प्रेम तथा समर्पण के माध्यम से भक्ति की जोत जलाने वाली सहजो बाई

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सखी सुन 19

सभी सखियों को‌ नमस्कार। सखियों मैं पहले भी बहुत बार कह चुकी हूं कि स्त्री लेखिकाओं को साहित्य संसार में स्थापित के लिए बहुत संघर्ष करना पड़ता है और प्राय: देखा जाता है इतिहास में जगह बनाने के लिए भी स्त्री रचनाकारों को बहुत मशक्कत करनी पड़ती है।

प्रो. गीता दूबे

चूंकि इतिहास लेखन की महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारी पुरुष रचनाकारों के मजबूत कंधों पर रही इसलिए महिलाओं के रचनात्मक योगदान को उन्होंने नकारा भले ही ना हो लेकिन खुले मन से स्वीकार भी नहीं ही किया। मध्ययुगीन भक्त कवयित्रियों में मात्र मीराबाई के अवदान को स्वीकार किया जाता है, बाकियों का तो नामोल्लेख करना ही काफी समझा जाता है। मध्ययुगीन भक्त कवयित्रियों में मीराबाई के अलावा दयाबाई और‌ सहजोबाई का उल्लेख अवश्य मिलता है लेकिन इनके‌ बारे में विस्तार से जानकारी नहीं मिलती। सखियों, आज मैं आपको निर्गुण काव्य धारा की कवयित्री सहजोबाई की रचनात्मकता से परिचित करवाऊंगी जिनके जीवन के बारे में बहुत कम जानकारी मिलती है।

सहजोबाई का जन्म 25 जुलाई 1725 को दिल्ली के परीक्षितपुर नामक स्थान में हुआ था। उनका संबंध राजपूताने के ढूसर कुल से था। उनके पिता का नाम हरिप्रसाद तथा माता का नाम अनूपी देवी था। वह स्वामी चरणदास की योग्य शिष्या थीं। सहजोबाई के गुरु भाई जगजोत सिंह ने‌ उनके गुणों की प्रशंसा करते हुए लिखा है-

“चरणदास की शिष्य दृढ़, सहजोबाई जान

ताकी दृढ़ गुरुभक्ति पर, जोगजीत कुर्बान।।”

कहा जाता है कि 11 वर्ष की उम्र में सहजोबाई का विवाह तय हुआ था लेकिन एक दुर्घटना में उनके होनेवाले पति का देहांत हो गया और सहजोबाई ने आजीवन अविवाहित रहने का निश्चय किया तथा ईश्वर की भक्ति में अपना जीवन समर्पित कर दिया। एक दूसरी कहानी के अनुसार उनके विवाह के समय उनके गुरु चरणदास भावी दंपति को आशीर्वाद देने के लिए वहाँ आए और उन्होंने सहजोबाई को संबोधित करके कहा-

“सहजो तनिक सुहाग पर कहा गुदाये शीश।

मरना है रहना नहीं, जाना विश्वेबी।।”

गुरु की यह वाणी सुनकर सहजोबाई विवाह की वेदी से उठ गईं और आजीवन अविवाहित रहने का निश्चय किया। भक्तिकाल के अन्यान्य भक्त कवियों की गुरु भक्ति का वर्णन तो बहुत ही आदरभाव के साथ किया जाता है लेकिन सहजोबाई की गुरु भक्ति भी अत्यंत उच्च कोटि की थी।‌ वह गुरु के बताए मार्ग पर चलती हुई गुरु को ईश्वर से भी ऊंचा दर्जा देती थीं। एक क्षण के लिए वह ईश्वर को भूल सकती थीं लेकिन गुरु के प्रति उनका समर्पण अद्भुत था-

“राम तजूँ पै गुरु न बिसारूँ, गुरु के सम हरि कूँ न निहारूँ।”

सहजोबाई का एकमात्र प्रामाणिक ग्रंथ मिलता है, सहजप्रकाश, जिसके बारे में यह जनश्रुति है कि सहजोबाई ने गुरु के आशीर्वाद और‌ ईश्वर के प्रसाद से मात्र 18 वर्ष की उम्र में ही इस ग्रंथ की रचना कर डाली थी। दोहे, चौपाई, कुंडलियां आदि छंदों का प्रयोग सहजोबाई ने सहजता से किया है। भक्ति काल के बहुत से कवियों की भांति ही वह अपने आपको कवि नहीं भक्त मानती थीं जिन्होंने भक्ति के निमित्त कविता की है। कविता इनके लिए साधन है, साध्य नहीं। ऊनकी भक्ति भी जितनी ज्यादा गुरु के प्रति है, उतनी ईश्वर के प्रति नहीं

“सहजो’ कारज जगत के, गुरु बिन पूरे नाहिं ।

हरि तो गुरु बिन क्या मिलें, समझ देख मन माहि।।”

कबीर दास के दोहे “गुरू गोविंद दोउ खड़े की छाप निम्नलिखित दोहे पर दिखाई देती है-

“परमेसर सूँ गुरु बड़े, गावत वेद पुराने।

‘सहजो’ हरि घर मुक्ति है, गुरु के घर भगवान ।।”

और इसीलिए वह गुरु को ही भगवान के रूप में देखती हैं। हालांकि सहजोबाई निर्गुण ब्रह्म की आराधक थीं लेकिन उनके भक्तिपूरित उद्गारों में बहुत बार सगुण और‌ निर्गुण के बीच का भेद मिटता दिखाई देता है। निम्नलिखित पद ऐसा ही है जिसपर मीराबाई के पद “मेरे तो गिरधर गोपाल..” की छाप सहजता से लक्षित की जा सकती हैं लेकिन अंतर इतना है कि सहजोबाई भक्ति की पराकाष्ठा में ईश्वरमय नहीं गुरुमय हो जाती हैं-

“मेरे इक सिर गोपाल और नहीं कांउ भाई.

आइ बैस हिये मांहिं और दूजा ध्यान नाहिं,

मेरे तो सर्बस उन और हिताई बोई॥

जाति हू की कान तजा, लोक हू की लाज भजी,

दोनों कुल माहिं बनी, कहा करै सोई॥

उघरी है प्रीति मेरा, निहचै हुई वाकी चेरा,

पहिरि हिये प्रेम बेरा, टूटै नहिं जोई॥

मैं जो चरनदास भइ, गति सति सब खोइ दई,

‘सहजो’ बाई नहीं रही, उठि गई दोई।”

संसार की क्षणभंगुरता और सांसारिक नातों की स्वार्थपरता पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने उपदेशात्मक शैली में लिखा-

“सहजो जीवत सब सगे, मुए निकट नहिं जायं

रोवैं स्वारथ आपनै, सुपने देख डरायं।”

भक्ति कालीन अधिकांश कवि प्रेम पर बल देते हैं, वह चाहे कबीर हों या जायसी। मीराबाई तो प्रेम दीवानी हैं ही और सहजोबाई भी प्रेम की सरसता ही नहीं महत्ता के प्रति भी आश्वस्त दिखाई देती हैं। प्रेम दिवाने भक्त ही जीवन का वास्तविक आनंद पा सकते हैं-

प्रेम दिवाने जो भये पलटि गयो सब रूप।

‘सहजो’ दृष्टि न आवई, कहा रंक कहा भूप॥

प्रेम दिवाने जो भये, नेम धरम गयो खोय।

‘सहजो’ नर नारी हंसैं, वा मन आनँद होय॥

प्रेम दिवाने जो भये, ‘सहजो’ डिगमिग देह।

पाँव पड़ै कितकै किती, हरि संभाल जब लेह॥

प्रेम लटक दुर्लभ महा, पावै गुरु के ध्यान।

अजपा सुमिरन करत हूँ, उपजै केवल ज्ञान॥”

गुरु के प्रति पूर्णतया समर्पित और प्रेम तथा समर्पण के माध्यम से भक्ति की जोत जलानेवाली, निर्गुण और सगुण के बीच सामंजस्य स्थापित करनेवाली भक्त कवयित्री सहजोबाई की मृत्यु 26 जनवरी 1805 में वृंदावन में हुई। इनकी भक्ति भी सराहनीय है और कवित्त भी लेकिन हिंदी साहित्य के इतिहास में इन्हें जो जगह मिलनी चाहिए थी वह नहीं मिली। सहजोबाई के व्यक्तित्व और कृतित्व के प्रति श्रद्धा ज्ञापित करती हुई, आज की कहानी मैं यहीं समाप्त करती हूँ।

1 COMMENT

  1. गीता सखी, इतिहास के पन्नों में दबा दी गई स्त्री-रचनाकारों को प्रकाश में लाने का आपका कार्य निश्चय ही स्तुत्य है। स्त्री के बौद्धिक व्यक्तित्व को अपेक्षित पहचान न देने, उसकी उपेक्षा करने का सिलसिला सदियों से रहा है। असमानतापूर्ण सामाजिक व्यवस्था के अंतर्गत बहुत सी स्त्री रचनाकारों में अपनी सहज जन्मजात प्रतिभा और रचनात्मक ऊर्जा के बल पर अपने आप को स्थापित किया, लेकिन इतिहास में वे जिस न्यायोचित सम्मान की वे हक़दार थीं, अधिकांश को नहीं मिला।
    संत कवयित्री सहजोबाई की रचनाएँ प्रेम और भक्ति में पगी हैं। गुरू भक्ति में लीन सहजोबाई के लिए गुरू का महत्व ईश्वर से ऊपर है, गुरू के प्रति समर्पण की यह पराकाष्ठा अद्भुत है।
    सखी, अभी तक पुरुष रचनाकारों के ‘मज़बूत कंधों’ पर इतिहास लेखन की ज़िम्मेदारी थी, लेकिन अब स्त्री रचनाकार अपने ‘मज़बूत कंधों’ पर ज़िम्मेदारी उठा कर इतिहास के पन्नों से निकाल कर उन्हें यथोचित स्थान दिलाने का यह भरसक प्रयास सचमुच महत्वपूर्ण है।

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