बांग्ला साहित्य और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम पर संगोष्ठी

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कोलकाता । साहित्य अकादेमी द्वारा अकादेमी सभागार, कोलकाता में ‘‘बांग्ला साहित्य और भारतीय संग्राम’’ विषयक द्विदिवसीय संगोष्ठी आयोजित की गयी। संगोष्ठी का उद्घाटन नेताजी सुभाष मुक्त विश्वविद्यालय, कोलकाता के कुलपति प्रो. रंजन चक्रवर्ती द्वारा किया गया। अपने उद्घाटन भाषण में उन्होंने भारतीय राष्ट्रवाद की प्रारंभिक अवधारणा और बांग्ला साहित्य पर इसके प्रभाव की चर्चा करते हुए 1920-30 के दौरान प्रकाशित बांग्ला साहित्य में उसके चित्रण को संदर्भित किया। संगोष्ठी का बीज भाषण करते हुए प्रख्यात विद्वान श्री शमीक बंद्योपाध्याय ने स्वतंत्रता की अवधारणा, संदर्भ और महत्ता पर विचार करते हुए बंकिमचंद्र के ‘बंगदर्शन’, रवींद्रनाथ ठाकुर के ‘नैवेद्य’ और काजी नजरूल इस्लाम के ‘सर्वहारा’ को संदर्भित किया। उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता करते हुए प्रख्यात साहित्यकार और अकादेमी के महत्तर सदस्य श्री शीर्षेन्दु मुखोपाध्याय ने कहा कि साहित्य के प्रभाव की बात करते हुए हमें यह भी याद रखने की जरूरत है कि आखिर साहित्य पढ़नेवालों की संख्या कितनी थी। आरंभ में औपचारिक स्वागत करते हुए अकादेमी के सचिव डॉ. के. श्रीनिवासराव ने रंगलाल से आरंभ करके भारतीय स्वतंत्रता विषयक अभिव्यक्तियों को मुखर करनेवाले साहित्यकारों का अद्यतन उल्लेख किया। संगोष्ठी में आरंभिक वक्तव्य रखते हुए अकादेमी में बांग्ला भाषा परामर्श मंडल के संयोजक डॉ. सुबोध सरकार ने रवींद्रनाथ ठाकुर के ‘घरेबाइरे’ और नजरूल इस्लाम की ‘विद्रोही’ कविता तथा रवींद्रनाथ एवं गाँधी को संदर्भित करते हुए अपनी बात रखी। सत्र का संचालन करते हुए अकादेमी के क्षेत्रीय सचिव डॉ. देवेंद्र कुमार देवेश ने सत्रांत तें औपचारिक धन्यवाद ज्ञापन किया।

संगोष्ठी का प्रथम सत्र ‘बांग्ला साहित्य और स्वतंत्रता संग्राम: अभिव्यक्ति एवं स्वीकार्यता’ पर केंद्रित था। इस सत्र में प्रो. अचिंत्य विश्वास, डॉ. पायल बसु और प्रो. सुमिता चक्रवर्ती ने अपने आलेख प्रस्तुत किए। संगोष्ठी का द्वितीय सत्र ‘1947: तत्कालीन बांग्ला साहित्यकार, चिंतक एवं स्वतंत्रता संग्रामी: पारस्परिक संबंध’ विषय पर केंद्रित था, जिसके अंतर्गत सर्वश्री अभ्र घोष, बारिदबरण घोष एवं गौतम घोषाल ने अपने आलेख प्रस्तुत किए। संगोष्ठी का तृतीय सत्र ‘1947 के पूर्ववर्ती बांग्ला साहित्य में स्वतंत्रता संघर्ष का चित्रण’ विषय पर केंद्रित था, जिसमें श्रीमती अनुराधा राय, श्री देवेश चट्टोपाध्याय और श्रीमती उर्मि रायचौधुरी ने अपने आलेख प्रस्तुत किए। सत्रों का संचालन अकादेमी के कार्यक्रम अधिकारी डॉ. मिहिर कुमार साहू ने किया। प्रथम दिन की अंतिम प्रस्तुति के रूप में फिल्म्स डिविजन, भारत सरकार के सौजन्य से ‘इंडिया इंडिपेंडेंट’ शीर्षक वृत्तचित्र का प्रदर्शन किया गया।
साहित्य अकादेमी द्वारा अकादेमी सभागार, कोलकाता में ‘‘बांग्ला साहित्य और भारतीय संग्राम’’ विषयक द्विदिवसीय संगोष्ठी के अंतिम दिन समापन भाषण देते हुए विद्यासागर विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. शिवाजी प्रतिम बसु ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के संदर्भ में  राष्ट्रीयता की अवधारणा और बांग्ला साहित्य पर इसके प्रभाव पर अपने विचार प्रस्तुत किए। उन्होंने कहा कि  बांग्ला साहित्य का विकास प्रति-उपनिवेशवादी राष्ट्रीयता के समय में हुआ। उन्होंने कहा कि बंकिमचंद्र ने जिस राष्ट्रवाद की नींव रखी, उसे हिंदू राष्ट्रवाद के नाम से जाना जाता है, जबकि रवींद्रनाथ ठाकुर ने राष्ट्रवाद के प्रचलित सिद्धांत पर सवाल उठाए। इस सत्र की अध्यक्षता करते हुए प्रो. तपोधीर भट्टाचार्य ने राष्ट्रवादी बांग्ला साहित्य का आधुनिक दृष्टि से मूल्यांकन प्रस्तुत किया। इस अवसर पर समाहार वक्तव्य देते हुए डॉ. सुबोध सरकार ने स्वतंत्रता के विभिन्न स्वरूपों की चर्चा की। इस सत्र का संचालन अकादेमी के क्षेत्रीय सचिव डॉ. देवेंद्र कुमार देवेश ने किया।
समापन सत्र के पूर्व आयोजित संगोष्ठी के पाँचवें सत्र में श्री अशोक मुखोपाध्याय, श्री चंदन सेन और प्रो. गोपा दत्त भौमिक ने ‘1947 के बाद के बांग्ला साहित्य में चित्रित स्वतंत्रता संघर्ष’ विषयक अपने आलेख प्रस्तुत किए। छठा सत्र ‘साहित्य: हथियार अथवा दर्पण’ विषय पर केंद्रित था। इस सत्र में श्री अशोक कुमार गांगुली, प्रो. इप्शिता चंदा एवं प्रो. समर्पिता मित्र ने अपने आलेख प्रस्तुत किए। इन सत्रों का संचालन डॉ. मिहिर कुमार साहु ने किया। संगोष्ठी की अंतिम प्रस्तुति के रूप में फिल्म्स डिविजन, भारत सरकार के सौजन्य से ‘इंडिया विंस फ्रीडम’ शीर्षक वृत्तचित्र का प्रदर्शन किया गया।
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