भटकाव से बचकर, परस्पर सख्य में बंधकर ही पूरा होगा स्त्री की मुक्ति का स्वप्न

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प्रो. गीता दूबे

सभी सखियों को नमस्कार और साथ ही अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की ढेर सारी शुभकामनाएँ, देर से ही सही। सखियों, हर साल की तरह इस साल भी महिला दिवस आया और चला भी गया। कुछ संस्थाओं ने काव्य गोष्ठी का आयोजन किया तो कुछ ने परिचर्चा का और इस तरह महिला दिवस मनाने की रस्म अदायगी कर ली गई। कुछ प्रबुद्ध वर्ग की जागरूक महिलाएँ जिन्हें महिला दिवस और उसके महत्व के बारे में पता है, उन्होंने तो महिला दिवस पर कुछ लिखा, पढ़ा या बोला और‌ अन्य महिलाओं को‌ भी जागरूक करने की कोशिश की तो कुछ ने इसे पारंपरिक त्योहार की तरह मनाते हुए अपने और अपने परिवार के लिए खरीददारी की, कुछ अच्छा बनाया, कुछ लजीज खाया और कुछ ने सोशल मीडिया पर संदेशों को प्रसारित कर, अपने आप को तसल्ली दी कि उन्होंने भी कुछ किया। सब ने अपने अपने तौर तरीके और सामर्थ्य के अनुसार इस विशेष दिन को यादगार बनाने की कोशिश की। लेकिन जरा दिमाग पर‌ जोर डालकर सोचिए कि साल‌ दर साल इस कवायद के बावजूद क्या आम जिंदगी में महिलाओं की स्थिति में कोई खास फर्क आया है। कहीं दूर जाने की आवश्यकता नहीं, अपने आस -पास ही देखें तो पता चलेगा कि बड़ी संख्या ऐसी औरतों की है जिन्हें पता भी नहीं कि यह महिला दिवस है क्या और‌ इस दिन का महत्व क्या है। न उन्हें अपनी स्थिति के बारे में पता है और न उससे निकलने का रास्ता। वे‌ तो अपने हिस्से में आई कमरतोड़ मेहनत और उसके बाद भी मिलने वाली झिड़कियों को अपना प्राप्य समझकर हँसकर न सही झींक कर ही स्वीकार कर लेती हैं। कभी -कभी मन में जो असंतोष जन्म लेता है, वह इतना गहरा नहीं होता कि आंधी का रूप ले पाए। वह तो गाहे बगाहे उनकी आँखों से बहनेवाले आँसुओं से ही धुल जाता है। शायद इसीलिए आम स्त्री की इस नियति को रेखांकित करते हुए मैथिलीशरण गुप्त ने लिखा था –

“अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी, आँचल में है दूध और आँखों में पानी।”

इन पंक्तियों को लिखे कई दीर्घ वर्ष बीत गए हैं लेकिन क्या नारी की स्थिति में कोई विशेष परिवर्तन आया है ? यह सवाल हमारे मानस को‌ प्राय मथता रहता है जिसका जवाब ना में ही मिलता है। आँसू और उच्छवास औरतों के साथ इस तरह जुड़ गए कि उनसे अलग उनकी कल्पना ही नहीं की जा सकती और यह रोना धोना उनकी नियति ही नहीं  पहचान ही बन गई। पुरुषों के लिए रोना गलत समझा गया। भले ही उनका हृदय दुख से विदीर्ण हो जाए लेकिन वे आँसू नही बहा सकते क्योंकि आँसू बहाने से उनकी मजबूत मर्दवादी छवि धूमिल हो जाती है। छायावादी कवयित्री महादेवी वर्मा जो दुखवाद की प्रवर्तक और वेदना की गायिका के रूप में ख्यात हैं ने भी औरतों की इसी आँसूसिक्त छवि को अपनी कविताओं में उकेरते हुए लिखा-

“मैं नीर भरी दुख की बदली!

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विस्तृत नभ का कोई कोना

मेरा न कभी अपना होना,

परिचय इतना, इतिहास यही-

उमड़ी कल थी, मिट आज चली!”

यह सच है कि स्त्रियों का कोई इतिहास नहीं रहा इसीलिए अपना इतिहास लिखने की शुरुआत भी उन्हें करनी पड़ी और इतिहास बनाने की भी। बहुत सी स्त्रियों ने इतिहास भी बनाया और इतिहास में जगह भी बनाई लेकिन एक बड़े तबके की कामगार औरतों के पास अभी तक न शिक्षा की रोशनी पहुँची है ना जागृति का मंत्र। अतः पढ़ी लिखी जागरूक औरतों की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। अपनी मुक्ति या आजादी से संतुष्ट या उल्लसित होने के स्थान पर उन्हें पिछड़े वर्ग की उन तमाम औरतों के बारे में भी सोचना चाहिए। आज जरूरत है उन तमाम औरतों को संगठित करके उन्हें शिक्षित और जागरूक बनाने की तभी स्त्री मुक्ति का स्वप्न पूरा होगा और स्त्री दिवस मनाना भी सार्थक होगा। कविताओं में वेदना को अभिव्यक्ति देने वाली महादेवी वर्मा भी अपने निबंधों में शिक्षित स्त्रियों से यही आग्रह करती हैं -“कृषक तथा अन्य श्रमजीवी स्त्रियों की इतनी अधिक संख्या है कि बिना उनकी जागृति के हमारी जागृति अपूर्ण रहेगी और हमारे स्वत्व अर्थहीन समझे जायेंगे।…..इन सबमें जागृति उत्पन्न करने, उन्हें अभाव का अनुभव कराने का भार विदुषियों पर है और बहुत समय तक रहेगा।” ( हमारी शृंखला की कड़ियां -2, शृंखला की कड़ियां, पृ.25)

सखियों, हमारी जिम्मेदारी महिला दिवस को येन केन प्रकारेण मना लेने भर से पूरी नहीं हो जाती बल्कि उन तमाम सखियों की जागृति के बारे में सिर्फ सोचना ही नहीं प्रयास करना भी, हमारा ही दायित्व है। स्त्रियों को जाति, धर्म, भाषा, वर्ग, वर्ण आदि की उपेक्षा कर परस्पर सख्य के बंधन में बंधना चाहिए तभी वे समान रूप से मुक्ति का स्वप्न देख पाएंगी और उसे यथार्थ में परिणत करने के लिए विकास के रास्ते भी तलाश पाएंगी। और यह नारी शक्ति अपने विकास पथ पर‌ चलते हुए आँसुओं को अपनी कमजोरी नहीं बनने देगी बल्कि चेहरे पर मुस्कान सजाकर हर चुनौती का सामना बेहिचक करेगी। बदलते संदर्भ और परिस्थितियों में कवयित्री अनामिका की काव्य पंक्तियाँ उसपर सही बैठती हैं-

““अबला जीवन ,

हलो, तुम्हारी यही कहानी!

 ‘मुख पर डारे’ छोटी-सी मुस्कान 

सुनो सब आनी-बानी!”

और कभी न कभी यह अबला जिसे बहुत से तथाकथित हास्य कवि ‘बला’ कहकर संबोधित करते हैं, सबला जरूर बनेगी। लेकिन यह भी सच है कि यह रास्ता बहुत आसान भी नहीं है और इसके अपने खतरे हैं। भ्रम और भटकाव भी हैं, उन सबसे बचकर ही वह अपना संघर्ष जारी रख सकती है। एक बात हमें हमेशा याद रखनी होगी कि स्त्री मुक्ति का यह संघर्ष अपनी जमीन खोकर मात्र किताबी न रह जाए, इसी खतरे की ओर संकेत करती है, कात्यायनी की यह कविता-

“कई वर्षों से

बेहतर है मानसून

ज़िन्दगी की तमाम परेशानियों के बीच।

तमाम फ़सलों-वनस्पतियों,

खर-पतवार के बीच उग आए हैं

स्त्री-मुक्ति के तमाम पैरोकार।

लड़ने का स्वाद

कहीं भूल न जाए स्त्री

ज़िन्दगी के दंशों

और अकादमिक बहसों की

आदी होती हुई।”

आज विदा, सखियों। अगले हफ्ते फिर मुलाकात होगी, एक नयी बहस के साथ।

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