मंदिर जाने के बहाने

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वसुंधरा मिश्र

सच में, आप सभी बहनों के साथ आईडियल ग्रेंड की महिलाओं के साथ इस छोटे से ट्रिप में दिनांक 5.2.21 को बहुत आनंद आया। सुबह-सुबह सभी उत्साह में भरे हुए थे । चेहरे से खुशी झलक रही थी। सुबह के साथ ही सूर्य किरणों की प्रखरता भी बढ़ रही थी।  अरे 9.30 बज रहे हैं अभी तक ड्राइवर नहीं आया, प्रेम  बोली अरे लक्ष्मी फोन करो। किया है मेरे पति वहीं गेट पर ही खड़े हैं। उनकी बात हुई है वह फोरशोर रोड पर पेट्रोल भरवा रहा है। सब धीरे-धीरे वहाँ रखी कुर्सियों में धस कर बैठ गई। ललिता जी के माथे पर चिंता की लकीरें दिखने लगीं। जैन मंदिर में डेढ़ बजे भोजन का बोला हुआ है।
फोटो सेशन शुरू हो गया। बड़ा मजा आ रहा था सबके सामान एक कुर्सी पर और सब एक फ्रेम में घुसने की कोशिश में। मैंने और लक्ष्मी ने एक सेल्फी ले ही ली। सबके साथ भी एक फोटो। मुस्कान तो हरेक के चेहरे पर जमी हुई थी। इंतजार – – – – तभी 10.15 पर लक्ष्मी ने कहा कि मेरे साजन गेट पर ड्राइवर की राह देख रहे हैं और अभी फोन आया है कि पेट्रोल पंप पर आज बहुत लंबी लाइन है। खैर इंतजार खत्म हुआ। एक लंबी सी 17 सीटर ट्रेवलर हाजिर।
उसके दरवाजे खुलते ही साठ साल की नवयुवतियों की धक्का मुक्की। कुछ मनचले पतियों का भी मन डोलने लगा। पर हाय ये पिकनिक तो केवल गृहस्वामिनी के लिए थी।
सुलोचना की जिद थी कि वो युवा ड्राइवर के पीछेवाली सीट पर सुरक्षित रहेगी। लक्ष्मी के पास तो पूरी लक्ष्मी और 17 देवियों को ले जाने की जिम्मेदारी थी। वो एक बड़ा स्टूल भी लेकर गई थी । तीन चार बड़े झोले जिनमें नमकीन आदि खाने के सामान भरे हुए थे, कुछ शॉल आदि भी। किसी को अगर अधिक ठंड लग गई तो? लक्ष्मी तो व्यवस्थापक थी। ड्रेस भी पुरुषों की पहनी थी। सिर पर हैट और पैर में जूते। आखिर एक पुरुष का अहसास तो हो।
चलो अच्छा हुआ कि 20 की जगह 17 ही आईं नहीं तो पुष्पा जी सोती कैसे? नहीं तो आते-जाते तीन सीटों को कैसे हथियातीं। आखिर मात्र 65-70 के बीच की हैं। अच्छा ही हुआ।


मजा आया जब न्यू अलिपुर में गुप्ता ब्रदर्स ढूंढने निकले। पतियों के साथ जाने का मजा ही कुछ और है। वे जब घूमाने ले जाते हैं तो प्यारी सजनियां के पैरों को जमीन पर भी उतारने नहीं देते। दौड़ दौड़ कर सब कुछ गाड़ी की सीट पर ही ला कर देते हैं। कितना सुख। अलादीन के चिराग की तरह पति के गालों को रगड़ते ही सब कुछ हाजिर। एक गुप्ता ब्रदर्स खोजने में  बीस मिनट लगे । फिर चलते चलते सांस फूल गई। रास्ते के उस पार – – चलो दोसा इडली पाव भाजी और मजेदार चाय ने सारी बातों को भुला दिया।साथ में कचौडियां और गुलाब पंखुड़ियों वाले संदेश भी सबके लिए बांध लिए गए। महिलाएं खाएं चाहे न खाएं, सब कुछ रहना चाहिए।
धीरे धीरे मंजु व्यास , पुष्पा राठी, फोगला, पुष्पा बोथरा, राधा, शारदा, ललिता जी, सुलोचना, प्रेम गुप्ता, प्रेम सेठिया, वीणा, पुष्पा जैन, राजकुमारी, और मैं यानि वसुंधरा मिश्र, सभी ने अपने-अपने गीत संगीत चालू कर दिए। गणेशजी की स्तुति से लेकर णमोकार मंत्र आदि सभी देवी-देवताओं को याद किया। स्त्रियाँ सच में संस्कृति की विरासत होती हैं। अपनी भाषा के द्वारा वे पूरे विश्व से जुड़ जाती हैं। भारतीय स्त्री के संस्कार उसकी नस नस में घुलेमिले रहते हैं। और हम सभी तो दादी-नानी वर्ग के थे, सास बहू पोते-पोतियों से भरे घर को संवारने वालीं। परिवार की बागडोर संभालने वालीं। सच में जिम्मेदारियों को संभालते संभालते अब थोड़ी छुट्टी मिली। सभी घूमने निकल पड़ीं। वहां भी हिसाब-किताब करते हुए। यह भी एक व्यवस्थित तरीके से जीना और जीने की कला है।
एक बहुत मजे की बात है कि भारतीय स्त्रियों को खुशी बहुत ही कम बजट और कम से कम सुविधाओं में भी अधिक से अधिक मिल जाती है।
हमारे मंदिर और उनमें विराजमान कोई भी देवी देवता सबके  होते हैं क्योंकि उनमें भी रिश्तेदारी होती है। जिस प्रकार हमारा देश अनेकता में एकता का संदेश देता है वैसे ही हमारे देवी-देवताओं में भी एकता है।
हम अलग अलग धर्म और परंपराओं को मानने वाले थे लेकिन दिगंबर जैन मंदिर नमिनाथ जी के मंदिर में जा कर सबने पूजा अर्चना की। जैन धर्म और बौद्ध धर्म भारत की श्रमण संस्कृतियों का ही एक रूप है। सनातन धर्म के गर्भ से ही उत्पन्न हुए हैं। यह जोका में शारदा गार्डन में स्थित है। जैन धर्म में णमोकार मंत्र का जप करना महत्वपूर्ण है।
गुरु की महिमा का जितना बखान किया जाय हमारे लिए कम है। कबीर तुलसी मीरा रैदास जायसी आदि संतों का देश है – –
गुरु गोविंद दोउ खड़े काके लागूं पाय
बलिहारी गुरु आपणे गोविंद दिओ बताय।
स्वामीनाथ जी का मंदिर तो दर्शनीय स्थलों में से एक है। स्वामीनाथ महाराज और अखंडानंद महाराज के अनुयायियों का यह मंदिर अक्षर धाम के नाम से जाना जाता है। यह सत्मार्ग का पथ है। गुजरात से संत स्वामीनाथ ने परोपकार और अध्यात्म को पूरे विश्व में प्रसारित किया। राजप्रासाद की तरह भव्य मंदिर और उसकी नक्काशी ने मन को  मोहित कर दिया। ऐसे ही देश और विदेशों में 1150 मंदिर बनाए जा चुके हैं। ये मंदिर स्थापत्य कला और संस्कृति के अनूठे नमूने हैं। यह कोलकाता शहर से बाहर डायमंड हार्बर जोका में स्थित है।
हमलोगों ने बहुत सारे गेम खेले। बुढापा और जवानी वाले गेम में खूब मज़ा आया। कोई सिर पर रखी थाली में से गोटियाँ चुन रही थीं जिसका भाग्य अच्छा था वे प्रथम द्वितीय तृतीय आईं और मजे की बात है बिना किसी प्राइज़ के। हां हमलोग इतने खुश थे कि हमारी एक बहन ने वहां की एक टूटी कुर्सी को पहचान लिया। अच्छा हुआ वे बच गईं और दूसरे को बचने में मदद कीं। फोगला ने तो इतने फोटो लिए कि कुछ बहनों के कुछ पोज़ तो रह ही गए।
भोजन का जिक्र न जाने क्यों छूट रहा है। वैसे तो हम सभी को  मंदिर के भोजनालय को अपना समझ बैठे थे। शुद्ध- दाल- चावल – हरी मटर की सब्जी – गट्टे – चटनी – पापड़- सलाद और फलके- मेथी पराठें—-!और जलेबी भी। और जलेबी के लिए विशेष धन्यवाद तो ललिता जी को ही है। क्या कहने रेनु के? उसने तो संयुक्त परिवार की बड़ी बहू बनने का ठेका ही ले लिया था। प्यारी और चुलबुली रेनु सबको परोसने में ही लगी रही। हम सभी को बहुत दिनों बाद खाने का आनंद आया। उसको लास्ट में हम सबने परोसा। परिवार को एकजुट होना सिखाया तो हम बहनों ने ही। ठीक ही कहा गया है – – – जैसा हो मन वैसा ही अन्न।
अरे! शारदा जी ने सभी का आईक्यू टेस्ट कर लिया। इतने जनरल नॉलेज के प्रश्न पूछे कि सबकी बुद्धि खुल गई। पिकनिक कहॉं थी ये तो समझ में आ ही गया होगा। जोका में जैन मंदिर, अक्षर धाम मंदिर और मनोरंजन बस।
शाम कैसे बीत गई पता ही नहीं चला। बहुत सी बातें छूट गईं। लक्ष्मी ने मोर्चा अच्छी तरह संभाला। बाकी सभी बहनों का सैल्यूट। फिर एक मंदिर की तलाश।

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