यूपीएससी – प्रेरणा देती हैं इन मेधावी युवाओं की कहानियाँ

0
74

नयी दिल्ली। सफलता के लिए एक कीमत अदा करनी होती है। संघर्ष करना होता है। कुर्बानियां देनी होती हैं। देश की सबसे प्रतिष्ठित सेवा संघ लोक सेवा आयोग ने इस परीक्षा का अंतिम परिणाम जारी किया। इस रिजल्ट में देश के वैसे इलाकों से भी युवा पास हुए हैं जिनको अपने जीवन में कई झंझावातों का सामना करना पड़ा। कोई मजदूर का बेटा है तो किसी के घर के हालात ऐसे नहीं थे कि वह इस परीक्षा की तैयारी कर सके। लेकिन कहते हैं न सोना तपकर ही ‘कुंदन’ बनता है। तो इस परीक्षा में भी ऐसे कई कुंदन निकले हैं जिन्होंने मुसीबतों का सामना करके, छोटे शहरों के होकर भी बड़ी उपलब्धि हासिल की है।

कर्ज लेकर परिवार का गुजारा, अब आईएएस
बिहार के मुजफ्फरपुर के रहने वाले विशाल कुमार को संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा में 484वां स्थान मिला है। विशाल के पिता मजदूरी किया करते थे। बाद में उनके पिता का साया भी सिर से उठ गया। ऐसे में मां ने परिवार का पेट पालने के लिए कर्ज लिया और अपने बेटे की पढ़ाई को जारी रखा। शुरू से ही विशाल काफी तेज तर्रार छात्र रहे हैं। उन्होंने 10वीं में अपने जिले में पहला स्थान हासिल किया था। मां ने अपने बेटे को आगे बढ़ाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। विशाल ने अपनी मेहनत और प्रतिभा के दम पर आईआईटी जैसे परीक्षा में भी सफलता हासिल की और IIT कानपुर से केमिकल इंजीनयरिंग में ग्रेजुएशन किया। उन्होंने देश की इस सबसे प्रतिष्ठित परीक्षा की जमकर तैयारी की और इसमें सफलता का परचम लहरा दिया।

लेखपाल की नौकरी, 1 साल की छुट्टी..केदार की सफलता की कहानी 
उत्तर प्रदेश के गोरखपुर सदर तहसील में तैनात लेखपाल केदारनाथ शुक्ल ने आईएएस बनने की कहानी किसी सपने के जैसा है। नौकरी करते हुए केदारनाथ को तैयारी करने में मुश्किलों का सामना करना पड़ता था। लेकिन केदारनाथ ने मन में ठान लिया था तो ऊपर वाले ने भी उनकी मदद की। केदारनाथ के आईएएस बनने का सपना साकार करने के लिए जिले के आईएएस अधिकारी कुलदीप मीना और सुमित महाजन ने प्रेरित किया। यही नहीं, केदारनाथ के वरिष्ठों ने उन्हें तैयारी करने के लिए एक साल की छुट्टी तक दे दी। आपने मां-बाप के एकलौते बेटे केदारनाथ ने यूपीएससी में 465वीं रैंक हासिल की है। लेखपाल पद का निर्वहन करते हुए केदारनाथ शुक्ल के बारे में आईएएस व जॉइंट मैजिस्ट्रेट कुलदीप मीना व सुमित महाजन को पता चला तो उन्होंने केदारनाथ से बात की, उन्हें प्रेरित किया और तैयारी के लिए एक साल की छुट्टी दिलाई। अधिकारियों का बल मिला तो केदारनाथ ने जुनून के साथ तैयारी शुरू कर दी। मेहनत रंग लाई और केदारनाथ ने आखिरकार संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली।

अंशु प्रिया, असफलता से सफलता की कहानी
बिहार के मुंगेर की रहने वाली अंशु प्रिया पेशे से चिकित्सक हैं। लेकिन अब उनका नया पेशा लोक सेवक का होगा। यूपीएससी परीक्षा में उन्हें 16वीं रैंक मिली है। हालांकि, अंशु के लिए ये सब इतना आसान नहीं था। डॉक्टर की नौकरी छोड़कर यूपीएससी परीक्षा की तैयारी करने वाली अंशु को शुरुआत के दो प्रयास में असफल रही थीं। लेकिन उन्होंने इससे बिना घबराए तीसरी बार प्रयास किया और इस बार उन्होंने इस परीक्षा में सफलता हासिल कर ली। अंशु के पिता शिक्षक हैं जबकि मां गृहिणी हैं। अंशु ने अपनी सफलता से साबित किया कि अगर लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित रखें तो कुछ भी असंभव नहीं है।

एमपी के कृष्णपाल की कहानी
मध्य प्रदेश के कृष्णपाल राजपूत के आईएएस बनने की कहानी आपको प्रेरित करेगी। वकील पिता और आंगनवाड़ी सहायिका के बेटे कृष्णपाल शुरू से ही प्रतिभावान रहे हैं। निवाड़ी जिले के ओरछा के रहने वाले कृष्णपाल ने अपना लक्ष्य पाने के लिए चार साल तक तपस्या की और अपने पहले ही प्रयास में 329वीं रैंक हासिल कर ली। पिता रामकुमार ने बताया कि उनके बेटे ने छोटी उम्र में ही प्रशासनिक सेवा में जाने का लक्ष्य बना लिया था। 12वीं की परीक्षा पास करने के बाद से वे अपनी कॉलेज की पढृाई के साथ सिविल सर्विसेज परीक्षा से संबंधित जानकारियां जुटाने लगे थे। इसीलिए वे परिवार की सुख-सुविधा को छोड़ ग्वालियर गए थे।

15 साल तक ‘संन्यास’, तब आईएएस परीक्षा में सफलता
बिहार के नवादा जिले के रोह प्रखंड के रहने वाले आलोक रंजन ने यूपीएससी परीक्षा में 346वीं रैंक पाई है। आलोक की इस परीक्षा को पास करने की यात्रा काफी मुश्किलों वाली रही है। आलोक 15 साल तक घर नहीं गए थे। उनकी जिद थी कि जबतक वह आईएएस नहीं बनेंगे घर नहीं आएंगे। आलोक के पिता नरेश यादव और मां सुशीला देवी शिक्षक हैं। आलोक ने 2007 में मैट्रिक नवादा के जीवनदीप पब्लिक स्कूल से किया था। उसके बाद वह कोटा चले गए थे, जहां से इंटरमीडिएट की पढ़ाई पूरी की। उसके बाद इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय नई दिल्ली से स्नातक किया। आलोक ने 2015 में यूपीएससी की तैयारी शुरू की थी। कड़ी मेहनत के बाद सातवें प्रयास में आलोक को सफलता मिली

दिल्ली की आयुषी, ‘बंद’ आंखों से सफलता
सफलता के लिए मानसिक और शारीरिक रूप से मजबूत होना जरूरी होता है। दिल्ली की आयुषी शर्मा इसका जीता जागता उदाहरण हैं। यूपीएससी की परीक्षा में 48वां रैंक हासिल करने वाली आयुषी 100 प्रतिशत दृष्टिहीन हैं। लेकिन उनकी सफलता में ये मुश्किल बाधा नहीं बन सकी और उन्होंने मेहनत के जरिए देश की इस सबसे प्रतिष्ठित सेवा में सफलता हासिल की। अपने चौथे प्रयास में सफल होने वाली आयुषी अपने स्कूल में हमेशा से टॉपर रही हैं। वह मुबारकपुर स्थित स्कूल में इतिहास की लेक्चरर रही हैं। वह अपनी तैयारी के लिए रात में कम सोती थीं।

(साभार – नवभारत टाइम्स)

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

eighteen − 17 =