मैं महापात्र हूँ, ना पात्र होने का मोह, ना श्मशान जाने का भय

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प्रभाकर झा

महापात्र शब्द अपने आप में महान है वैसे तो महापात्र शब्द का शाब्दिक अर्थ महान+पात्र है, अर्थात वैसा पात्र(जन, मनुष्य ) जो महान है , अपने गुण, छवि , और पांडित्य से। परंतु व्यवहारिक दृश्टिकोण से ऐसा नही है
मिथिला क्षेत्र अपने कर्म, संस्कृति और परंपरागत सोंच के लिए विश्व में जाना जाता है और यहाँ हर वो संस्कृति अपने आप में जिज्ञासा उत्पन करता है। मिथिला में भी मुगल बादशाह का साम्राज्य था और उनके दरबार में अनेक पंडित रहा करते थे उनमे से एक थे महेश ठाकुर। जिन्हें मुगल बादशाह ने २७ मार्च १५५६ को उनके पांडित्य से खुश होकर उन्हें तिरहुत का साम्राज्य दिया। वे पंडित तो थे ही और कर्मनिष्ट भी थे. दान लेने के उपरांत उन्होंने दान करने की इच्छा प्रकट की और वे ऐसे ब्राह्मण के खोज में लगे जो उनका दानपत्री बन सके। ब्राह्मण हो , अग्निहोत्री वंश का हो ,कर्मनिष्ट और सुयोग्य भी हो ऐसे ब्राह्मण उन्हें मधुबनी के कोइलख ग्राम में मिल गए जिनका नाम क्रमशः इस प्रकार हैं
१. लोकनाथ झा २. देव नाथ झा ३. एक नाथ झा तीनो प्रकांड विद्वान थे जिनका काकोबेलोच मूल और भारतद्वाज गोत्र था। महेश ठाकुर ने इन्हें दानपत्री बनने का आग्रह किये , परंतु तीनो ब्राह्मण का एक ही उत्तर था सरकार मुझे कर्म करने की इच्छा है दान लेने की नही। महेश ठाकुर के नजर में यही तीनो सुयोग और कर्मकांडी ब्राह्मण है दानपत्री इन्हें ही बनाया जाय और वे दवाब डालते रहे। अंततः महेश ठाकुर ने उन्हें अपने राज्य से चले जाने को कहा की अगर आप मेरे और मेरे परिवार के दान पात्री नहीं बनते तो आपको तिरहुत साम्राज्य त्यागना होगा।
परंतु उस समय की परिस्थति ही कुछ ऐसा थी कि उनलोगों को प्राणत्याग करना सरल लगा परंतु ठाम त्याग कठिन। वैसा ही हुआ जैसा महेश ठाकुर ने चाहा अंततः उन्हें दानपात्री ( महापात्र) बनना परा।
मधुबनी से सटा हुआ यह गाँव जितवारपुर मिथिला पेंटिंग के लिए विश्विख्यात है वहां करीब १५० घर महापात्र ब्राह्मण है
तिरहुत साम्राज्य की पहली राजधानी भौरागढ़ी थी वही महेश ठाकुर और उनके पुत्र गोपाल ठाकुर राजा बने और वे अपने ही छत्र-छाया में महापात्र ( कंटाहा ) लोगो को आश्रय दिए। अभी भी वहां का एक तालाब कंटाही पोखर के नाम से जाना जाता है
राजा नरेंद्र सिंह के शासन के साथ ही भौरा का राजधानी का दर्जा समाप्त कर दरभंगा को नूतन राजधानी घोषित किया गया और राजा दरभंगा चले गए ।लोकनाथ झा , देव नाथ झा , एकनाथ झा , इन तीनो में से लोकनाथ झा और देव नाथ झा ही महापात्र बने। राज परिवार के चले जाने के बाद इन्हें भी कहा गया की आप व् उचित चले जाएँ और फिर जितवारपुर में पुराई झा आये। महनपुर में केशव झा गए और एक जान साहपुर गए वैसे महाराज का कुलपूज्य ( महापात्र ) श्री पुराई झा थे परंतु उनके भाई होने के कारन केशव झा को व् दान का भाग दिया जाता था
जैसे जैसे महाराज होते गए तदनुसार कुलपूज्य व् आते गए सर्वप्रथम १. स्व पुराई झा २ स्व हरी झा , ३. पोषण झा, ४. महामहा भजन झा, ५. दूल्हा झा, ६ कृष्ण्णा झा ७. जगधर झा ,९ उमाकांत झा १०. रामनारायण झा , पंडित श्री देवनारायण झा अभी है
कहने के लिए महाराज के महापात्र है उनके यहाँ सामान मिलता है परंतु व्यहारिक देखे तो लोग घृणा करते है समझ महि आता क्यों
महापात्र जनरल कास्ट में आते है परंतु उनके साथ जो व्यवहार किया जाता है वो शायद डोम (नीची जाति) के साथ व् नही कर सकते क्योंकि वो कानूनन अपराध है परन्तु ब्राह्मण के लिए कोई कानून नहीं।
लोग ये कहते है की महापात्र तब आते है जब किसी का देहांत होता है ये बात सत्य है हाँ आते है परन्तु बुलाने पर। लोग ये नही समझते की उन्होंने जो महामांस दग्ध किया है अतः उन्हें अशौच से निव्रत होना है इस परिस्थिति में तो अपने सगे- संबंधी भी उनके घर का जल ग्रहण नहीं करते उस विसम परिस्थिति में महापात्र ब्राह्मण ही सर्वप्रथम जल या भोजन ग्रहण करके उनको उस अशौच से मुक्ति दिलाते है
जहाँ तक मेरी सोच है महापात्र ब्राह्मण वो है जिन्हें अपने घर से पहले जजमान के घर की चिंता है उन्हें अपने जजमान को पहले मुक्ति दिलानी है । जितवारपुर महापात्र ब्राह्मण का गॉंव है वहां अभी १५० घर से ज्यादा महापात्र होंगे परंतु ५० घर ही जजमान पर आश्रित होंगे। १०० घर के पास जजमान नही है या फिर वो दूसरे कामो में चले गए है इसका ये मतलब नही की वो महापात्र नही है।  महापात्र के लिए एक कथन बिलकुल सत्य और जटिल है
मैं महापात्र हूँ
ना पात्र होने का मोह
ना श्मशान जाने का भय
(लेखक जितवारपुर मधुबनी, मिथिला हैं और चित्रकार हैं)

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