महाभारत

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  • राम दत्त दाधीच

सदाचार हारा और मर गयी शराफत,
सब जगह मचा हुआआज महाभारत।

दुर्योधन पर शकुनि का है बंधन ,
विदुर बेबस मन कर रहा क्रंदन ,
धृतराष्ट्र मोहवश बिलकुल अंधा,
भीष्म का बहाना प्रतिज्ञा का फंदा,
द्रोण कृप निरीह बन चुप रहे सारे,
जलते लाक्षागृह को विचारते बेचारे,
धर्म और कर्तव्य विमुख क्या विचारे,
पांडवों के भाग्य को दूजे क्यों सवारे ।

अभिमन्यु दे रहे विरोचित बलिदान,
द्रोपदियाँ मांग रही अपना सम्मान,
कृष्ण कर्ता नहीं वो तो करवाता,
खुद के वंश को भी लड़वा मरवाता,
बेबस जहाँ भगवान भी हो जाते हैं,
अपने हीअपनों की मारकाट मचाते हैं ,
जीते हुए भी यहाँ सबकुछ हार जाते है,
निज प्रियजनों को चिता में जलाते हैं ।

कुटिल अपमानो का यह कैसा जमाना,
स्वार्थ ही हो रहा हैं आज अपना तराना,
कौन मन से माने आज गीता का ज्ञान,
लूट और खसोट से बन जाऔ धनवान,
धर्माचरण को मान लो है रात का सपना,
पराया माल साम दाम बन जाए अपना,
शंख छोड़ कन्हैया अब बांसुरी बजाओ,
रामायण गान कर महाभारत से बचाओ।

सदाचार हारा और मर गयी शराफत,
सब जगह मचा हुई आज महाभारत।

 

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