पुस्तक समीक्षा – टुकड़ा टुकड़ा सच काव्य संग्रह पढ़ते हुए

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– डॉ. वसुंधरा मिश्र

सत्ता प्राप्ति के खेले हैं नित नए निराले खेले हैं
नाच नाच कर करतब अजीब दिखा रहे हैं
लगा कर मुखौटे देशभक्ति जता रहे हैं
ये पंक्तियाँ जोधपुर राजस्थान के रमेश बोराणा की हैं जो स्वयं राजनीति की बारिकियों से रूबरू हैं। राजस्थान मुख्यमंत्री के संस्कृति सलाहकार, राजस्थान कला साहित्य संस्थान जोधपुर के संस्थापक अध्यक्ष के साथ-साथ कई महत्वपूर्ण पदों पर प्रतिष्ठित हैं।
रमेश बोराणा सबसे पहले एक संवेदनशील व्यक्ति हैं जो राजनीति में रहते हुए भी अपने शब्दों को ईमानदारी से कविता में ढालते हैं। कवि नाट्यकला के पारखी हैं। रंगकर्मी होने के साथ बहुप्रतिभा के धनी हैं। गद्य , पद्य, नाटक, निबंध, समसामयिक आलेख, जैन फिल्मों के गीतकार, स्तवन, स्क्रिप्ट आदि विविध विधाओं पर आपकी लेखनी चलती रही।
हिंदी और राजस्थानी भाषा पर समान अधिकार रखने वाले कवि ने प्रेम, प्यार, मोहब्बत, जीवन दर्शन आदि पर अपनी लेखनी चलाई है। एक रंगकर्मी का यह काव्य संग्रह निश्चित रूप से विविध अनुभवों का संग्रह साबित होगा। राजस्थान के वरिष्ठ रंग अभिनेता, निर्देशक लेखक रंग तकनीकी विशेषज्ञ के रूप में राष्ट्रीय पहचान हासिल करने वाले कवि रमेश बोराणा ने सौ से अधिक नाटकों में अभिनय, सत्रह का निर्देशन, नौ नाटकों का लेखन, मंचन, प्रसारण किया है, कई पुरस्कार भी मिले हैं। जीवन अनुभवों का टुकड़ा टुकड़ा सच 74 कविताओं की बगिया है जो अँधेरे से उजाले की ओर जाने की यात्रा करवाती है। पहली कविता ‘अंधेरे की ख़ामोशी ‘में महाभारत में फैले षडयंत्र के पासों से उपजा यह संसार अंधेरों की ख़ामोशी को उजागर करती हैं। कवि आपसी विश्वास और आशा के दीपक जलाने का संदेश देता है क्योंकि वह उन्हीं सड़कों से होकर गुजरा है। ‘अनहद नाद’ कबीर दास जी के अनहद नाद की ओर ले जाती है जहाँ कवि’ अहं ब्रह्मास्मि ‘ की गंभीरता को समझाने का प्रयास करता है। वह फटकारता नहीं है बल्कि ज्ञान बघारने वालों पर व्यंग करता है –
जीवन ज्ञान बघारने वालों
अभी खुद से खुद की पहचान बाक़ी है
अभी तो जहांँ सारा बाक़ी है
समझने की समझ अभी बाक़ी है
कुछ ही समझे हैं
बहुत कुछ बाक़ी है (टुकड़ा टुकड़ा सच, पृष्ठ 15)
जीवन इतना आसान नहीं है। मनुष्य सोचता है वह सर्वशक्तिमान है, सबकुछ कर लेगा। अपने इस झूठे अहंकार से निकलना होगा। अहंकार को छोड़ना होगा–
सफ़र ज़िन्दगी का पार नहीं होता मंसूबी घोड़ों से
ये जहाँ अनंत है
जो चलता है अपनी ही फ़ितरत से
ऐ मैं सुन
चल उठ वक्त को पहचान लेते हैं
चल उठ नियति को समझ लेते हैं (पृष्ठ 14)
कवि कहता है – –
दोस्त दूरियांँ बेशक रखना
पर दिल को नजदीक ही रखना (पृष्ठ 15)
वर्तमान समय की विभीषिका से कवि चिंतित है–
पहचानो तुम /लौट आओ /पांवों तले की जमीन /धंसने से पहले (पृष्ठ 16)
अपने अस्तित्व के प्रति कवि आश्वस्त है क्योंकि उसका अस्तित्व सर्वकालिक है – – जंगल में आदमी है या /आदमी में जंगल और अजगर कौन है? जो सबको अपने – अपने सामने सबके अस्तित्व को नकारता है।
कवि बैचेन है वह आदमी को ढूँढता है। उसके अहसास को, उसके चरित्र को, उसके मुखौटों को, उसके दंभीपन को, उसकी निर्दयता को जिसने धर्म – मज़हब को बाज़ारू और मज़ाक बनाकर रख दिया है – –
‘दो मुंँहा हो गया है आदमी ‘और ‘सत्य से भटक गया है’ आदमी /अपने ही साये से /डरने लगा है आदमी यह कैसी विडंबना है (पृष्ठ 19-20)।कवि मनुष्य के इस भयावह जंगल में ‘भयावह अर्थहीन विदूषक सा लगता है’ वह ‘अज़ानों’ व ‘आरतियों’ के बेसुरे सुर से दुखी है लेकिन जानना चाहता है कि आस्था के पर्दे में हाथ डाले कौन है?( पृष्ठ 21) समाज के ऐसे लोगों से दुखी है जो इस तरह के भ्रम फैला रहे हैं। अच्छा इंसान कैसे बनाया जाए, इस पर विचार करता है – नियति अटल /नहीं मिलता इक कुँआ दूजे कुएँ से कभी /ज़िन्दा है इंसानियत तो आओ इंसान से मुलाकात को निकलो( पृष्ठ 22) ‘कविता क़ागजी पहचान का मोहताज़ है आदमी’ कविता में वर्तमान व्यक्ति की पहचान काग़ज़ों तक सिमट कर रह गई है। ‘कोरा कागज’ में प्रतीकात्मक प्रयोग है जहाँ उस ‘मासूम’ पवित्र और निश्छल व्यक्ति को बदरंग बना दिया जाता है। ‘खंडित अक्षर’ में ढाई अक्षर वाले शब्द ‘प्यार’ को अभिशप्त माना है क्योंकि जिसका ‘पहला हर्फ़ ही खंडित है’ तो वह क्या देगा। कवि की यह कल्पना उसकी अनूठी सोच है जो पाठकों के साथ एकमतता दर्शाती है।
वह युद्ध मिलने – बिछुड़ने का मेला, टूटे ख़वाबों का मंजर, बेसुधी, बेखुदी, अरमानों की अर्थी, बर्बादी, विरह का आर्तनाद, मृगतृष्णा का समंदर, भ्रम आदि से वाकिफ़ है लेकिन ‘प्यार’ को जिसने समझा है, उसके लिए सबकुछ है (पृष्ठ 25)।
‘बूंँदे छोटी-छोटी ‘कविता में ‘धरा आंँगन को तृप्ति’ देने वाली छोटी-छोटी बूंँदों के महत्वपूर्ण योगदान को बताया गया है जो जीवन को रंगों से भर देती हैं। बूँदों से ही सागर भरते हैं।
कवि अकेले ही रहना चाहता है क्योंकि उसने दुनिया को अच्छी तरह देख लिया है इसलिए उसे लोगों की संगत से डर लगता है (पृष्ठ 27)’ घुटन’ कविता में जीवन के सत्य को दर्शाया है जहांँ ‘भीतर और बाहर घुटन ही घुटन है’ जिसे कवि ‘सृष्टि का कालचक्र’ मानता है।’चाह की राह’ कविता में जागरण गीत गाता कवि ‘भरोसे का मंगल गीत’ और ‘धोरों पर सोनल दांडी ‘बनाने का आह्वान करता है।उसकी नज़रों में जननायक वही बन सकता है जो’ जन के मन ‘में चढ़ जाए।
दूसरों का कल्याण करना ही ‘सत्य कर्म’ का पालन करना है, मानवता की सेवा करने वाले सेनानी ही सच्चे पुजारी हैं।
देश की आन- बान – शान और गौरव पर लिखी कविता ‘जय जय तिरंगा’ में देश के लिए प्राणों तक को न्योछावर करना हर देशवासी का धर्म माना है क्योंकि ‘जन – मन की धड़कन है तिरंगा’। कवि विश्व गौरव की कामना करता है।उसका मानना है कि मनुष्य जीवन मिला है तो अवसर भी मिला है। अवसर का लाभ उठाने का संदेश देता और अपने देश के लिए लिए हर देशवासी को अपने-अपने क्षेत्र में कार्यों को करते हुए ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की भावना रखनी चाहिए। छोटे-मोटे संघर्षों से घबड़ाना नहीं चाहिए, कवि ऐसी दृष्टि रखता है।
संपूर्ण रूप से कोई भी व्यक्ति सब कुछ न प्राप्त कर सकता है और न ही पूरा कर पाता है। हम जितना ही जीवन और संसार के पास जाते हैं, सोचते हैं, देखते हैं, उससे कहीं और ‘अनंत अथाह पहेली है ‘यह संसार। (पृष्ठ 39)
यह सच है कि हम अलग – अलग धर्म, जन्म – मरण, ईश्वर – अल्लाह, गॉड, धर्म सब अलग – अलग टुकडों में समझते हैं। इंसान के व्यवहार में ‘सबका अपना टुकड़ा टुकड़ा सच है ‘तो सूरज – चाँद एक ही क्यों है?, मनुष्य का खून और उसकी पीड़ा का अहसास एक क्यों है? कवि निष्ठा – भरोसा और समर्पण को हर मनुष्य की पूंँजी उस सत्य को मानता है जो वह टुकड़े टुकड़े में समझता है।
कवि प्रकृति के झरने की बात करता है जो चट्टानों के थपेड़े खाकर भी ऊपर से अविरल गिरता है, अपनी चोटों को सीने में छिपा लेता है। डॉ एस एन सुब्बाराव की राष्ट्र भक्ति का अलख जगाते हैं। कवि का मानना है कि धर्म, मजहब, नैतिक मूल्य, गाँधी का सपना देश धर्म निभाने वाले ही अंँधेरे में उजाले खोज रहे हैं, ऐसे लोग धन्य हैं। तभी भारत स्वराज प्राप्त कर सकता है। (पृष्ठ 40)
गाँधी को शुद्ध विचारों में खोजा जा सकता है – –
मैं मरा नहीं हूँ
न ही कहीं गया हूँ
* * *
सत्य – अहिंसा में
अस्तेय – अपरिग्रह
सत्याग्रह – अनशन में
शुद्ध विचारों में
गाँधी हर एक व्यक्ति के हृदय में शुद्ध विचारों के रूप में विराजित हैं।
झरना, तितली, मोह लिप्सा, धूप, नारीत्व, नियति, परछाइयाँ, पानी, पसीना, समंदर, बेटी की अभिलाषा, माँ, रंग, रिश्ते, घुंँघरू, मुझमें, होली, धूल, हिम्मत आदि कई कविताएँ कवि की विभिन्न संवेदनाओं को नए रंग प्रदान करती हैं जिनमें वह बच्चा बन जाता है। निश्छल और सत्य का संधान करता है। ‘षड्यंत्र हो गया हो जैसे’ , ‘महाभारत’, ‘वक्त का कमाल’ , ‘बाजार’ , ‘यह बहुरूपियों के टोले हैं’ , ‘सुन सके तो सुन वक्त’आदि कविताएँ कवि के विविध तेवर की कविताएँ हैं।
वर्तमान राजनीति की बखिया उधेड़ते दिखाई पड़ता है कवि – –
वाचालता से जन – मन को बहला लेते हैं
कुर्सी भी धड़ल्ले से हथिया लेते हैं (पृष्ठ 78)

वर्तमान परिस्थितियों से कवि दुखी है,’ ख़ुद को इंसान कहते हुए भी शर्म आती है ‘और व़क्त के चेहरे को काग़ज़ पर उतार कर उसे कोसता है (पृष्ठ 86)।
ख़ामोशी भी बिना कुछ कहे बहुत कुछ कह जाती है – –
चुप्पी से शब्द को औक़ात बता देती हैं
अल्फाज़ कंगूरों की मानिंद जता देते हैं
ख़ामोशियाँ नींव भाँति भार छुपा लेती हैं।( पृष्ठ 90)इस संघर्षों से भरे संसार में वह पीछे नहीं हटता, सभी को प्रोत्साहित करता है। कवि आशावादी है और वह हौसला देता है – –
यह सारा फ़लक तेरा है
हर सफलता तेरे कदमों में है (पृष्ठ 91)
समाज में स्त्री के अस्तित्व को सही स्थान न मिलने पर दुखी और पीड़ा से भरा हुआ है और उसको इस सृष्टि की संवाहिका मानता है।
‘माँ’ कविता में स्त्री कहती है, ‘स्नेह, प्यार और वात्सल्य से पगी /एक स्त्री होती हुई भी /आखिर/जननी ही तो हूँ तुम्हारी’ (पृष्ठ 65)।
माँ से होती हुई एक स्त्री की जीवन यात्रा के सभी रूपों पर चार भागों में लिखी लंबी कविताएँ उसका प्रमाण है।
‘अपेक्षा’ और ‘उपेक्षा’ इन अचूक मंत्रों से कवि मनुष्य मात्र को आश्वासन देता है कि जीवन को सुखद बनाने के ही ये दो मंत्र काफ़ी है।
अंधेरों से उजाले की ओर कवि की रचनात्मक यात्रा है ‘टुकड़ा टुकड़ा सच ‘ मन का उजास की सकारात्मक सोच लिए समाप्त होती है जहाँ वह इसी निष्कर्ष पर पहुँचता है कि – – ‘गर ढूंँढना ही है /किसी को तो /अपने भीतर ढूंँढ वह तो वहीं बैठा है /तेरे इंतजार में /उसके लिए चिराग़ नहीं /मन का उजास चाहिए (पृष्ठ 96)
कवि रमेश बोराणा ने उर्दू और हिंदी के शब्दों का प्रयोग किया है जो बोलचाल में रचे बसे हुए हैं। शिल्प विधान की दृष्टि से कहीं – कहीं शिथिलता दिखाई पड़ती है। कवि ने भारतीय संस्कृति और संस्कार के भावों को प्रमुखता से लिखा है जो रचनाकार की प्रमुख विशेषता है कवि का प्रथम संस्करण 2021 में प्रकाशित काव्य संग्रह ‘टुकड़ा टुकड़ा सच’ का आवरण पद्मश्री शाकिर अली, जयपुर द्वारा रेखाओं का उत्कृष्ट रेखांकन है।मात्र 150 रूपये की यह पुस्तक राजस्थानी ग्रंथागार, प्रथम मंजिल , गणेश मंदिर के सामने, सोजती गेट, जोधपुर – 342001 से प्रकाशित हुई है।
कला और संस्कृति के संरक्षण और विकास के लिए प्रतिबद्ध रंगकर्मी रमेश बोराणा के मित्र उपन्यासकार और शायर ने ‘दो शब्द’में सही लिखा है, ‘सादगी में सौन्दर्य इनकी कविताओं का गुण है जिसे इन्होंने राजनीति में रहते हुए भी बरकरार रखा। – – – किताब के बगैर बात नहीं बनती’।

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