मूल रूप से शिव मंदिर है फिरंगी काली बाड़ी, आज भी है यहाँ 500 साल पुराना शिवलिंग

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क्या आप जानते हैं कि मध्य कोलकाता की एक गहमा – गहमी से भरी सड़क की जगह कभी नहर बहती थी और कुछ दूर के बाद आदि गंगा में समाहित होती थी और यह इलाका सुनसान था। आज जिस बऊबाजार फिरंगी काली मंदिर के दर्शन करने दूर – दूर से लोग आते हैं, वह अपने मूल रूप में दरअसल एक शिव मंदिर है और यह 500 वर्ष से अधिक पुराना है।
जी हाँ, कोलकाता सेंट्रल मेट्रो स्टेशन के निकट माँ फिरंगी काली मंदिर की पहचान एक पुर्तगीज से जुड़ी है और वह व्यक्ति ऐसा जिसने अलग धर्म से होने के बावजूद हिन्दू धर्म को गहनता से समझा…माँ काली का ऐसा भक्त कि उसकी भक्ति रूढ़िवादी समाज को खटकने लगी और कवि ऐसा कि कवियों पर को टक्कर दे डाली। हम बात कर रहे हैं हेंसमेन एन्थनी यानी एन्थनी फिरंगी की। इस मंदिर का नाम इनसे ही जुड़ा है जो मूल रूप से फरासडांगा यानी आज के चन्दननगर में रहते थे। कहते हैं कि इसी मंदिर प्रांगण में माँ काली की भक्ति में कई गीत उन्होंने रचे।

उत्तम कुमार ने एंथनी फिरंगी की भूमिका निभायी थी

यही वहीं फिरंगी हैं जिन पर जातिश्‍वर नामक फिल्म बनी जिसने राष्ट्रीय पुरस्कार जीता। हाल ही में अभिनेता प्रसेनजीत मंदिर में आए भी थे। इसके पहले 60 के दशक में भी इन पर फिल्म बनी जिसमें उत्तम कुमार ने मुख्य भूमिका निभायीय़ किवदंती है कि मां काली ने उनको यहां पर प्रतिमा स्थापित करने का आदेश दिया था। आपको यह जानकर भी आश्‍चर्य है कि श्री सिद्धेश्‍वरी काली मंदिर के नाम से प्रख्यात धार्मिक स्थल में पहले शिव की पूजा होती थी। दरअसल, यह मूल रूप में शिव मंदिर ही है और मां काली की छोटी प्रतिमा बहुत बाद में स्थापित हुई। मंदिर के पुरोहित सपन कुमार भट्टाचार्य के अनुसार शिव मंदिर एक अति प्राचीन वृक्ष के सामने था और यहां नहर बहती थी और थोड़ी दूर आगे जाकर आदि गंगा में समाहित हो जाया करती थी। यह वृक्ष शिवलिंग जितना ही पुराना है। वृक्ष की डाल को गौर से देखने पर लगता है कि यहां भगवान शिव की आकृति है। मंदिर के निकट एंथनी फिरंगी के मामा का घर था और वे यहां से आया – जाया करते थे। सौदामिनी देवी नामक हिंदू विधवा महिला से विवाह करने वाले फिरंगी मां काली से काफी प्रभावित थे और इस मंदिर में गाया भी करते थे। कहते हैं कि एंथनी फिरंगी ने दुर्गापूजा के आयोजन की भी तैयारी की थी मगर यह बात तत्कालीन रूढ़िवादी समाज को इतनी नागवार गुजरी कि पूजा को तो नष्ट किया ही और फिल्म में जो दिखाया गया है, सच कितना है क्या है..पता नहीं पर कहते हैं कि सौदामिनी देवी को भी फिरंगी से विवाह करने के अपराध में जला दिया गया था…पर इस बात की पुष्टि हम नहीं कर सकते क्योंकि कई जगहों पर यह भी लिखा मिलता है कि एंथनी फिरंगी और सौदामिनी ने सामान्य जीवन जीया…मगर विरोध तो झेलना पड़ा होगा और कठिनाई भी हुई होगी…इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता मगर इतिहास तो इतिहास है, हम आज की बात करते हैं।

कहते हैं कि शिवलिंग और माँ की प्रतिमा के पीछे खड़ा पेड़ 500 साल पुराने हैं

कहा जाता है कि एंथनी फिरंगी ने जातिगत व धर्मगत बंधनों के कारण मां काली की प्रतिमा श्रीमंत डोम के माध्यम से स्थापित की। मंदिर की देखरेख का जिम्मा 1882 में हुगली जिले के पोलबा इलाके के मूल निवासी शशिभूषण बंद्योपाध्याय ने उठाया और इसके  सदस्यों के नाम मंदिर की फर्श पर अंकित हैं। शशिभूषण बंद्योपाध्याय के वंशज सोमनाथ बंद्योपाध्याय आज मंदिर का संरक्षण कर रहा है। यहां फल, मिष्ठान चढ़ाने और हवन करने की परंपरा है। भट्टाचार्य के मुताबिक यहां पर पंचमंदिर वेदी पहले से ही स्थापित है। शशिभूषण की पत्नी यहां पर भगवान शिव की पूजा करने आती थीं कहा जाता है कि यहां स्थित शिवलिंग 521 साल पुराना है। भगवान शिव के बाद यहां मां शीतला, मां मनसा और मां काली की छोटी प्रतिमा थी। 1947 में मंदिर में मिट्टी की प्रतिमा स्थापित की गयी और 4 फरवरी 1987 को कंक्रीट से निर्मित मां काली की प्रतिमा स्थापित हुई। मंदिर में वह शिवलिंग आज भी है और साथ ही है माँ दुर्गा, शीतला, मनसा, नारायण. गणेश और हनुमान की प्रतिमाएं हैं।

कहते हैं कि एंथनी कृष्ण और ईष्ट में फर्क नहीं देखते थे और इस मंदिर में किसी प्रकार का जाति बंधन नहीं है और चीनी समुदाय के लोगों द्वारा पूजी जाने के कारण यहां की मां काली को चीना काली भी कहा जाता है। फ़िरंगी कालीबाड़ी की स्थापना की सही तारीख ज्ञात नहीं है। मंदिर की सामने की दीवार पर पट्टिका में लिखा है, “ओम श्री श्री सिद्धेश्वरी कालीमाता ठकुरानी / स्थापित 905, फ़िरंगी काली मंदिर”। अनुमान है कि मंदिर 905 बंगाब्द में बनाया गया था।

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