पशु – पक्षियों और पर्य़ावरण को सुन्दर बना रहे हैं ‘ग्रीन मैन’ तुहिन

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लक्ष्‍मी शर्मा

गंगारामपुर, (दक्षिण दिनाजपुर) : ‘दर्द तो दर्द होता है, चाहे इंसान में, या जानवरों में। वहीं जीव का वास पेड़, पैधों के साथ जीवन दायिनी नदियों में भी। बचपन से जब कभी पशु-पक्षियों को घायल होने के साथ किसी प्रकार की दर्द या पीड़ा होता देख मेरा दिल खुद को पीड़ित महसूस करने लगाता था। वहीं जीवन दायिनी नदियों के जल की दशा, जो कभी प्‍यास बुझाने का करती थी, आज इतनी प्रदूषित है और इसका पानी जहर बन रहा है।  इसी पीड़ा के बोझ से मन हमेशा विचलित रहता था। अचानक इस सभी बातों को लेकर हमेशा सोचना, इनके निराकण के उपायों पर बचपन से अध्‍ययन करना मेरा एक उद्देश्‍य बना।’  ये कहानी है तुहिन की, जो इन शब्दों में अपनी कहानी बताते हैं। अपनी यादों को ताजा करते हुए तुहिन बताते हैं कि धीरे-धीरे हम बचपन से दूर हुए और युवावस्था में कदम रखते ही पर्यावरण के सन्तुलन में अपनी भूमिका निभाने की तैयारी कर ली। इस तरफ परेशानियों ने मुझे घेर रखा था, परंतु दिल में दूसरे के दर्द का एहसास, पर्यावरण व नदियों की दयनीय दशा को देख मैं अपने पथ पर लगातार बढ़ता गया। और हुआ ये कि लोग जुड़ते गए और कारवां बढ़ता गया और यहीं शुरू होती है एक यात्रा।  बताते चलें क‍ि उत्‍तर बंगाल में आज पर्यावरण का दूसरा नाम बन गया है, ‘तुहिन शुभ्र मण्डल’ हलांकि लोग उन्हें ‘ग्रीनमैन’ के नाम से भी जानते हैं।  तुहिन अपितु दक्षिण दिनाजपुर जिले के साथ-साथ पूरे उत्‍तर बंगाल में अपनी साधना के कारण पर्यावरण संरक्षण का अलख जगा रहे हैं। पर्यावरण है, तो जीवन है, पर्यावरण नहीं तो जीवन नहीं यह हम सब जानते हैं लेकिन पर्यावरण के लिए प्रकृति के लिए पशु पक्षियों के लिए आज किसी के पास समय नहीं है ऐसे में लोगों की प्रेरणा छोटे बच्चों के आइडल और पर्यावरण का रक्षक कहे जाने वाले तुहिन शुभ्र मंडल का जीवन में एक ही मकसद है कि पर्यावरण को बचाना है उसे सुरक्षित रखना है और दिन प्रतिदिन उसे बढ़ाना है।

दक्षिण दिनाजपुर जिले में स्थानीय रूप से रहने वाले तुहिन पड़ोसी देश बांग्लादेश, भूटान में भी पर्यावरण अलख जगा रहे हैं। जिसके कारण पड़ोसी देश में भी बड़ी उपलब्धि हासिल कर चुके हैं। उन्होंने बातचीत में बताया कि बचपन से ही मुझे एक अजीब सा आर्कषण था, इसलिए पशु-पक्षी उन्हें भाते थे, उनकी पीड़ा उनसे देखी नहीं जाती थी। जैसे जैसे वह जीवन में बड़े होते गए उनका पर्यावरण के प्रति झुकाव बढ़ता चला गया। उम्र के 18 साल से ही पेड़ पौधे नदी पशु-पक्षी को ग्रीनमैन के नाम से बुलाता है। तुहिन ने बताया कि पहले अकेले चला था, पर अब कई संस्थाएं मेरे साथ काम करती हैं पशु पक्षियों को लेकर पेड़ पौधों को लेकर हम पेड़ों को सिर्फ लगाकर नहीं छोड़ते बल्कि उन्हें सुरक्षित बड़ा होने तक उनकी देखभाल करते हैं। क्‍योंकि सिर्फ लगाकर छोड़ देने से यह काम समाप्त नहीं होता है उनकी देखभाल करना जब तक वह मजबूत और बड़े ना हो जाए। मेरा एक सपना है कि आने वाली युवापीढ़ी को पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक करना है। ताकि वो पर्यावरण की अनदेखा न कर सके, और नहीं तो हमे मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा। उन्होंने बताया कि पर्यावरण संरक्षण के लिए जहां मुझसे स्‍थानीय लोग जुड़ रहे हैं, वहीं पर्यावरण से जुड़ी दिल्ली मुम्बई, बंगलुरु, बांग्लादेश की ढाका में पर्यावरण के सेमिनार में शामिल होने का अवसर मिला जहां पर्यावरण संरक्षण पर दिये गए मेरे संदेश को लोगों ने सराहा। उन्‍होंने कहा कि वर्तमान समय में पर्यावरण असंतुलित हो रहा है, आने चक्रवती तूफानों जैसे अम्‍फान की वजह से पेड़-पौधों को काफी नुकसान भी हुआ। ऐसे में हम सबकी जिम्‍मेदारी है, पर्यावरण के लिए आगे आएं और पौधे लगाकर पर्यावरण संरक्षण में योगदान दें, तभी हमारी प्रकृति हमें जीवन दे पाएगी। मालूम हो कि लॉकडाउन के दौरान घायल पशुओं को इलाज के लिए तुहिन की संस्थाओं ने बीड़ा उठा रखा है। इतना ही नहीं, उनके खाने के लिए भी इंतजाम किए जाते है। वहीं जिले से गुजरने वाली सबसे बड़ी नदी आत्रेई और पुर्ननवा की प्रतिवर्ष हम कई बार हम साफ सफाई करते है। लोगों को जागरूक करते है कि को गंदगी नदियों में न फेके।

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