भारतीय परम्परा में मिठास भरता आ रहा है खीर का स्वाद

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खीर एक ऐसा व्यंजन है जो भारत में किसी भी खास अवसर में मिठास भर देती है। अलग – अलग राज्य और अलग – अलग तरीके मगर खीर पूरे भारत में पसन्द किया जाने वाला व्यंजन है। हमारे पौराणिक इतिहास में खीर का उल्लेख है। रामायण की बात करें तो राजा दशरथ ने जब पुत्र कामेष्टि यज्ञ करवाया तो अग्निदेव ने प्रकट होकर उनको खीर का ही प्रसाद दिया था। इसके बाद उनको श्रीराम, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न पुत्र के रूप में प्राप्त हुए।

खीर शब्द संस्कृत के क्षीर शब्द से आया है जिसका अर्थ है क्षीर और भगवान विष्णु क्षीर सागर में निवास करते हैं तो शाब्दिक अर्थ दूध का सागर बनता है। दरअसल, खीर की उत्पत्ति संस्कृत के क्षीर से हुई है। क्षीर दूध को कहते हैं और इसका अपभ्रंश आज खीर के नाम से जाना जाना जाता है। खीर एक प्रकार का मिष्ठान्न है जिसे चावल को दूध में पकाकर बनाया जाता है। खीर को पायस भी कहा जाता है। ‘खीर’ शब्द, ‘क्षीर’ (= दूध) का अपभ्रंश रूप है। रामायण महाभारत काल में भी खीर का जिक्र है। खीर का पहला उल्लेख 400 ईसापूर्व के जैन और बौद्ध ग्रंथों में भी मिलता है। ठीक इसी प्रकार शरद पूर्णिमा से भी खीर का विशेष सम्बन्ध है। मान्यता है कि शरद पूर्णिमा की चांदनी में रखी खीर पर चन्द्रमा अमत बरसाते हैं। कहने का मतलब यह कि खीर भारतीय परम्परा का महत्वपूर्ण अंग है।

खीर की कहानी का सम्बन्ध केरल में प्रचलित एक पौराणिक गाथा से भी है। कहते हैं एक बार श्रीकृष्ण ने अंबलापुझा के राजा को परखना चाहा। राजा शतरंज के अच्छे खिलाड़ी थे, सो शतरंज की बिसात पर ही शर्त रखी भगवान कृष्ण ने जो भेस बदलकर साधु के रूप में थे। राजा को लगा मामूली-सा दिखने वाला साधु मेरे सामने क्या टिकेगा, इसलिए शर्त मान ली कि हारने पर उसकी हर शर्त उन्हें मंजूर होगी। खैर, खेल में राजा की हार हुई। साधु ने कहा मुझे इस शतरंज की बिसात भर चावल दो, बस इतना ख्याल रखना कि पहले खाने में जितने दावल के दाने रखे जाएं, दूसरे में उससे दोगुने और तीसरे में उसके दोगुने और इस तरह यह दोगुने का हिसाब पूरे 64 खानों तक बना रहे। राजा को यह मामूली हिसाब-किताब लगा। लेकिन जब असल में चावल रखा जाने लगा और एक-एक कर गिनती आगे बढ़ती रही तो आंकड़ों की विशालता का अहसास राजा को हुआ। यहां तक कि चालीसवें खाने तक पहुंचते-पहुंचते उसके पूरे साम्राज्य के चावल समाप्त हो गए! राजा को परेशान देखकर श्रीकृष्ण ने अपना असली रूप दिखाया। और बाकी बचे चावलों को भक्तों को पाल पायसम के रूप में परोसने का वायदा लिया। तभी से अंबलापुझा के मंदिर में नैवेद्य के रूप में यह खीर बंटती आ रही है।
पायसम को दूध, चावल और गुड़ से बनाया जाता है. जबकि ज्यादातर खीर दूध, चीनी और चावल से बनती है. इसमें सूखे मेवे डाले जाते हैं। पश्चिम बंगाल में यह पायेश हो जाती है. पायेश को दूध, चावल, घी, चीनी/गुड़ और खोया डालकर पकाया जाता है।
वही खीर उत्तर प्रदेश आते-आते बदल जाती है। बनारस में त्योहारों और हवन में इसे दूध, चावल, घी, चीनी, इलायची, मेवे और केसर डालकर पकाया जाता है जबकि दक्षिण भारत में सेवैया और साबूदाने को मिलाकर खीर बनती है। इसें कुछ सूखे मेवे डाले जाते हैं. असम में खीर को पायोख कहा जाता है। इसमें काफी मात्रा में सूखे मेवे डाले जाते हैं। यहाँ इसका रंग थोड़ा गुलाबी होता है। कहीं-कहीं इसे साबूदाना से भी बनाया जाता है। ऐसी खीर असम के परिवारों में महत्वपूर्ण भोजन के तौर पर बनाई जाती है। बिहार में खीर को चावल की खीर कहा जाता है। यहां इसे बनाने के लिए फुल क्रीम दूध, चीनी, इलायची पाउडर, सूखे मेवे और केसर डाला जाता है। अगर केसर न हो तो भी काम चल जाता है। वहीं चीनी की जगह गुड़ डाला जाये तो खीर रसियाव बन जाती है। खीर का सम्बन्ध जगन्नाथ पुरी से भी है। बंगाल की तरह ओडिशा में खीर को पायस कहा जाता है। यह पुरी में दो हजार सालों से बन रही है। इसे अन्नप्रसादम में बांटा जाता है। कहीं-कही पायसम को चीनी, चावल और नारियल के दूध से तैयार किया जाता है। वहीं कर्नाटक में सेवैया से पायसम बनता है. इसमें साबूदाना भी मिलाया जाता है जबकि हैदराबाद में लौकी की खीर खूब पसंद की जाती है। इसे गिल-ए-फिरदौस कहा जाता है जिसे दूध और लौकी से बनाया जाता है। भारत ही नहीं प्राचीन रोम और फारस क्षेत्र में भी खीर के सेवन का उल्लेख मिलता है। रोमवासी पेट को ठंडक पहुंचाने के लिए खीर खाया करते थे. जिस फिरनी को पंजाब में बड़े चाव से खाया जाता है। वो एक जमाने में पर्शिया के पसंदीदा व्यंजनों में से थी। पारसी लोगों ने ही फिरनी में गुलाबजल और सूखे मेवे डालना शुरू किया था. जबकि चीन में बनने वाली खीर में फलों को शहद में डुबोकर डाला जाता है। । ईरान और अफगानिस्तान में खीर से ही मिलते-जुलते व्यंजन शोला-ए-शीरीं और शोला-ए-ज़र्द पकते हैं। आमतौर पर मुहर्रम के दसवें रोज़ इन्हें पकाया जाता है और एक मीठे पेय शर्बत-ए-रेहान के साथ परोसा जाता है। इन्हें गरीबों में भी बांटने की परंपरा है। शोला-ए-ज़र्द के लिए छोटे आकार के शोला (चावल) को दूध और मेवों के संग पकाकर इसमें पीला रंग मिलाया जाता है। आज खीर की विविधता और लोकप्रियता देखते हुए इसके साथ प्रयोग भी खूब हो रहे हैं।

(साभार – न्यूज ट्रैक, अमर उजाला)

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