भारत की पहली रेस डायरेक्टर दिव्या, पुरुषों के बीच बनाया मुकाम

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नयी दिल्ली : दिल्ली की दिव्या मिगलानी ने मोटर स्पोर्ट्स की दुनिया में अपनी ऐसी धाक जमाई कि कार रेसिंग और कार रैली में भारत की कम उम्र की महिला बनकर उभरीं और रैली सर्किट से लेकर रेसिंग ट्रैक तक पहुंचीं।
पिछले 18 सालों से मोटर स्पोर्ट्स से जुड़ी दिव्या कहती हैं, ‘मैंने कभी नहीं सोचा था कि इतने खिताब अपने नाम कर पाऊंगी। पर आज ये सब कुछ कर पाई तो उसके पीछे परिवार का सहयोग है। जब मैंने कार रेसिंग शुरू की तो उसके लिए कोई प्रशिक्षण नहीं लिया और कोई सलाह देने वाला भी नहीं था। करिअर की शुरूआत एचसीएल इंफोसिस्टम्स से हुई। फिर कई मुख्य मीडिया संस्थानों में काम किया। रोज की तरह उस दिन भी ऑफिस जा रही थी। दिल्ली से नोएडा थोड़ी जल्दी पहुंच गई। वहीं अपनी बलेनो कार घुमाने लगी। पास में नेशनल स्टेडियम में लड़कों की भीड़ देखी। उसे देख मैं भी उधर चल दी। वहां कार रेसिंग हो रही थी, मैंने भी दिलचस्पी दिखाई। तब जानकारी मिली कि भारत में ऐसे इवेंट्स होते हैं जहां ड्राइवर्स आकर मुकाबला करते हैं। वहां से फिर ऑटो स्पोर्ट्स के बारे में मालूम हुआ। बस फिर क्या था मैं ऐसे ही मौके की तलाश में थी जो मुझे मिल गया और 2004 से मोटर स्पोर्ट्स का सफर शुरू हुआ।
पहली रैली और गाड़ी पलट गयी
दिल्ली में हिमालयन रैली थी जो शिमला से शुरू होकर लेह लद्दाख जानी थी। 2005 का ये वक्त था। पहली रैली वो भी किसी समतल जमीन पर नहीं बल्कि हिमालय की पहाड़ियों पर। सात दिन ये रैली चली। उसमें हर दिन क्वालिफाई करना होता था। जब पहले दिन रैली की तो वो बहुत अलग ड्राइविंग थी, क्योंकि इससे पहले मैंने ऐसे कभी पहाड़ों में ड्राइविंग नहीं की थी। मैं ड्राइविंग कर रही थी और मेरे भाई मुझे नेविगेट कर रहे थे। पहला दिन बहुत अच्छा गया। रैली के दूसरे दिन मैं मारूति जिप्सी चला रही थी। पूरा दिन खत्म होने वाला था तब करीब आधा घंटा पहले हमारी गाड़ी पत्थर से टकराकर पलट गई। विंड स्क्रीन क्रैश हो गई, टायर पलट गए। पर हम दोनों सेफ थे। मुझे अपनी ड्राइविंग पर पूरा भरोसा था फिर जब गाड़ी पलटी तो समझ नहीं आया कि ऐसा कैसे हुआ। जब गाड़ी पत्थर से टकराई तो मैं भी सन्न रह गई। ये गाड़ी का पलटना मेरे लिए टर्निंग पॉइंट साबित हुआ। हम उस रैली से डिस्क्वालिफाई हो गए। जब मैं घर आई तो मां ने कहा कि अब गाड़ी चलाने का भूत उतर गया, लेकिन मुझे मालूम था कि भूत तो अभी चढ़ा है, क्योंकि मेरे साथ ये दिक्कत है कि जब किसी काम में फेल हो जाती हूँ तो उसके पीछे का कारण ढूंढती हूँ।
जब रेत में सबसे आगे निकल गई जिप्सी
पहली रैली की असफलता के बाद दूसरी रैली 2006 में हुई। इसके लिए खूब प्रैक्टिस की। इस रैली में जान फूंक दी क्योंकि ये तारकोल की सड़क पर नहीं बल्कि रेत से भरे मैदान में होनी थी। यानी राजस्थान में। इस रैली के लिए मैंने इसलिए भी खूब प्रैक्टिस की क्योंकि पहली बार में कार पलट गयी थी और उस डर को बाहर नहीं निकालती तो शायद दोबारा कभी हैंडिल नहीं संभाल पाती। वो रैली इतनी अच्छी हुई कि उसमें हम दोनों भाई-बहन ने रिकॉर्ड बनाया। मेरी जिप्सी एसयूवी एक्स्ट्रीम कैटेगरी में चौथे नंबर पर रही। इसी रैली में मेरा फर्स्ट पोडियम फिनिश मिला। उसी प्रतियोगिता में मुझे जानकारी मिली कि आज तक एक्ट्रीम कैटेगरी में किसी महिला ने पोडियम फिनिश नहीं किया। एक्ट्रीम कैटेगरी में मैं टॉप फोर रही। पुरुषों से भरे मोटर रेसिंग में जब मैं आगे निकल गई तो पीछे मुरझाए और हाथ मलते चेहरे छोड़ दिए। मोटर स्पोर्ट्स में बाइक और कार दोनों की रेसिंग होती है। कार रैली में भी दो कैटेगरी होती हैं। एक एक्सट्रीम जिसमें कोई स्पीड लिमिट नहीं होती। दूसरी, एडवेंचर कैटेगरी जिसमें स्पीड लिमिट होती है। एडवेंचर कैटेगरी थोड़ी आसान होती है। मैंने पहली रैली एक्सट्रीम की थी जिसमें स्पीड नहीं थी।
खेल के मैदान में जाकर की प्रैक्टिस
भारत में मोटर स्पोर्ट्स अभी भी शुरुआती दौर में है। इसलिए इसके लिए बहुत अच्छे ग्राउंड्स नहीं हैं। जब भी जहाँ पर रैली होती थी वहाँ मैं उस जगह की पहले ही रैकी कर लेती थी। वहीं जाकर प्रैक्टिस करती। सिर्फ गाड़ी चलाने की प्रैक्टिस नहीं होती, बल्कि उसकी हैंडलिंग, आपकी मानसिक स्थिरता की भी होती है। अगर आप मानसिक और शारीरिक स्वस्थ पर नहीं होंगे तो ड्राइविंग नहीं हो पाएगी।

गाड़ी और ड्राइवर का टीम वर्क
जब हम ड्राइविंग करते हैं तो मन में आता है कि जिस गाड़ी को हम चला रहे हैं वो ठीक है या नहीं क्योंकि उसे पूरे सात दिन चलाना होता है। जब गाड़ी पर नियंत्रण और भरोसा हो जाता है तब मैं गाड़ी को अपनी सीमा से बाहर ले जा सकती हूँ। अपने विश्वास और गाड़ी पर विश्वास दोनों टीम वर्क हैं। रैली या रेसिंग के दौरान गाड़ी बीच-बीच में बहुत टूटती है। हर दिन इंजीनियर गाड़ी ठीक करता है। रेत की ड्राइविंग बिल्कुल अलग थी। भरी रेत में गाड़ी भगा पाने की तकनीक होती है। ज्यादा रेस देंगे तो टायर रेत में धंसता चला जाएगा। इसलिए अलग टेक्नीक होती है। मेरे समय पर इसकी कोई ट्रेनिंग नहीं दी जाती थी। हमें खुद ही सीखना होता था। रेत में खुद से ड्राइविंग सीखी।

खेल ने बदली दुनिया
खेल से बहुत कुछ सीखने को मिला, जो मैंने खेल से सीखा वो मेरी शख्सियत में भी दिखा। जब हम रैली करते हैं तब हमें नहीं पता होता कि आगे क्या होगा। ये ऐसा खेल है जो जिंदगी को खत्म करने वाला भी हो सकता है। 15 हजार फीट ऊंचाई पर गाड़ी चलाते हैं। अगर एक गलत टर्न ले लिया तो हमारी जान को भी खतरा हो सकता है। ये एक ऐसा खेल है जहां आपके पास किसी भी चीज की गारंटी नहीं होती कि आगे क्या होगा, लेकिन फिर भी हमें स्पीड में गाड़ी को चलाना होता है और आपको प्रतियोगिता में बने रहना होता है। इस खेल से यही सीखा कि जिंदगी में आगे क्या होने वाला है नहीं मालूम। जो आपके पास है वो अभी का वक्त है। वर्तमाम पर ही हमारा नियंत्रण है। ड्राइविंग के वक्त मुझे हमेशा लगता है कि जिस चीज से मुझे डर लग रहा है उस डर के आगे जाने से क्या होगा। जब पहली बार जीत मिली तब उस डर का सामना करना आया। मैं निडर हो पाई। स्पोर्ट्स जेंडर के आधार पर भेदभाव नहीं करता। लोग आपको तब तक अलग तरह से देखते हैं जब तक आप खुद को अलग तरह से देखते हैं।
नौकरी और जुनून साथ-साथ
मेरी जो पहली कार रेसिंग थी उसमें मैंने रेस सूट उधार का मांगा था। मीडिया की नौकरी और रेसिंग साथ साथ किया। मैं अपने अभिभावक से पैसे नहीं लेती थी। इस जीत के बाद मैंने जहाँ भी नौकरी की वहां मुझे प्रायोजक मिला। एक दफ्तर में मैंने मोटर स्पोर्ट्स में जाने के लिए छुट्टी मांगी तो उन्होंने नहीं दी। मैंने इस्तीफा दे दिया। इस्तीफे में कारण लिखा कि मुझे मोटर स्पोर्ट्स में जाना है, इसलिए छुट्टी चाहिए। तब मुझे छुट्टी मिल गई और मेरा इस्तीफा मंजूर नहीं हुआ। जब कंपनी ने देखा कि मैं अपने पैशन के लिए बहुत समर्पित थी तो उन्होंने ने भी रोका नहीं। मैं नौकरी और मोटर स्पोर्ट्स दोनों साथ में करना चाहती थी। आज दोनों साथ में कर रही हूं। दोनों प्रोफेशन करने से मेरी कार्य क्षमता बढ़ती है।
फिर तमाम मुकाबलों में गयी
मैं कोयम्बटूर में रेसिंग सर्किट में भी गयी। वहाँ पर कोई भी लड़की नहीं थी। वहां फॉर्मूला कार को चलाने के थोड़ी ट्रेनिंग ली। मैं 15 सालों से यही कर रही हूँ। रेस ट्रेक लर लड़कियों को लाने के लिए उन्हें प्रशिक्षित करना शुरू किया। आज मोटर स्पोर्ट्स के फेडरेशन में फोर वीलर कैटेगरी में महिलाओं को प्रतिनिधित्व करती हूँ। जब मैंने मोटर स्पोर्ट्स की शुरुआत की थी तब लड़कियां इस फील्ड में बहुत कम थीं। मुझे खुद को भी दूसरों को साबित करना पड़ा। इसलिए अब कह सकती हूं कि आप खुद ही खुद की मदद कर सकते हैं। जो आपके अंदर से आवाज आ रही है वो करें। आज मैं पहली रेस डायरेक्टर हूं। आप अपने लिए रास्ते बनाते हो और वो दुनिया के लिए भी बन जाते हैं।
(साभार – दैनिक भास्कर)

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