बागी औरतें, जिनकी जिद ने औरतों के लिए खोला आसमान

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नयी दिल्ली । एक वक्त था जब दुनिया को अहसास ही नहीं था कि कोई गैर-बराबरी का मसला है। तब से लेकर आज तक कई चीजें बदलीं और आगे भी इनके बेहतर होने की गुंजाइश है। सैकड़ों साल के संघर्ष में ऐसी कई महिलाएं आईं जो अपने वक्त से बहुत दूर तक देख सकती थीं।
इन महिलाओं ने ही दिखाया कि कहां-कहां पर उनके लिए कम जगह छोड़ी गई है। अपने वक्त से आगे चलने वाली इन महिलाओं को बेवकूफ, सनकी, पागल, गद्दार और अपराधी तक करार दिया गया, लेकिन इनकी नीयत और समझ दोनों साफ थी। इसलिए वक्त ने उन्हें सही साबित किया। जानते हैं ऐसी ही महिलाओं को –
जब महिलाओं ने एक दिन की हड़ताल से ठप कर दिया पूरा देश
एक टापू जैसे छोटे से देश आइसलैंड में 1975 में महिलाओं के एक दिन के फैसले ने दुनिया को हिला दिया। घर और दफ्तर में होने वाले भेदभाव के खिलाफ इन महिलाओं ने एक दिन अपने काम से छुट्टी ले ली। न दफ्तर गईं, न चूल्हा-चौका किया और न ही बच्चे संभाले। उस दिन इस देश की 90 फीसदी महिलाएं सड़कों पर उतरीं और जमकर नारेबाजी की। मौका था यूनाइटेड नेशंस का इस साल को महिला वर्ष घोषित करना।
इस हड़ताल को ‘आइसलैंडिक वुमंस स्ट्राइक’ के नाम से जाना जाता है और इस दिन को ‘लॉन्ग फ्राइडे’ भी कहा जाता है। यानी इतना लंबा दिन कि पूरे देश के पुरुषों के लिए इसे काटना भारी पड़ गया। पुरुषों को बच्चों को ऑफिस लेकर जाना पड़ा और सारे दफ्तर रोते-भागते बच्चों से भर गए। महिलाओं ने खाना नहीं बनाया तो सुपर मार्केट में सारे फूड पैकेट खत्म हो गए। बच्चों को मनाने के लिए पुरुषों ने सारी गिफ्ट्स शॉप खाली कर दीं। अगले साल ही सरकार को एक जैसे काम की एवज में बराबर वेतन का कानून बनाना पड़ा।
सूज़न बी एंथनी: ऐसी महिला जो वोट डालने के लिए अदालत से भिड़ गयीं
महिलाओं की वोटिंग राइट्स को लेकर सूज़न बी एंथनी ने अदालत से सीधी लड़ाई लड़ी। 1872 में अमेरिकी राष्ट्रपति के लिए वोटिंग हो रही थी। सूज़न अपनी 14 सहेलियों के साथ गईं और वोटिंग की। तब महिलाओं के पास वोटिंग राइट्स नहीं थे। सूज़न को तीन दिन बाद गिरफ्तार कर लिया गया। सूज़न की निडरता को देखने के लिए उस दिन अदालत में देश भर का मीडिया मौजूद था। कोर्ट में सूज़न ने बेबाकी से कहा कि ये कानून पुरुषों के बनाए हैं। जज उसे शांत रहने को कहते रहे, लेकिन सूज़न चुप नहीं रही। जज ने उसे गलती मानने को कहा, उसने इनकार कर दिया।
उन पर 100 डॉलर का फाइन लगाया गया तो उन्होंने भरने से इनकार कर दिया। जब रिकवरी करने को उनके घर मार्शल भेजा गया तो वहां से एक भी ऐसी चीज नहीं मिल सकी, जिसे नीलाम करके 100 डॉलर वसूले जा सकें। सूज़न के मरने के 58 साल बाद महिलाओं को कानूनी तौर पर वोट डालने का हक मिला।

बॉबी गिब और कैथरीन: जिन्होंने महिलाओं को दौड़ने का हक दिलाया
न्यूरोसाइंटिस्ट बॉबी गिब को सिर्फ दौड़ना पसंद था। एक दिन वो अपने पिता के साथ बोस्टन गईं और वहां हर साल आयोजित होने वाली मैराथन देखा। इतने सारे पुरुषों को एक साथ दौड़ता देखना उनके सपनों को पंख दे गया।
अगले दिन से ही वह मैराथन की प्रैक्टिस करने लगीं और दो साल की तैयारी के बाद बोस्टन मैराथन के लिए अप्लाई कर दिया, लेकिन, लड़की होने की वजह से उन्हें ठुकरा दिया गया। 1966 की मैराथन में वह भाई के कपड़े पहनकर भाग लेने पहुंचीं, लेकिन उन्हें पहचान लिया गया। पहचान उजागर होने के साथ ही वो इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गईं।
बॉबी की जैसी ही एक लड़की और थी कैथरीन स्वाइटज़र। लिटरेचर और जर्नलिज्म की छात्रा कैथरीन ने 1967 के मैराथन में भाग लिया। रेस के मैनेजर को जब पता चला कि मैदान पर एक लड़की भी दौड़ रही है तो वह रेस में कूदा और उसे खींचकर बाहर करने आ गया, लेकिन, कैथरीन नहीं रुकीं। उन्होंने रेस खत्म की। इन दोनों लड़कियों के इस कारनामे के बाद 1972 में महिलाओं को आधिकारिक मैराथन में शामिल किया गया।
दुनिया को आलू और वोदका का स्वाद चखाने वाली महिला वैज्ञानिक
स्वीडन में एक महिला कृषि वैज्ञानिक हुईं। ईवा एकेब्लाड ने इंसानों को आलू का स्वाद चखाया। न केवल आलू, बल्कि इससे वोदका निकालकर दिखाई जो पहले रूस और फिर दुनिया भर में पसंदीदा शराब बनी। ईवा की इस खोज से पहले आलू मुर्गियों और भालुओं को खिलाया जाता था। ईवा ने पाया कि आलू में भरपूर मात्रा में स्टार्च होता है, जो एनर्जी का अच्छा स्रोत है।
1746 में ईवा ने अपने खेतों और रसोई में खाने को लेकर प्रयोग शुरू किए। ईवा ने आलू के फूलों का भी बखूबी इस्तेमाल किया और उससे ब्यूटी प्रोडक्ट्स बनाए। ईवा सिर्फ लैब तक नहीं सिमटी रहीं। वह यूरोप में महिलाओं को डायन बताकर जलाने के खिलाफ खड़ी होने वाली सबसे पहली महिलाओं में से एक थीं। ​​​​​​
इकबाल बानो: जिसकी साड़ी और दमदार आवाज से हिल गया था तानाशाह
इकबाल बानो ने जिया उल हक के तानाशाही के दौर में अपनी एक नज्म से इंकलाब की मुहिम छेड़ दी थी। तब महिलाओं के साड़ी पहनने या इंकलाबी गीतों को गाने पर रोक थी। लाहौर के अलहमरा आर्ट्स काउंसिल के ऑडिटोरियम में 1986 की 13 फरवरी की रात इतनी भीड़ उमड़ी कि पैर रखने की जगह नहीं थी। बानो ने काली साड़ी पहनी थी और बैन शायर फैज अहमद फैज की नज़्म “हम देखेंगे” गाई थी। वह प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो को फांसी दिए जाने के विरोध में थीं।
पुलिस ने इस प्रोगाम की सारी रिकॉर्डिंग जब्त कर ली थी, लेकिन एक कॉपी चोरी-छिपे स्मगल हो गई। इसके बाद इकबाल बानो की शोहरत दिन दूनी और रात चौगुनी हो गयी।
ओरियाना फल्लाची: जिसके नाम से ललचाते और कांपते थे तानाशाह
इटली की ओरियाना फल्लाची ऐसी पत्रकार थीं, जिससे दुनिया भर के तानाशाह खौफ खाते थे और अपना इंटरव्यू करवाना भी चाहते थे। ओरियाना का मशहूर कथन था कि अगर उसे कभी भगवान मिलता तो वह उससे सवाल पूछती कि अगर उसने जीवन का आविष्कार किया तो मृत्यु क्यों दी? उन्होंने आयतुल्ला खुमैनी, गद्दाफी, जुल्फिकार अली भुट्टो, यासिर अराफात और चीनी तानाशाह डेंग जियाओ पिंग का इंटरव्यू लिया।
खुमैनी के सामने इंटरव्यू में हिजाब पर बात इतनी गहमागहमी तक पहुंची कि ओरियाना ने इसे उतारकर फेंक दिया। ओरियाना की इंदिरा गांधी से अच्छी दोस्ती थी और इंदिरा ने उससे कहा था कि मेरे चारों ओर इतने बेवकूफ लोग हैं, मैं कैसे काम करूं, समझ नहीं आता।
इंटरव्यू के दौरान चीनी तानाशाह डेंग एक बार ओरियाना पर चिल्लाने लगा लेकिन ओरियाना उसकी सादगी, विनम्रता और होशियारी से बहुत प्रभावित हुईं। डेंग ने 3 घंटे का इंटरव्यू खत्म होने के बाद खुद पूछा था कि क्या वह उसका एक इंटरव्यू और करना चाहेंगी और ओरियाना ने उसे चूम लिया था। ओरियाना ने पूर्व अमेरिकी विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर से कुबूल करवा लिया था कि वियतनाम युद्ध व्यर्थ था।
(साभार – दैनिक भास्कर)

 

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