प्रेरक है केरल की पहली ट्रांसजेंडर महिला डॉक्टर प्रिया की कहानी

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कोल्लम : कोल्लम के एस एन पब्लिक स्कूल से पढ़ाई के दौरान ट्रांसजेंडर जीनू के मन में अपनी पहचान पाने की जद्दोजहद हावी थी। उन्हीं दिनों जीनू के पैरेंट्स ने उसकी नोटबुक के पन्ने पर यह लिखा हुआ देख लिया था कि यही वो वक्त हैं जब मुझे अपनी असली पहचान पा लेना चाहिए। जीनू के माता-पिता को अपने बेटे के लिए चिंता हुई लेकिन वे क्या हल निकाले, ये खुद भी नहीं समझ पा रहे थे। कुछ दिनों बाद जीनू के माता-पिता को ये लगने लगा कि उसे कोई मानसिक बीमारी है और वे उसका हल तलाशने लगे। उसे मनोचिकित्सक से चेकअप कराने की बात भी होने लगी। उसके माता-पिता चाहते थे कि वे एक लड़के की तरह रहे। लेकिन जीनू की भावनाएं एक लड़की के समान थी। ऐसे ही तमाम हालातों के बीच जीनू ने 2008 में वैद्य रत्नम आयुर्वेद कॉलेज से ग्रेजुएशन किया। 2012 में कर्नाटक के केवीजी आयुर्वेद मेडिकल कॉलेज, दक्षिणा कन्नड़ से पोस्ट ग्रेजुएशन की डिग्री ली। फिर त्रिशूर के सीताराम आयुर्वेद हॉस्पिटल से उसने अपने मेडिकल करियर की शुरुआत की। डॉक्टर बनने के बाद वो दिन भी आया तब जीनू ने अपनी मां से सेक्स रिअरैंजमेंट सर्जरी कराने की मांग की। उसकी मां इस सर्जरी के लिए राजी हो गई। जल्दी ही परिवार के अन्य लोगों की सहमति से जीनू ने 2018 में कोची के रेनाई मेडिसिटी से हॉर्मोन ट्रीटमेंट लिया। उसके बाद पिछले साल उसने सेक्स रिअरैंजमेंट सर्जरी कराई। इस तरह जीनू लड़की बनीं और उसने अपना नाम प्रिया रख लिया। उन्हें केरल की पहली ट्रांसजेंडर डॉक्टर होने का गौरव प्राप्त है। प्रिया को इस बात की खुशी है कि सर्जरी के बाद उन्होंने अपनी पहचान पा ली है। वे अन्य पैरेंट्स से कहना चाहती हैं कि अपने बच्चे को उसी रूप में स्वीकार करें, जैसा वो है। समाज के लोगों की परवाह करके उसकी सच्चाई को सबसे छिपाकर न रखें।

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