पहली बार घर की दूरी क्या होती है ये समझ आ गई

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प्रशस्ति प्रख्यात नृत्यांगना हैं और कबीर एवं बुद्ध की रचनाओं के अतिरिक्त साहित्य की धरोहरों का सम्बन्ध नृत्य से जोड़कर उनको लोकप्रिय बना रही हैं। 

( आज ये बात बता रही हूँ उन तमाम लड़कियों को जो थोड़ा जूझती है जब स्कूल से कॉलेज का सफ़र तय करती है)

“माँ लंच बॉक्स तैयार है ? हाँ बेटा नया बैग, नया सूट, और एक बोतल पानी, मैं निकली घर से माँ के दिए हुए 185 रूपये बड़े पापा ने जैसे जैसे रास्ते को बताया था, बी. एच. यू तक जाने के लिए वैसे ही जा रही थी बिल्कुल शांत क्योंकि मैं बोलती ही नहीं थी। तक़रीबन कंधे पर 300 घुघरूँ बैग में लिए पहले दिन लंका जाना तो ऑटो वाले ने गलत सुना और मुझे लहरतारा छोड़ दिया। 11:30 बजे क्लास शुरु होनी थी मैं दुपट्टा नही सँभाल पा रही थी लेकिन हमें सूट में ही कॉलेज जाना होता था। माँ अपना फ़ोन दे देती थी ताकि उनको पता लगता रहे की मैं कहाँ पहुँची ? बीच में माँ ने फ़ोन किया :कहाँ पहुँची? “मैंने उनको बोला : “माँ सुनो डरना मत। मैं लंका की बजाय लहरतारा आ गई फिर एक लहरतारा से कैंट जाने वाली बस को पकड़ा और उतर गई कैंट पर। वहाँ से ऑटो लिया लंका का फिर रास्ते का खौफ़ ख़त्म हो गया कही भी निकलूंगी पहुँच ही जाऊँगी मंजिल पर। जो एकदम नये सूट में तैयार थी वो लगभग डर से पसीने से भीग चुका था, फिर वहाँ से 4 बजे निकलती तो वैसे ही घर जाती ये सिलसिला चलता रहा। एक दिन एक ऑटो चालक ने मेरे बगल में एक प्लास्टर लगे आदमी को बैठाया। फिर क्या था आधे रास्ते अपने सीने से लगाये अपने बैग को मैं खिड़की पर दुबक कर बैठी थी लेकिन शायद उसके गिरेपन की दाद देनी पड़ेगी। उस प्लास्टर लगे हाथ से मेरे बैग नहीं बोलूँगी, सीने पर मारने की कोशिश नाक़ाम रही। फिर क्या था मैंने उसको घूरा और ज़ोर से चिल्लाकर बोला – ‘जरा तमीज़ से जो हाथ टूटा है ना पूरा तोड़ दूँगी’ और ऑटो को रोक कर बीच रास्ते में उतर गई।  शायद पापा और बुआ के सानिध्य में कराटे सीखने का रौब भी था। ये बात किसी को पता नहीं फिर क्या उस समय के बाद कभी नहीं डरी। ना ही ऐसे पुरुषों से ना उनके स्वभाव से ।आज जब कुछ आँखे घूरती है तो मैं उससे ज्यादा ही घूर देती हूँ, पहली बार घर की दूरी क्या होती है ये समझ आ गई।

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