भूली बिसरी यादें – भाग -1

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डॉ. एस. आनन्द

पत्रकारिता की दुनिया में डॉ. एस. आनन्द एक स्तम्भ का नाम हैं…पत्रकारिता और साहित्य की अद्भूत जुगलबंदी से इन्होंने हिन्दी पत्रकारिता में साहित्य के हस्तक्षेप को मजबूत किया। बतौर पूर्व सह संपादक, (सन्मार्ग), साहित्य संपादक, (प्रभात वार्ता), फीचर संपादक, (सलाम दुनिया) जनता के हृदय में इन्होंने जगह बनायी। इनके व्यंग्य तलवार की तेज धार की तरह हैं जो समसामायिक स्थितियों और समस्याओं की विद्रूपता पर तीक्ष्ण कटाक्ष करते हैं। पत्रकारिता जीवन की स्मृतियों को डॉ. एस. आनन्द खोल रहे हैं और शुभजिता इस खजाने को आपके लिए लायी है…इसे पढ़िए और पत्रकारिता की दुनिया को समझिए। – सम्पादक, शुभजिता

एक महाविद्यालय के हिन्दी प्रवक्ता की शानदार नौकरी छोड़कर मैंने पत्रकारिता के क्षेत्र में कदम रखा। यह मेरा व्यक्तिगत निर्णय था लेकिन इससे मेरा घर-परिवा अचंभित रह गया था। पिता जी तो इतने नाराज़ रहे कि कई दिनों तक बातचीत भी बंद कर दिए। बराबर यही कहते रहे कि परम गंग को छाड़ि पियासो दुर्मति कूप खनावे लेकिन मैंने परवाह नहीं की और अनपरा, सोनभद्र से प्रकाशित होने वाले साप्ताहिक ऊर्जांचल वाणी में बतौर सम्पादक नौकरी ज्वाइन कर ली और एक साल तक संपादन और लेखन में जुड़ा रहा। उस दौरान मेरे लेख, व्यंग्य और कविताएं भी जानी-मानी पत्रिकाओं और समाचार पत्रों में प्रकाशित होने लगे और चर्चित भी हुए। अर्थलाभ भी होने लगा और मन भी लेखन और पठन पाठन में रम गया। उसी दौरान मेरी एक कहानी -जिन्दगी का रंगमंच, सन्मार्ग कोलकाता में आदरणीय रुक्म जी ने छापा जिसका अनुवाद उर्दू और बांग्ला में हुआ। नागरी पत्रिका में में प्रकाशित मेरी कहानी -दो बीघा जमीन, संपादक विजय बलियाटिक ने प्रकाशित कर मुझे इतना प्रोत्साहित किया कि मैंने ताबड़तोड़ कहानियां लिखनी शुरू कर दी। चुप्पी के बोल, संकल्प, विकल्प, फिर वही, आदमी काम का, अहसास, जैसी कई कहानियां- उत्कर्ष, निहारिका, मुक्ता, त्रिविधा, सन्मार्ग, आज, माध्यम, गंगा आदि में छपीं और लोगों द्वारा सराही गयीं।
फिर मैंने आपातकाल के दौरान घटी कुछ खट्टी-मीठी घटनाओं को केन्द्रित कर एक उपन्यास-सिन्दूरी चन्द्रमा, लिखा जिसका धारावाहिक प्रकाशन वाराणसी से प्रकाशित होने वाले साप्ताहिक पत्र दिग्काल में भाई चन्द्रकान्त के सम्पादन में किया गया।
ऊर्जांचल वाणी छोड़ने के बाद मैं स्वतंत्रत भारत हिन्दी दैनिक से जुड़ा और उसी दौरान मेरी मुलाकात सन्मार्ग के प्रबंध संपादक आदरणीय हीरालाल चौबे से हुई जो मेरे पिताजी के अभिन्न मित्र थे और दोनों ने एक साथ बनारस से प्रकाशित होने वाली लोकप्रिय पत्रिका-वासन्ती, के संपादन का काम किया था और बाद में हीरालाल चौबे ने उसे छोड़ दिया और पिता जी (महेंद्र शंकर) उसके अकेले संपादक रह गये थे। चौबे जी के ही कहने पर मैंने सन्मार्ग 1990 में ज्वाइन किया। उस समय इसके संपादक आदरणीय राम औतार गुप्ता जी थे। वे पिता जी को बखूबी जानते व पहचानते थे इसलिए मुझे उनके सुंदर निर्देश व प्रोत्साहन भी मिलते रहे। व्यक्ति को पढ़ने में माहिर गुप्ता जी ने मुझे एक पेज धर्म संस्कृति के संपादन का दिया और कहा कि मंगलवार को छपने वाला यह पेज पाठकों को पसंद नहीं आ रहा है। अगर तुमने इसे रुचिकर बना दिया तो इस पृष्ठ का पारिश्रमिक तुम्हें सबसे ज्यादा दिया जायेगा। मैंने यह दायित्व स्वीकार कर बनारस के कुछ अच्छे और चर्चित लेखकों को जोड़ा और छोटी छोटी धार्मिक, आध्यात्मिक , प्रेरक कथाएं छापनी शुरू की। पहले के अंकों में जहां तीन चार आलेखों से पन्ना भर दिया जाता था, अब उसी पेज पर दर्जन भर रचनाएं छपने लगीं। सन्मार्ग के समाचार संपादक उस वक्त रमाकांत उपाध्याय जी थे और राधाकृष्ण प्रसाद जी ने साथ ही लेजर डिपार्टमेंट के भाई अनिल कुमार राय व कार्तिक लाल यादव के सहयोग से धर्म संस्कृति पृष्ठ काफी लोकप्रिय हो गया और अखबार का सर्कुलेशन भी लगभग मनोरंजन पृष्ठ के बराबर हो गया। इससे प्रसन्न होकर गुप्ता जी ने मेरा पारिश्रमिक तो बढ़ाया ही, लस्टम पस्टम जिसे लंबे समय से रमाकान्त जी लिख रहे थे, मुझे सौंप दिया। 23 सालों तक मैं अनवरत सप्ताह में 6 दिन इस स्तम्भ को लिखता रहा। दरअसल व्यंग्य लेखन का मेरा यह पहला अनुभव था। इससे पहले मैं व्यंग्य कविताएं जरूर लिखता रहा। मैंने एक नये कलेवर और नये अंदाज में लस्टम पस्टम लिखा और वह दिनों दिन परवान चढ़ता गया। एक व्यंग्य लेखक की पहचान मुझे सन्मार्ग से ही मिली और इसका पूरा श्रेय गुप्ता जी, राधाकृष्ण प्रसाद और अनिल कुमार राय को जाता है क्योंकि आप सभी ने मुझे बार-बार प्रोत्साहित करने में कभी कोई कसर नहीं छोड़ी। ध्यातव्य है कि आरंभिक काल में गुप्ता जी खुद लस्टम पस्टम पढ़कर पास करते थे किन्तु उनके बाद राधाकृष्ण जी ने यह दायित्व संभाला।

(क्रमशः)

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