माटी

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  • पीहू

ताज़ा है ज़हन में
पर बरसों पुरानी है
दास्तां लकीरों की,
खींची गई थी
आर-पार
बेशुमार यादों,
अनगिनत सपनों,
एक जस्बात,
एक रूह,
और, एक माटी के।

वे समझेंगे क्या,
जन्मभूमि से बंधी हुई पीड़ा!
जो हुए नहीं बेघर,
छुटा नहीं पीछे
जिनका सर्वस्व।
पुश्तैनी घर,
मां का चौका,
बाबूजी के खेत,
दादाजी से मुट्ठी भर मिली
सिक्कों की सौगातें,
दादी के पान का बीड़ा
बहन की बिदाई,
भाई का तबला,
महावर से रंगे
बालिका वधु के पांव,
प्रथम पद चिन्ह लल्ला के,
स्कूल की घंटी,
कीचड़ से लथपथ
यारों संग फुटबॉल।
नहीं अट पाये थे
एक बक्से
दो गठरियों के अंदर।

उस माटी को
अपनेपन से छूने का
छिन गया है आज अधिकार भी,
जब छू पाते हैं
कांप उठता है रोम-रोम
टूट जाता है दबे क्रंदन का बांध
हो जाता है प्लावित,
खोखला हो चुका उनका
अपना ही अंतःकरण।

पर शेष नहीं है जिनकी शक्ति
वे ‘वहां’ से विरले
मिलने आये आदमियों को
छूकर हाथों से
जन्मदात्री माटी को
कर लेते हैं नमन।

गुंजते हैं अब दुआओं में
इबादत के शब्द
कि युगों की धूल में
हो जाने से पहले विलीन
अमूल्य स्मृतियां
माटी की,
आगामी पीढ़ियों के लिए
किस्सों में बुर्जुगों के
महकती रहे
माटी।

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