‘निराला के साहित्य में प्रगतिशील चेतना ‘विषय पर संगोष्ठी

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मिदनापुर : विद्यासागर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग की ओर से ‘निराला के साहित्य में प्रगतिशील चेतना ‘विषय पर संगोष्ठी का आयोजन किया गया ।हिंदी के महाकवि निराला की जन्मस्थली मिदनापुर में अवस्थित इस विश्वविद्यालय में हर साल निराला की स्मृति में कवि पर्व का आयोजन किया जाता है।इस अवसर पर परिचर्चा के साथ स्वरचित कविताओं का पाठ किया गया ।कार्यक्रम की शुरूआत निराला की कविता वर दे वीणा वादिनी पर गीत के साथ हुई ।संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए विभागाध्यक्ष प्रो दामोदर मिश्र ने कहा कि निराला ने हिंदी कविता को समृद्ध करते हुए साहित्य की प्रगतिशील परंपरा क अर्थपूर्ण निर्वाह किया है ।वे हिंदी के रवींद्रनाथ थे ।निराला का यह मानना था कि मौलिक चिंतन और सृजन से ही मानव मुक्ति का संकल्प पूरा हो सकता है।डॉ श्रीकांत द्विवेदी ने कहा कि निराला पूंजीवादी व्यवस्था को मानव विरोधी मानते हुए बराबरी के समाज की स्थापना की बात करते हैं।संजय जायसवाल ने कहा कि निराला अपनी रचनाओं में हिंदू -मुसलमान के बीच साहित्य और सृजन को पारस्परिक संवाद का माध्यम मानते हैं ।उनका मानना है कि औपनिवेशिक शासन, सामंतवाद, पूंजीवाद, सामाजिक जड़ता से लड़ने के लिए हमें सांस्कृतिक पुनर्निर्माण और मनुष्यता के संस्कार के साथ आगे बढ़ना होगा ।इस अवसर पर आयोजित परिचर्चा में ओम कुमार चौरसिया, रूपेश यादव, पुष्पा यादव, अन्नू तिवारी, नेहा चौबे,प्रतिमा त्रिपाठी, उजाला सामल, सलोनी शर्मा, श्रद्धा उपाध्याय, विनीता गुप्ता, रेणु सिन्हा, मदन शाह, विशाल साव, पंकज सिंह, सोनी साव, रुखसार परवीन ने अपना विचार रखा ।कवि पर्व में सलोनी शर्मा, शारदा महतो, मधु सिंह, पंकज सिंह, प्रतिमा त्रिपाठी ने अपनी कविताएं सुनाई ।इस अवसर पर निराला की कविताओं पर रेशमी वर्मा,गायत्री वाल्मीकि और नेहा चौबे ने काव्य नृत्य प्रस्तुत किया ।कार्यक्रम का सफल संचालन करते हुए शोधार्थी मधु सिंह ने कहा कि निराला ने जीवन के संग्राम में ज्ञान ,कर्म, प्रतिरोध और विवेकपरकता के सार्थक समन्वय को जरूरी मानते हैं ।धन्यवाद ज्ञापन डॉ प्रमोद कुमार प्रसाद ने दिया ।

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