नेहरू के टोकने पर 10 भाषाओं में बोल गये झाँसी के पहले सांसद धुलेकर

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हिन्दी बोलने पर टोका गया था

झांसी : झांसी के पहले सांसद आचार्य रघुनाथ विनायक धुलेकर मराठी परिवार से थे। लेकिन, उनकी बोलचाल की भाषा हिंदी ही थी। वह हिंदी के प्रबल पक्षधर थे। हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिलाने में उनका योगदान अहम रहा है। एक रोचक किस्सा संसद से जुड़ा है। किस्सा कुछ यूं है कि वह एक बार संसद में हिंदी में बोल रहे थे। इस पर तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें टोक दिया। पं. नेहरू ने कहा, संसद में अलग-अलग भाषाओं को जानने वाले बैठे हुए हैं। यदि आप अपनी बात अंग्रेजी में रखें तो सबको समझ में आएगी। इस पर धुलेकर रुके नहीं। वह, अंग्रेजी में ही नहीं, बल्कि मराठी, गुजराती, उड़िया, अरबी, बंगाली, संस्कृत, उर्दू समेत दस भाषाओं में बोले। वह बोलते जा रहे थे और संसद में मौजूद सभी लोग हतप्रभ थे। धुलेकर ने कहा, मुझे दस भाषाओं का ज्ञान है। पर, भारत को जोड़ने वाली भाषा हिंदी ही है, जिसे राजभाषा बनाया जाना चाहिए।

संविधान सभा में सबसे विवादास्पद विषय था भाषा । इस बात पर सबसे अधिक विवाद था की सदन में कौन सी भाषा बोली जाएगी , संविधान किस भाषा में लिखा जाएगा और किस भाषा को राष्ट्रीय भाषा का दर्जा दिया जाएगा। इस पर 10 दिसंबर 1946 का दिन ऐतिहासिक है ।

संयुक्त प्रांत से चुनकर आनेवाले आर. वी. धुलेकर (स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पंडित रघुनाथ विनायक धुलेकर का जन्म 1891 -1980, झांसी, शिक्षा कलकत्ता विश्वविद्यालय व इलाहाहाबाद विश्वविद्यालय) ने एक संशोधन विधेयक प्रस्ताव पेश किया । जब उन्होंने हिंदुस्तानी भाषा में बोलना शुरू किया तो सभा के अध्यक्ष ने उन्हें याद दिलाया कि बहुत सारे सदस्य उस भाषा को नहीं समझते जिस भाषा में वह बोल रहे हैं। इस पर धूलेकर का जवाब था, कि  जो लोग हिंदुस्तानी नहीं समझते हैं उन्हें इस देश में रहने का कोई अधिकार नहीं है । जो लोग भारत का संविधान बनाने के लिए इस सदन में मौजूद हैं, लेकिन हिंदुस्तानी भाषा नही जानते वे इस सदन के सदस्य रहने के काबिल नही हैं अच्छा हो वह सदन से बाहर चले जाएं, सदन में हंगामा मच गया , लेकिन धुलेकर ने अपना वक्तव्य जारी रखा और कहा प्रस्ताव करता हूं कि प्रक्रिया समिति अपना नियम अंग्रजी में न बनाकर हिंदुस्तानी भाषा में बनाए। धुलेकर ने अपना वक्तव्य जारी रखते हुए कहा, मैं अपील करता हूं की हमलोगों को, जिसने आजादी की लड़ाई जीती है और इसके लिए संघर्ष करते रहे हैं , अपनी भाषा में सोचना और अभिव्यक्ति करनी चाहिए । कितने धुरंधर , कितने दृढ़ निश्चय वाले थे हमारे वह पूर्वज जिन्होंने अपना सर्वस्व न्योछावर करके बिना कुछ पाने की उम्मीद के लीक से उतरे देश को केवल आत्मबल से ही लीक पर लाने का प्रयास करते रहे। शायद उनके मन ने एक दिवास्वप्न देखा था की हमारा आजाद भारत ऐसा होगा वैसा होगा शायद स्वर्ग से भी सुंदर ।
यह भाषाई बात इसलिए उठी थी कि भारत अब आजाद होने जा रहा था , लेकिन वर्षो तक अंग्रेजी भाषा और क्षेत्रीय भाषाओं के बल पर उसका  काम चलाता रहा , लेकिन अब जब देश आजाद होने जा रहा था, तो प्रश्न यह उठ रहा था कि किस  भाषा में संविधान लिखी जाए और उत्तर और दक्षिण के और पूरब पश्चिम के  राज्यों में सामंजस्य कैसे स्थापित हो ? उत्तर में गंगा के किनारे और उसके आसपास की भाषा अवधी , भोजपुरी, मैथिली, मारवाड़ी और भी कई अन्य भाषाओं की बोली समझ में आती थी । दूसरी बात यह की दक्षिण भारत के लोगों के लिए यह भाषाएं अपरिचित थी । पूर्वी और दक्षिण भारत के लोग असमी,बंगाली, उड़िया, तमिल और तेलुगू भाषा बोली जाती थी जिनके हरेक की अपनी लिपि थी और उनकी श्रेष्ठ कोटि की अपनी साहित्यिक परंपरा थी । इस मसले पर पुरुषोत्तम दास टंडन से खुलकर बहस हुई जो हिंदी को विदेशी प्रभावों से मुक्त करने के कट्टर हिमायती थे । टंडन अखिल भारतीय हिंदी साहित्य परिषद के उपाध्यक्ष थे, जिन्होंने मांग की थी की देवनागरी लिपि ही एक मात्र वह भाषा है, जिसके कारण   हिंदी ही इस देश की एकमात्र राष्ट्रभाषा हो सकती है राजर्षी पुरुषोत्तम दास टंडन 13 वर्षों तक उत्तर प्रदेश विधान सभा के अध्यक्ष रहे और उन्हें भारत रत्न से भी नवाजा गया ।

(साभार – अमर उजाला, चिरौरी न्यूज)

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