प्रेमचन्द

0
160
विवेक कुमार साव
ठाकुर का कुँआ

जो अब
कदाचित्
सूख चुका है
क्योंकि अब कोई नहीं
जाना चाहता
ठाकुर के कुएं के पास,
आज प्रेमचन्द होते
तो शायद लिखते
कहानियाँ नलों पर,
जिनकी पाइपें जुड़ी होती हैं
एक ही किसी बड़ी टंकी से।
और इस विमर्श के दौर में
लोग उन्हें जब
इससे निकाल कहते
स्वकेन्द्रित अनुभव वाला रचनाकार।

प्रेमचन्द भी तब ज़ार-ज़ार रोते।

©

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

14 − 5 =