‘मानवीय संकट के प्रश्न और समकालीन हिंदी साहित्य’ विषय पर राष्ट्रीय वेबिनार का आयोजन’

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कोलकाता : हुगली मोहसिन कॉलेज और बंगीय हिंदी परिषद, कोलकाता के संयुक्त तत्वाधान में एक दिवसीय राष्ट्रीय वेबिनार का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम का मुख्य विषय “मानवीय संकट के प्रश्न और समकालीन हिंदी साहित्य” था। इस कार्यक्रम का आरंभ डॉ. रणजीत कुमार के संचालन से हुआ। इसके पश्चात परिषद के मंत्री डॉ. राजेन्द्रनाथ त्रिपाठी ने स्वागत भाषण द्वारा सभी अतिथियों का स्वागत किया। डॉ. त्रिपाठी ने मुख्य वक्ता प्रो.सूरज पालीवाल, मुख्य अतिथि डॉ. बीना जैन, वक्ता डॉ. चक्रधर प्रधान , अध्यक्ष प्रो. अरुण होता, प्राचार्य प्रो. पुरुषोत्तम प्रामाणिक, अध्यक्ष प्रोफेसर राजश्री शुक्ला तथा सभी श्रोताओं का भी स्वागत किया। इसके पश्चात प्रमुख वक्ता प्रो. सूरज पालीवाल ने अपना वक्तव्य आरम्भ करते हुए समाज में फैली अराजकता को दर्शाया और साहित्य को राजनीति के आगे चलने वाली बहार बताया। इन्होंने कोरोना के संकट पर चर्चा करते हुए, इसकी दूसरी लहर की सूचना विद्वानों से प्राप्त होने के बाद भी सरकार और जनता की लापरवाही की ओर ध्यान आकर्षित किया । कोरोना के अतिरिक्त इन्होंने अन्य मानवीय संकटों में बेरोजगारी और ऐसी कठिन परिस्थितियों में लोभी, मानवता के सौदागरों का विषय उठाया और बड़े ही भावनात्मक तरीके से किसानों के मुद्दों पर भी चर्चा की। साथ ही यह भी कहा कि यह रचनाकारों की जिम्मेदारी है कि उन विषयों पर विशेष रूप से लिखें।
इसके पश्चात हुगली मोहसिन कॉलेज के विभागाध्यक्ष डॉ. चक्रधर प्रधान ने अपना वक्तव्य प्रस्तुत करते हुए लॉकडाउन को मानव जीवन का एक बड़ा संकट बताया। मूल विषय पर चर्चा करते हुए उन्होंने इसी से सम्बंधित अपने मित्र विश्वजीत के उपन्यास “लॉकडाउन एक काला युग” का उदाहरण दिया। इसके माध्यम से इन्होंने मानवीय संकटों और लॉकडाउन के दौरान की परिस्थितियों का बड़ा ही यथार्थ वर्णन किया। इनके पश्चात दिल्ली के किरोड़ीमल महाविद्यालय की प्राध्यापिका डॉ. बीना जैन ने अपने मन की बातों को बड़े ही सुंदर उदाहरणों और शब्दों में व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि जीवन का अंतिम सत्य मृत्यु है परंतु जिजीविषा भी उतना ही बड़ा सत्य है। आज की इन परिस्थितियों को देखते हुए इन्होंने मानव के अकेलेपन को मानव संकट का एक रूप बताया, जिसे इन्होंने ‘निर्मल वर्मा’ की रचनाओं के माध्यम से वर्णित किया। साथ ही इन्होंने कुछ कहानियों ‘धूप का टुकड़ा’ और विशेष रूप से ‘परिंदे’ पर चर्चा की । इन्होंने अपने वक्तव्य में प्रकृति की सुरक्षा और उसके प्रेम के प्रति बल दिया है।

इसके उपरांत प्रो. अरुण होता ने मानव संकट पर चर्चा करते हुए बड़ा ही सकारात्मक विवरण प्रस्तुत किया। उन्होंने अनेक रचनाकारों का उदाहरण देते हुए कहा कि जब भी मानव संकट उत्पन्न होता है, तब रचनाकार साहस के साथ समाज, देश और जन कल्याण की ओर बढ़ता है। उन्होंने कहा कि हर कलाकार चाहे वह कला के किसी भी क्षेत्र में हो वह अपनी कला के माध्यम से भावों को व्यक्त कर स्वयं को मुक्त कर लेता है। आज की परिस्थिति में भी जहां भ्रष्टाचार देखने को मिल रहा है वहीं कुछ अच्छे लोग भी सहायता के लिए अपना कदम बढ़ा रहे हैं। अतः हमें निराश नहीं होना चाहिए।
इसके पश्चात अंत में परिषद की अध्यक्ष प्रो. राजश्री शुक्ला ने सभी वक्ताओं का धन्यवाद ज्ञापन किया तथा युवा शक्ति की सराहना करते हुए सकारात्मकता की ओर बढ़ने की प्रेरणा दी।
इस कार्यक्रम का संयोजन अनूप यादव और भानु प्रताप पांडेय ने किया तथा जिउतलाल प्रजापति, सिद्धार्थ त्रिपाठी, निखिता पांडेय, सुशील पांडेय, राजेश सिंह, अभिषेक पांडेय, ज़ोया अहमद और दीपा ओझा ने अपना पूरा सहयोग दिया।

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