भूली-बिसरी यादें–4

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डॉ. एस. आनन्द

90 के दशक में जब मैंने सन्मार्ग ज्वाइन किया तो सबसे पहले मेरा परिचय आदरणीय उदयराज सिंह से हुआ। आप प्रतापगढ़ जिले के एक संभ्रांत परिवार के सहज, सरल, मृदुल स्वभाव के भलेमानस थे। वाणिज्य पेज का संपादन और वाणिज्यिक समाचार आप ही लिखते थे। टीडी कालेज, जौनपुर से स्नातकोत्तर डिग्री लेने के बाद ठाकुर साहब , सभी इसी नाम से उन्हें बुलाया करते थे। लोकमान्य हिन्दी दैनिक बंद होने के बाद ठाकुर साहब ने सन्मार्ग ज्वाइन किया और अपनी सेवानिवृत्ति तक काम किया। रमाकांत उपाध्याय और ठाकुर साहब में गहरी छनती थी। जब कभी इनकी रात में छन जाती तो यह समझना मुश्किल हो जाता कि कौन किसको कितना मानता है। कभी उपाध्याय जी मूड में होते तो ठाकुर साहब को अपने चेंबर में बुलाते। दो पैग दोनों जब गले के नीचे उतार लेते तो फिर शुरू होता शेरों-शायरी का दौर। बाहर निकलते ही ठाकुर साहब फरमाते-
ठिकाने से रख दो तुम ये जाम-मीना
कभी फिर पीयेंगे-पिलायेंगे हम-तुम।
यह शेर सुनने के बाद हम सभी समझ जाते कि आज माहौल खुशनुमा रहेगा। उपाध्याय जी मुंह में पान घुलाते आते और ठाकुर साहब के पीछे खड़े होकर कहते- उदयराज जी, श्मशान तक तुम्हारे साथ मैं ही रहूंगा और ठाकुर साहब कहते – मैं आपको मोक्ष दिलाने के बाद ही दुनिया छोड़ूंगा मगर उपाध्याय जी ने ही पहले साथ छोड़ा और उसके एक साल बाद अपने गांव में ठाकुर साहब ने अंतिम सांस ली। इतिहास से एम.ए.करने वाले ठाकुर साहब गणित के बहुत अच्छे जानकार थे। चुटकी बजाकर कोई भी सवाल हल कर देते थे। गुप्ता जी उन्हें बजट विशेषज्ञ कहते थे। कुर्ता धोती और चप्पल पहनने वाले सीधे सरल ठाकुर साहब की मुझ पर विशेष कृपा थी कारण कि वे मेरे डैड के साथ लोकमान्य में काम कर चुके थे और उनके गीतों के फैन थे।
एक वाकया याद आ रहा है। एक प्रेस कांफ्रेंस ग्रैंड होटल में थी। ठाकुर साहब को उसमें जाना था और वे गये भी मगर बहुत जल्दी वापस आ गये। पूछने पर उन्होंने बताया कि धोती-कुर्ता और चप्पल वालों की नो एण्ट्री। क्या जमाना आ गया? अब पत्रकारों का भी ड्रेसकोड पूंजीपति निर्धारित करेंगे। मोतीलाल चौधरी ने कहा-आप अपना आईकार्ड क्यों नहीं दिखा दिये? ठाकुर साहब ने कहा- किसको? उस सिक्योरिटी गार्ड को? यह मैं नहीं कर सकता। समाचार आ जायेगा तो लिख दूंगा वरन्……। यह थी ठाकुर साहब की खुद्दारी। मै भी तो यही कहूंगा-
आंधी आती है तो पेड़ उचर जाता है
पतझड़ आता है तो फूल बिखर जाता है
किन्तु आदमी इन सबसे वजनी है
वह हर एक मुसीबत से गुजर जाता है।
सन्मार्ग का प्रवाह तेज गति से बढ़ रहा था। विज्ञापन और प्रसार संख्या में द्रुत गति से इजाफा हो रहा था। इससे गुप्ता जी भी प्रसन्न थे और वे अपनी प्रसन्नता का इजहार भी विज्ञापन विभाग में आकर करते भी थे। वे बराबर यही कहते कि यह मेरी कामयाबी नहीं है। इसके आप सभी सही मायने में हकदार हो। यह जो भी हो रहा है वह आप सभी की मेहनत, ईमानदारी और कर्मनिष्ठा का ही फल है। हर साल आम बजट पेश होने के दिन गुप्ता जी अपने संपादकीय सहयोगियों के साथ उनकी ही कुर्सी पर बैठकर बजट सुनते थे। उस दिन वह कर्मचारियों को मिठाई भी खिलाते थे और खुद भी खाते थे। वह कहते भी थे-
कर्मभूमि है निखिल महीतल
जब तक नर की काया
तब तक उसके उस्र उस्र में
है कर्तव्य समाया।
(क्रमशः)

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