किशोर सुकुल ने खबरों में ‘लूट की छूट’ और ‘दालचीनी के पौधे’ में व्यापारी वर्ग की आलोचना की, यह आलोचना देशप्रेम का संकेत है। सर्पदंश से बचने के लिए औषधि का उपयोग करें..यह एक बुद्धिसम्यक और वैज्ञानिक दृष्टि का विकास था। चुनौतियाँ तब भी थीं, चुनौतियाँ आज भी हैं। सुकुल जी ने जाति, प्रांत के हित नहीं बल्कि हिन्दुस्तानियों के हित लिखा। निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल, इसकी चेतना उदन्त मार्तंड के समय विकसित हो रही थी। सबसे बड़ी चुनौती मीडिया की स्वायत्तता है, आज पत्रकार और सम्पादक को दुर्बल बनाया दिया गया है, उसे उसका अस्तित्व वापस चाहिए। संसाधन कम थे तब निम्न तकनीक उच्च विचार थे, आज उच्च तकनीक, निम्न विचार हैं। क्या राजनीति में अन्धेरा हो तो मीडिया ही सूर्योदय ला सकता है। इतिहास है कि जब भी राजनीति में अन्धेरा हुआ है, मीडिया सूर्योदय लाया है। छोटे – छोटे अखबार ही जनता की सच्ची खबरें ला सकते हैं। समय की जरूरत है कि पत्रकार वैज्ञानिक दृष्टि से काम करें और अंधविश्वास फैलाने से बचें। उन्होंने कहा कि पाठकों को सही और सटीक खबर जानने का अधिकार है और जब तक पाठकों के अधिकार की पूर्ति नहीं होगी, तब तब उनकी मांग जारी रहेगी।

जनता की बात छोटे अखबार ही उठाएंगे
नदीमुल हक (राज्यसभा सांसद)
भाषा विचारों को दूसरों तक पहुँचाने का माध्यम है। 27 मार्च 1822 को हरिहर दत्त द्वारा मुंशी सदासुख लाल के सम्पादन में जामे जहाँनुमा प्रकाशित हुआ। इसके प्रिंटर विलियम हॉकिंग्स..यहाँ इसके सम्पादन में कोई मुसलमान नहीं था। समस्या यह है कि आज भाषा को मजहब से जोड़ दिया जाता है। राजा राममोहन राय ने सती प्रथा के खिलाफ अपनी बात पहुँचाने के लिए फारसी में मिरात उल अखबार निकाला क्योंकि अभिजात्य प्रभावी वर्ग फारसी में पढ़ता था। 1857 की क्रांति में उर्दू दैनिक के सम्पादक बाकर साहब को तोप से उड़ा दिया गया। सांसद हसरत मोहानी ने इन्कलाब जिन्दाबाद का नारा दिया और हम इस नारे की उत्पत्ति के बारे में नहीं सोचते। आज कागज के दाम बढ़ रहे हैं, विज्ञापन नहीं मिल रहे हैं मगर जनता की बात छोटे अखबार ही उठाएंगे।

इस अवसर पर यूको बैंक के जीएम नरेश कुमार बतौर विशिष्ट अतिथि मौजूद रहे। कार्यक्रम का संचालन ‘छपते-छपते’ के प्रधान संपादक और ‘ताजा टीवी’ के चेयरमैन  विश्वंभर नेवर ने किया।  धन्यवाद ज्ञापन प्रेस क्लब, कोलकाता के अध्यक्ष स्नेहाशीष सूर ने दिया। सम्मेलन के दूसरे दिन महात्मा गाँधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभागाध्यक्ष डॉ. कृपाशंकर चौबे, प्रभात खबर के स्थानीय सम्पादक कौशल किशोर त्रिवेदी, जनपथ समाचार, सिलिगुड़ी के सम्पादक विवेक बैद, जलते दीप एवं माणक (जोधपुर) के सम्पादक पद्म मेहता, मरु राजस्थान, जयपुर के सम्पादक आर. के. जैन, वैचारिकी के सम्पादक बाबूलाल शर्मा, आलिया विश्वविद्यालय की जनसंचार एवं पत्रकारिता विभागाध्यक्ष गजाला यास्मीन. विद्यासागर विश्वविद्यालय के सहायक प्रोफेसर डॉ. संजय जायसवाल समेत अन्य लोगों ने विचार रखे।

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