निर्गुण भक्ति धारा की कवयित्री राजस्थान की दयाबाई

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प्रो. गीता दूबे

सभी सखियों  को नमस्कार। सखियों, हिन्दी साहित्य के मध्ययुग में बहुत सी ऐसी कवयित्रियाँ हुई हैं जिनके नाम समय के साथ इतिहास के खंडहरों में गुम हो गए हैं। कुछ के नामों का उल्लेख अवश्य मिलता है लेकिन उन पर विस्तार से चर्चा नहीं हुई है। उन सब के साहित्यिक अवदानों को याद करना और उस पर चर्चा करना भी हमारे लिए बेहद आवश्यक है। वैसे भी मध्ययुगीन कवयित्रियों में भक्त कवयित्री के रूप में मीराबाई का वर्णन ही प्रमुखता से हुआ है। बाकियों के अस्तित्व और अवदान की पर्याप्त अनदेखी या उपेक्षा हुई है। हमारी कोशिश होनी चाहिए कि उनके व्यक्तित्व और रचनात्मक अवदान के बारे में पता लगाएँ और उनके मूल्यांकन का प्रयास भी करें। भक्तिकाल की दो कवयित्रियों के नाम तकरीबन एक साथ लेकर हिंदी साहित्य के इतिहासकारों ने अपने कर्त्तव्यों की इतिश्री कर दी है, ये हैं- सहजोबाई और दयाबाई। दोनों ही संत कवयित्रियाँ चरणदासी संप्रदाय में दीक्षित थीं। कुछ लोगों का कहना है कि ये चचेरी या मौसेरी बहनें थीं और कुछ का मानना है कि गुरुबहने थीं। लेकिन यह तथ्य निर्विवाद है कि दोनों ही संत चरण दास की शिष्या थीं। सहजोबाई के विषय में मैं अपने एक आलेख में चर्चा कर चुकी हूं, आज दयाबाई के साहित्यिक अवदान और भक्ति के स्वरूप पर चर्चा करूंगी। 

दयाबाई का जन्म मेवात के डहरा नामक गांव में सन 1693 में और मृत्यु  1773 में हुई। इन्होंने आजीवन ब्रह्मचारिणी रहकर दिल्ली में अपने गुरु चरणदास की सेवा में जीवन व्यतीत किया एवं ईश्वर की भक्ति एवं प्रेम में पगी कविताओं की रचना की। “दयाबोध” इनका प्रकाशित ग्रंथ‌ हैं जिसमें लेखिका ने अपने रचनाकाल का संकेत भी दिया है जिसके अनुसार इसका प्रणयन 1818 में हुआ था-

“‘‘संवत ठारा सै समै, पुनि ठारा गये बीति।

चैत सुदी तिथि सातवी, भयो ग्रंथ सुभ रीति।’’

 इसके अतिरिक्त “विनय मालिका” में भी उनके द्वारा सृजित रचनाएँ संकलित हैं। दयाबाई ने शुद्ध व परिष्कृत ब्रजभाषा में रचना की है, जिस पर मेवाती का प्रभाव सहज रूप से लक्षित किया जा सकता है। इन्होंने पद, साखी, चौपाई आदि में वैराग्य, प्रेम, सत्संग और ईश्वरीय कृपा का मार्मिक वर्णन किया है।

तमाम प्रमुख भक्त कवियों की भांति दयाबाई के काव्य में भी गुरु के प्रति अनन्य भक्ति भाव की अभिव्यक्ति हुई है। गुरु कृपा के बिना ज्ञान नहीं मिलता, इस तथ्य पर कवयित्री को पूर्णतया विश्वास है। गुरु की कृपा से ही वह अनहद नाद को सुनकर भवसागर से मुक्ति का पथ पाती हैं, जिसे अपनी कविता में उन्होंने इस भांति उकेरा है-

‘चरणदास गुरुकृपा ने मनुवां भयो अपंग

सुनत नाद अनहद ‘दया’ आठौ जाम अभंग।

गगन मध्य मुरली बजै में जु सुनी निज कान।

‘दया’ दया गुरुदेव की परस्यौ पद निर्बान।’’

गुरु के बिना ईश्वर की प्राप्ति नहीं होती इसकी अभिव्यक्ति भी उनकी रचनाओं में मिलती है। मन को सांसारिक मोह माया से मुक्त करके ईश्वर की राह पर उसे ले जाने वाला गुरु ही होता है।

‘‘गुरु सब्दन कूँ ग्रहण करि विषयन कूँ दे पीठ।

गोविन्द रूपी गदा मारो कमरन ठीठ।

जग तजि हरि भजि दया गहि क्रूर कपट सब छांड

हरि सन्मुख गुरु ज्ञान गहि मनही सूं रन मांड।’’

दयाबाई निर्गुण भक्ति धारा की कवयित्री थीं और उनपर अद्वैतवाद का प्रभाव दिखाई पड़ता है। उन के काव्य में सांसारिक विषय वासनाओं से मुक्ति के लिए गुरु की कृपा से प्राप्त ईश्वरीय प्रकाश की भी अभिव्यक्ति हुई है जिसके प्रभाव से जीव और ब्रह्म के बीच का भेदाभेद समाप्त हो जाता है-

“भयो अविद्या तम को नास॥

ज्ञान रूप को भयो प्रकास।

सूझ परयो निज रूप अभेद।

सहजै मिठ्यो जीव को खेद॥

जीव ग्रह्म अन्तर नहिं कोय।

एकै रूप सर्व घट सोय॥

जगत बिबर्त सूँ न्यारा जान।

परम अद्वैत रूप निर्बान॥

बिमल रूप व्यापक सब ठाईं।”

दयाबाई की कविता में उस वैराग्य भाव का वर्णन हुआ है जिसका अवलंब लेकर भक्त सांसारिक माया से मुक्ति पाकर ईश्वरीय आभा का साक्षात्कार करता है और अंततः मोक्ष लाभ करता है। उस पावन‌ अवस्था का वर्णन दयाबाई इस प्रकार करती हैं-

“बिन दामिनि उजियार अति, बिन घन पडत फुहार।

मगन भयो मनुवां तहां, दया निहार निहार॥”

सत्संग अर्थात साधु संगति की महिमा बखान जैसे संत कबीर करते हैं उसी तरह दयाबाई भी “साध को अंग” शीर्षक के अंतर्गत संकलित वाणी में, सत्संग के साथ साधुओं या सज्जन लोगों की सेवा के महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए, उसे असार संसार से मुक्ति का मार्ग मानती हैं-

“साध साध सब कोउ कहै, दुरलभ साधू सेव।

जब संगति ह्वै साधकी, तब पावै सब भेव॥”

प्रेम का प्रकाश और उसके प्रभाव को दयाबाई ने अपनी गुरुबहन सहजोबाई और संत कबीर की भांति अनुभूत भी किया है और उसे शब्दों में पिरोया भी है-

“दया प्रेम प्राय्यौ तिन्है, तन की तनि न संभार।

हरि रस में माते फिरें, गृह बन कौन बिचार॥

हरि रस माते जे रहें तिनको मतो अगाध।

त्रिभुवन की सम्पति ‘दया’ , तृन सम जानत साध॥”

प्रेम के आत्मबोध के साथ ही कवयित्री उसके अटपटेपन की ओर संकेत करते हुए उस अद्भुत स्थिति का चिती करती हैं जिसमें प्रेमी या भक्त उस अवर्णनीय आनंद से साक्षात्कार करता है जिसका अनुभव मात्र वही कर सकता है, अन्य कोई नहीं –

“पथ प्रेम को अटपटो, कोइ न जानत बीर।

कै मन जानत आपनो, कै लागी जेहि पीर॥”

भक्ति काव्य में नाम- स्मरण या प्रभु सुमिरन का बहुत महत्व है। दयाबाई भी अगाध विश्वास के साथ प्रभु के नाम का स्मरण करते हुए, सत्संग और भजन के माध्यम से इस भवसागर से पार उतरना चाहती हैं, जिसका सुंदर निदर्शन प्रस्तुत पद में हुआ है-

“दयादासि’ हरि नाम लै, या जग में यह सार।

हरि भजते हरि ही भये, पायो भेद अपार॥

सोवत जागत हरि भजो, हरि हिरदै न बिसार।

डोरा गहि हरि नाम की, ‘दया’ न टूटै तार।

नारायन नर देह में, पैयत हैं ततकाल।

सतसंगति हरि भजन सूँ, काढ़ो तृस्ना व्याल॥

दया नाव हरि नाम को, सतगुरु खेवन हार।

साधू जन के संग मिलि, तिरत न लागै वार॥”

“वैराग्य का अंग” शीर्षक के अंतर्गत संकलित दोहों में दयाबाई संसार की स्वार्थपरता की ओर संकेत करती हुई सांसारिक नातों से मुक्त होकर मात्र अपने प्रभु के साथ ही प्रेम का संबंध जोड़ने की बात करती हैं-

“‘‘दयाकुँवर या जगत में नहीं अपनी कोय

स्वारथ-बंधी जीव है राम नाम चित जोय।’’

सखियों, दयाबाई का काव्य हर दृष्टि से अन्यान्य भक्त कवियों के काव्य की समकक्षता कर सकता है। जरूरत है, इसके पुनर्खोज और पुनर्पाठ की। मेरा आग्रह है कि इन्हें भी भक्तिकाव्य के तमाम कवियों के साथ समान आसन और आदर मिलना चाहिए।

 

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