परम्परा को साधकर कविता रचती हैं विरंजीकुँवरि

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प्रो. गीता दूबे

सभी सखियों को नमस्कार। सखियों, साहित्य संसार का अवगाहन करने पर‌ पता चलता है कि ऐसी बहुत सी कवयित्रियाँ हुई हैं जिनके जीवन के बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं मिलती लेकिन उनकी कुछ रचनाओं को‌ शोधकर्ताओं ने अपने ‌प्रयत्नों से ढूंढ निकाला और उन्हें बचा कर रखा है। हालांकि उनकी रचनाओं में पारंपरिक स्त्री का स्वरूप और उसके कर्त्तव्यों का वर्णन ही प्रमुखता से हुआ है लेकिन इसके बावजूद संतोष इस बात का है कि उस युग में जब लड़कियों के लिए कविता करना तो दूर की बात थी लिखना पढ़ना ही तकरीबन निषिद्ध माना जाता थे, ये कवयित्रियाँ अपने सृजन के माध्यम से अपने होने का मतलब ढूंढने की कोशिश कर रही थीं। पारंपरिक जीवन मूल्यों के बीच जन्म लेकर‌ उन आदर्शों को‌ अपना जीवन मानने ‌वाली सत्री रचनाकारों से किसी बगावत की उम्मीद तो की नहीं जा सकती थी इसीलिए उन्होंने ‌जो और जैसा भी लिखा उसे उस युग की स्त्री रचनात्मकता के रूप में स्वीकार करके, युग विशेष के दस्तावेज के रूप में देखना चाहिए। पूरे मध्ययुगीन समाज में स्त्रियों के इर्द-गिर्द इतने बंधन थे कि स्त्री का मानव होकर जीना ही मुश्किल था। मैं पहले भी कह चुकी हूं कि इनसे मुक्ति का मार्ग इन स्त्रियों ने भक्ति में ढूंढा, वह चाहे देव भक्ति हो या पति भक्ति या फिर परंपरा भक्ति। लेकिन इस भक्ति को उपेक्षा की दृष्टि से देखने के बजाय इसके पीछे निहित कारणों को समझने की आवश्यकता है। मीरा अपने ढंग की अलग दुस्साहसी कवयित्री थीं लेकिन कुछ स्त्रियां ऐसी भी थीं जो समाज के बीच रहते हुए, उसके नियम-कायदों, मान्यताओं आदि को शिरोधार्य करके अपनी सीमा के भीतर रहकर लेखन कार्य कर रही थीं। उनकी रचनाओं में युग विशेष का जीवन और विचारधारा पूरी विश्वसनीयता के साथ वर्णित हुई है। ऐसी ही एक कवयित्री थीं- विरंजीकुँवरि जिन्होंने संवत 1905 में “सती- विलास” नामक ग्रंथ की रचना की।

विरंजीकुँवरि जी के जीवन के बारे में बहुत अधिक जानकारी नहीं मिलती। इनके जीवन से जुड़े तथ्यों की खोज करने के साथ इनकी रचनाओं का संकलन करने वाले‌ श्री ज्योतिप्रसाद मिश्र “निर्मल” अपनी पुस्तक “स्त्री कवि कौमुदी” में लिखते हैं – “इनकी मृत्यु कब हुई और इनका जन्म कब हुआ, इस संबंध में अभी ठीक ठीक पता नहीं चल सका‌” इनकी रचनाओं के बारे में भी वह लिखते हैं- “इनकी कविता साधारण दर्जे की है। लेकिन तो भी स्त्री होने के नाते से ये कविता साधारणतय अच्छी कर लेती थीं।” इनके बारे में इतनी जानकारी मिलती है कि वह जौनपुर के गढ़वाल‌ नामक गांव में रहती थीं। इनके पति का नाम साहबदीन था जो दुर्गवंशीय ठाकुर अमर सिंह के पुत्र थे। बचपन से काव्य -रचना का संस्कार इनके मन में अंकुरित हुआ था और अपनी कविताओं में प्राय: वह उपदेशात्मक शैली में स्त्री – कर्त्तव्यों के विषय में लिखती थीं। अपने जीवन के संबंध में भी इन्होंने अपनी रचनाओं में संकेत छोड़े हैं जिन्हें पढ़कर उनके मायके और ससुराल के संबंध में जानकारी मिलती है। अपने श्वसुर कुल का परिचय दोहा और सोरठा छंद में इन्होंने विस्तार से दिया है। देखिए-

“सूर्य्यवंश में रघु भये, रघुवंशी श्रीराम।

तासु तनय लवकुश भये, द्वीखित पूरन काम।।

द्वीखित वंश उदित भरे, दुर्गवंश महाराज।

तिलक जुक्त सब सोभिजे, सत्य, धर्म्म कर साथ।।”

इसी वंश परंपरा में आगे जाकर अमर सिंह होते हैं जो राम के परम भक्त हैं और राम की कृपा से ही इन्हें साहबदीन नामक पुत्र की प्राप्ति होती है-

“रामचंद्र के दास अमरसिंह मन वचन से।

पुत्र होने की आस, सेवो हरि-पद कमल दृढ़।।”

सेवत वंश गोपाल के, तेहि सुत साहिबदीन।

सो प्रभु तत्व विचार के, रहत ब्रह्म में लीन।।”

ऐसे ज्ञानी तथा ब्रह्मलीन पति की संगति में काव्य प्रतिभा से संपन्न विरंजीकुँवरि की कविता पर भक्ति और आध्यात्म का प्रभाव पड़ा। कहा जाता है कि वह अपनी कविताएँ अपने पति को सुनाया करती थीं और जीवन के अंतिम पड़ाव में आकर संभवतः पति की मृत्यु के उपरांत उन्होंने संन्यास- जीवन अपना लिया था तथा साधु संतों की संगति में रहा करती थीं। उन्होंने अपनी कविताओं में अपने ‌मायके का परिचय भी दिया है-

“अब भाखौ माइक अचल, काशी शुभ अस्थान।

जाके दरसन हेत हित, देव करहिं प्रस्थान।।

विमल वंश रघुवंश के, बहै बयार सरोह।

ग्राम नेवादा में विदित, मम पितु सीतलसींह।।

इससे यह स्पष्ट होता है कि वह काशी के नेवादा गांव में रहने वाले शीतल सिंह की पुत्री थीं। “सती- विलास” की कविताओं में इनके जीवन की कतिपय घटनाओं और स्थितियों के संकेत मिलते हैं। पारंपरिक भारतीय स्त्री की भांति पति-प्रेम और पति सेवा ही उनके ‌जीवन का उद्देश्य रहा और‌ वह तमाम स्त्री जाति को पातिव्रत्य की महिमा समझाना चाहती हैं। एक साधारण स्त्री की भांति वह अपने घर -परिवार एवं दांपत्य जीवन की परिधि के बाहर नहीं झांकती। उसी में खुश रहती हुई वह अपने जीवन को धन्य मानती हैं। विरंजीकुँवरि अपने आप को अत्यंत तुच्छ स्त्री के रूप में वर्णित करती हैं जिसे पति के प्रेम और साहचर्य, विद्वता तथा भक्तिभाव ने संवार कर असाधारण बना दिया। वह स्वयं को‌ गंवार कहती हैं जिसे पति ने स्वीकार ही नहीं किया बल्कि उनका उद्धार भी किया। “सती- विलास” जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है स्त्रियों को अपने सतीत्व को बनाए रख कर पति भक्ति में दत्तचित्त होकर जीवन यापन करने का उपदेश देता है। वह लिखती हैं कि स्त्रियों के लिए पातिव्रत्य ही सबसे बड़ा धर्म है-

“जाँचेउ धर्म्म पतिव्रत केरा, जाते करू सब धर्म बसेरा।।

का पतिव्रता का व्यवहारू, कवन धर्म्म तिये सुगति सिंगारू।।

कवन वर्त पति के पिय भाखो, जेहि हित जीय देह में राखों।।

अब पिय निरनय देहु बताई, मैं गंवारी कछु जानि न पाई।।”

इसी पति प्रेम या पति भक्ति की अभिव्यक्ति उनके काव्य में बारंबार हुई है। वह बताती हैं कि पति की संगति में ही उन्होंने वेद- पुराणों का ज्ञान प्राप्त किया, शास्त्रों का अध्ययन किया एवं पति भक्ति से भगवद्भक्ति तक का रास्ता तय किया। उस कालखंड की स्त्रियों के लिए पति ही एकमात्र देवता था और उसकी चरणों की भक्ति में ही मुक्ति मिलती थी। इसी भाव की कुछ अन्यान्य काव्य पंक्तियों में भी हुई है-

“तीरथ सो कछु नेम नहीं, अरु जानत नहीं कछु देव पुजारी।

चाल कुचाल हमें नहिं मालुम, यातै कहें सब लोग गँवारी।।

ज्ञान विवेक कहा लहै नारि, सदा जेहि निर्धन संत विचारी।

तातै “विरंजि” विचारि कहै, मोहि देहु सियापति कंत सो यारी।।

अर्थात तमाम तीर्थ -व्रत, पूजा -पाठ पर पति का सानिंध्य और उसका प्रेम भारी है। जिस तरह ईश्वर की भक्ति से तमाम कष्टों से मुक्ति मिलती है, ठीक उसी तरह पति भक्ति की राह पर चलकर तुच्छ से तुच्छ स्त्री भी मुक्ति पा सकती है, यही समझाना कवयित्री का उद्देश्य है। इसी भाव का एक और पद देखिए-

“होइ मलीन कुरूप भयावनि, जाहि निहार घिनात है लोगू।

सोऊ भजे पति के पद-पंकज, जाइ करें सति लोक में भोगू।।

ताहि सराहत हैं विधि शेष, महेश बखानै बिसारि के जोगू।

यातै “बिरंजी” विचारि कहै, पति के पद की तिय किंकरि होगू।।”

जिस समाज में पति के बिना स्त्री का कोई अस्तित्व ही नहीं है, उसमें स्त्री का पतिव्रता होना और पातिव्रत्य की महिमा का बखान करना कोई बड़ी बात नहीं थी। कबीर जैसे विद्रोही कवि ने भी पतिव्रता स्त्री की प्रशंसा में दोहों की रचना की थी-

“पतिबरता मैली भली, काली, कुचिल, कुरूप ।

पतिबरता के रूप पर, बारौं कोटि स्वरूप ।।

तथा

“पतिबरता मैली भली, गले काँच को पोत ।

सब सखियन में यों दिपै , ज्यों रवि ससि की जोत ॥”

सखियों, जब सारा समाज आदर्श स्त्री उसी को मानता था और है जो‌ अपने पति को देवता समझकर उसकी पूजा करे और स्वयं को‌ उसकी दासी समझे, इस स्थिति में विरंजीकुँवरि जैसी पारंपरिक स्त्री ने अपनी कविताओं में उसी सत्य को अभिव्यक्ति किया जो उस समय के समाज का सच था। आज भी यह सच पूरी तरह से बदला नहीं है। आज भी आधुनिकता का परचम फहराने वाली स्त्रियाँ भी तीज और करवा चौथ जैसे व्रत उपवास करती हैं और पति की पूजा भी करती हैं। स्थितियों में तब तक बदलाव नहीं आएगा जब तक हमारा मानस परिवर्तित नहीं होगा और हम सही अर्थों में आधुनिक तथा प्रगतिशील नहीं बनेंगे।

 

 

 

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