प्रकृति प्रेम का प्रतीक है सामाजिक सांस्कृतिक त्योहार : छठ पर्व

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– सुषमा राय पटेल

हम अपने अस्तित्व के लिए सूर्य देवता के ऋणी हैं जाति,पंथ और धन की सीमाओं को पार कर लोग इस त्योहार को मनाने के लिए एक साथ एकत्रित होते है।मैं भी अपने परिवार के साथ छठ पर्व मनाने के लिए तैयार हो रही थी उसी समय एक फोन आया ‘दीदी आप तो छठ करती हैं ,क्या आप बतला सकती हैं कि नहाय -खाय ,खरना,सझकी अर्ध्य और सुबह का अर्ध्यदान कब करना हैं? अनमनस्कता की वजह से मैं पुनःउस व्यक्ति से पूछती हूँ… आप कौन बोल रहे है? उन्होंने कहा “दीदी मैं गोकुल मुरारका बोल रहा हूँ।” आप तो व्रत करती हैं इसीलिए मुझे धआपसे व्रत के दिन के बारे मे जानना था क्योंकि मैं कई वर्षों से यह व्रत करता आ रहा हूँ और इस बार भी करूँगा।उन्होंने यह भी कहा की मैं माड़वारी हूँ बचपन से मेरे मन में यह था कि मैं बड़ा होकर प्रकृति पूजन के इस श्रेष्ठ व्रत को करूँगा और मैं कर रहा हूँ। सुनकर मै छठ पूजा जो कि सूर्य और उनकी बहन छठी मइया के प्रति समर्पित व्रत का रहस्य समझने में लग गई ।
ऋग्वेद की सूर्य सूक्ति “येना पावक चक्षसा भुरण्यन्तं जहां अनु।त्वं वरूण पश्यसि।।” के महत्ता के बारे में सोचने लगी।
लोक आस्था का महापर्व चार दिवसीय छठ कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष के षष्ठी को मनाया जाता है।यह लोकपर्व मुख्य रूप से पूर्वी भारत के बिहार, झारखंड पूर्वी उत्तरप्रदेश,मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ समेत देश के विभिन्न क महानगरों में हम छठ मनाते हैं ।भारत के अलावा नेपाल सूरीनाम तथा विश्वभर में प्रवासी भारतीयों द्वारा यह व्रत धूमधाम से मनाया जाता है।हिंदुओं की इस पूजा की यही विशेषता है कि इसमें किसी मूर्ति विशेष की पूजा नहीं की जाती बल्कि प्रकृति के अनंत सत्ता की आराधना की जाती है।
जगत की आत्मा सूर्य देव को कहा जाता है क्योंकि वे पृध्वी पर जीवनशका आधार है। उनके आलोक को अपनी चेतना में धारण करने से जीवन प्रकाशित हो उठता है। के प्रति श्रद्धा का यह पर्व परवातिन नामक उपासक जो कि आम तौर पर महिलाओं होती है।सादगी और पवित्रता के साथ कठोर तपस्या वाला त्योहार लिंग-विशिष्ट त्योहार नहीं है। पृथ्वी पर जीवन की आवश्यक तत्वों को बहाल करने लिए तथा जीवन निर्वाहन सूर्य को सच्चे मन से आभार की अभिव्यक्ति ही छठ पूजा है।

 

30/10/2019

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