नैन नचाई, कह्यौ मुसक्याइ, लला ! फिर खेलन आइयो होरी

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प्रो. गीता दूबे

नमस्कार सखियों। आप सभी को होली की हुलास और मिठास भरी रंग -बिरंगी शुभकामनाएँ। सखियों, रंगों का त्योहार फिर से आ गया, हमारे सुख से सूखे जीवन में खुशियों की थोड़ी सी उजास भरने। क्या कभी आपने त्योहारों और मनुष्य के बीच के रिश्ते पर सोचा है। त्योहार, हमारे एकरस जीवन में खुशियों की सौगात लेकर आते हैं, श्रम से थके हुए मानव के जीवन में ऊर्जा का संचार करते हैंं। अगर स्त्रियों की बात करें तो उनके जीवन की सारी नीरसता इस त्योहार में घुल जाती है। हालांकि किसी भी त्योहार में कमरतोड़ मेहनत  स्त्री को ही करनी पड़ती है, वह चाहे घर की साफ- सफाई हो या सबकी जिह्वा को तृप्त करने के लिए पुए- पकवान बनाना हो। इसके बावजूद स्त्रियाँ अमूमन त्योहारों का स्वागत खुले दिल‌ से करती हैं और वह भी होली जैसा त्योहार जिसके आगमन की महक ही फिज़ाओं में मादकता घोल देती है। मन- प्राण बौरा सा जाता है और इसी बौराहट में सदियों से सामाजिक असमानता की बेड़ियों में जकड़ी स्त्रियाँ भी अपने बंधनों से मुक्त भले न हो पाएँ लेकिन मुक्ति का थोड़ा सा आस्वाद जरूर ले‌ लेती हैं। अपने प्रेमियों की मनुहार सुनकर मन ही मन खुश भी हो लेती हैं और प्रेमी भी अपनी प्रियाओं से इसी बहाने गले‌ लगाने की गुजारिश भी कर बैठते हैं-

“गले मुझको लगा लो ऐ दिलदार होली में

बुझे दिल की लगी भी तो ऐ यार होली में।” (भारतेन्दु हरिश्चन्द्र)

तो सखियों, होली की इस ठिठोली का आनंद स्त्रियाँ भी कमोबेश दिल खोलकर लेती हैं। पूरे उत्तर भारत के सामाजिक परिदृश्य को देखें तो “झुलनी का झटका” खाकर परदेश कमाने गये जीवन धन, साजन तीज- त्योहार के मौके पर ही घर लौट कर आते हैं और हर हाल में पति के बिना अधूरी पत्नियाँ एक ओर तो होली के हुलास से मगन हो जाती हैं तो दूसरी ओर पति के आने के उल्लास और खुमार में डूबकर प्रेम के रंग में सराबोर  हो जाती हैं। पति- पत्नी के बीच के इस हुलास और दाम्पत्य प्रेम का मादक वर्णन निराला ने बहुत खूबसूरती से किया है- 

“नयनों के डोरे लाल-गुलाल भरे, खेली होली !

जागी रात सेज प्रिय पति सँग रति सनेह-रँग घोली,

दीपित दीप, कंज छवि मंजु-मंजु हँस खोली-

                मली मुख-चुम्बन-रोली ।”

लब्बोलुआब यह है कि साल के बारहों महीने घूंघट की ओट से दुनिया को देखने वाली ये स्त्रियां भी होली के हुड़दंग में शामिल हो लेती हैं। अपने मन की करने का कुछ मौका उन्हें भी मिलता है और हर किसी के साथ होली के रंग में सराबोर होने का भी।  कहावत ही है कि “फागुन में बुढ़वा देवर लागे”।

लेकिन जरा सोचकर देखिए कि बूढ़े भी जब देवर की तरह छेड़छाड़ कर लेते हैं, होली के हुड़दंग में शामिल हो लेते हैं और कभी- कभी उनकी यह बुढ़भस इतनी ज्यादा बढ़ जाती है कि उसका जुल्म भी औरतों पर ही टूटता है। 

बात यह है सखियों कि होली के जश्न में महिलाएँ कितना भी शामिल क्यों‌ ना हो लें लेकिन फिर से‌ वही असमानता का सवाल मुँह उठाए खड़ा होता है कि इस उल्लासपूर्ण त्योहार का शिकार भी कभी -कभार औरतें ही बनती हैं, जिसके कई दृश्य किस्से- कहानियों और फिल्मों में पूरी भयावहता के साथ अंकित हुए हैं। होली की मादकता में जब नकली नशे की मात्रा ज्यादा घुल जाती है तो होली का मनभावन रंग फीका पड़ जाता है।  हालांकि साहित्य में बहुधा  इसका दूसरा ही  पक्ष पेश किया जाता है जहाँ नायिकाएँ होली में नायक के साथ जी भरकर मौज- मस्ती करती नजर आती हैं, पद्माकर की नायिका की बरजोरी तो देखने लायक है-

“फागु के भीर अभीरन तें गहि, गोविंदै लै गई भीतर गोरी ।

भाय करी मन की पदमाकर, ऊपर नाय अबीर की झोरी ॥

छीन पितंबर कंमर तें, सु बिदा दई मोड़ि कपोलन रोरी ।

नैन नचाई, कह्यौ मुसक्याइ, लला ! फिर खेलन आइयो होरी ॥”

होली का इसी तरह का एक रसीला प्रसंग रसखान भी रचते हैं, जब ब्रज की गोपियां श्याम को‌ होली के रंग में रंगने के लिए ललकार कर‌ घर से बाहर निकालती हैं-

“मोहन हो-हो, हो-हो होरी ।

काल्ह हमारे आँगन गारी दै आयौ, सो को री ॥

अब क्यों दुर बैठे जसुदा ढिंग, निकसो कुंजबिहारी ।

उमँगि-उमँगि आई गोकुल की , वे सब भई धन बारी ॥

तबहिं लला ललकारि निकारे, रूप सुधा की प्यासी ।

लपट गईं घनस्याम लाल सों, चमकि-चमकि चपला सी ॥

काजर दै भजि भार भरु वाके, हँसि-हँसि ब्रज की नारी ।

कहै ’रसखान’ एक गारी पर, सौ आदर बलिहारी ॥”

 ऐसा नहीं कि आम जिंदगी में ऐसे चित्र बिल्कुल विरल हैं। आम जीवन में भी गंवई गाँव की भाभियाँ दल बाँधकर अपने- अपने देवरों पर कई बार ऐसी ही बरजोरी करती हैं लेकिन ज्यादा संख्या ऐसी घटनाओं की है जहाँ देवरों की ज्यादतियों का शिकार भाभियां ही नहीं गरीबों की जोरूएँ भी होती हैं। वस्तुत: जो रस्में बीच की दूरियों को पाटकर आपसी सौहार्द बढ़ाने के लिए बनी थीं, वे कब ज्यादतियों का सबब बन गईं यह हमें पता ही नहीं चला। रंग के बहाने एक दूसरे पर बहुत बार कीचड़ भी पोता जाता है जिससे त्योहार दागदार हो जाता है। हास्य कवि माणिक वर्मा की पंक्तियां में कीचड़ और गुलाल दोनों मिलते हैं-

“कीचड़ उसके पास था, मेरे पास गुलाल

जो कुछ जिसके पास था, उसने दिया उछाल।”

वर्मा जी इस सद्भावनापूर्ण त्योहार के नकारात्मक पहलू की ओर भी संकेत करते हुए देश की वर्तमान परिस्थिति पर अत्यंत सूक्ष्म व्यंग्य करते हैं-

“जलीं होलियां हर बरस, फिर भी रहा विषाद,

जीवित निकली होलिका, जल-जल मरा प्रहलाद।”

तो सखियों, इस रंगों के त्योहार की यह खूबी होनी चाहिए कि हम एक-दूसरे को प्यार की बौछार से सराबोर करें और अपने मन में सदियों से जड़ जमाकर बैठी हुई हर प्रकार की असमानता को दूर करें। रंगों की बारिश में सब नहाकर अपने मन की कालिमा को धो डालें और एक दूसरे को स्नेह और सौहार्द्र के रंग से रंग दे। जिस तरह प्रकृति फागुन में चारों ओर‌ खुशनुमा रंग बिखेरती है, ठीक उसी तरह मानव को भी खुशियों के रंग ही बिखेरने चाहिए। कवि हरिवंश राय बच्चन के शब्दों में कहें तो-

“होली है तो आज अपरिचित से परिचय कर लो,

होली है तो आज मित्र को पलकों में धर लो,

भूल शूल से भरे वर्ष के वैर-विरोधों को,

होली है तो आज शत्रु को बाहों में भर लो!”

सखियों, होली का त्योहार मनाते हुए हमें कवि तारा सिंह की इस समझाइश को हमेशा ध्यान में रखना चाहिए-

“मिटे धरा से ईर्ष्या, द्वेष, अनाचार, व्यभिचार

जिंदा रहे जगत में, मानव के सुख हेतु

प्रह्लाद का प्रतिरूप बन कर, प्रेम, प्रीति और प्यार

बहती रहे, धरा पर नव स्फूर्ति की शीतल बयार

भीगता रहे, अंबर-ज़मीं, उड़ता रहे लाल, नीला

पीला, हरा, बैंगनी, रंग – बिरंगा गुलाल।”

आज विदा सखियों, अगले हफ्ते फिर मुलाकात होगी। तब तक आप लोग रंगों का त्योहार मनाइए और इन महानुभावों की पंक्तियों पर गौर फरमाइए। सोचेंगे तो जिंदगी अपने आप सुधर और निखर जाएगी। 

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