मर्कट मन

0
133

– श्वेता गुप्ता

मर्कट मन हैं मेरा,
कोई इसको बांध लें आओ रे,
कभी हंसाता, कभी रुलाता,
कोई इसको समझाओ रे।

क्यों बिगड़ता, क्यों बिलखता,
क्यों बेचैन रहता रे?
रिश्तों की तृष्णा के पीछे,
क्यों करतब दिखाता रे?

आंख मुंदे, यादों को संजोते,
तू कैसे हाथ निकालेगा?
कर विंदा तू, वक़्त से पहले,
वरना मदारी लें जाएगा।

क्यों रुलाता, क्यों लुभाता,
ये कैसा खेल दिखाता रे?
रिश्तों की अभाव में,
कोई नहीं हैं तुझे समझता,
फिर तू ख़ुदको क्यों लुटाता रे?

रिश्तों की चाहत में तू क्यों,
ख़ुद की डोर दें आता रे?
देख, तुझे मर्कट समझ वो,
कैसा नाच नचाता रे।

वक़्त का पहिया चलता जाता,
हर कोई मर्कट एक दिन हैं बनता,
रिश्तों के इस झोलझाल में,
एक मर्कट, दूसरे मर्कट को सलाह दें आता रे।

पहले भी मर्कट थें,
अब भी मर्कट हैं,
दुनिया में बस मर्कट ही रह जाएंगे,
फिर इंसान कहां पायेंगे?

मर्कट मन हैं मेरा, कोई इसको बांध लें आओ रे,
कभी हंसाता, कभी रुलाता,
कोई इसको समझाओ रे,
कोई इसको समझाओ रे।।

Previous articleजनमानस ने संजोकर रखे हैं पद्मा चारिणी के गीत
Next articleभवानीपुर कॉलेज की एनएसएस टीम पहुँची वृद्धाश्रम,
शुभजिता की कोशिश समस्याओं के साथ ही उत्कृष्ट सकारात्मक व सृजनात्मक खबरों को साभार संग्रहित कर आगे ले जाना है। अब आप भी शुभजिता में लिख सकते हैं, बस नियमों का ध्यान रखें। चयनित खबरें, आलेख व सृजनात्मक सामग्री इस वेबपत्रिका पर प्रकाशित की जाएगी। अगर आप भी कुछ सकारात्मक कर रहे हैं तो कमेन्ट्स बॉक्स में बताएँ या हमें ई मेल करें। इसके साथ ही प्रकाशित आलेखों के आधार पर किसी भी प्रकार की औषधि, नुस्खे उपयोग में लाने से पूर्व अपने चिकित्सक, सौंदर्य विशेषज्ञ या किसी भी विशेषज्ञ की सलाह अवश्य लें। इसके अतिरिक्त खबरों या ऑफर के आधार पर खरीददारी से पूर्व आप खुद पड़ताल अवश्य करें। इसके साथ ही कमेन्ट्स बॉक्स में टिप्पणी करते समय मर्यादित, संतुलित टिप्पणी ही करें।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

seventeen + fifteen =