‘ये दिन अगर बुरे हैं तो अच्छे भी आएँगे’

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प्रो. गीता दूबे

सभी सखियों को नमस्कार। सखियों, उम्मीद है कि आप सब ठीक होंगी या ठीक ठाक रहने की कोशिश जरूर कर रही होंगी।। सखियों इन दिनों हमारे चारों ओर नाउम्मीदी, निराशा और हताशा की ऐसी लहर छाई है कि मन पर हमेशा उदासी सी पसरी रहती है। समाचार चैनल हों या अखबार या फिर सोशल मीडिया हर तरफ गुहार और चीख पुकार सी मची हुई है। लोग रोज दर रोज सैकड़ों की संख्या में बीमार हो रहे हैं और उनमें से बहुत से लोग जिंदगी की लड़ाई में हार भी जा रहे हैं। सखियों, यह स्थिति सच में बेचैन करने वाली है। हम चाहते हुए भी कुछ नहीं कर पाते। कई मर्तबा बस सर पटक कर रह जाते हैं। हमारे अपने, हमारी आंखों के सामने से इस तरह से मौत के आगोश में समा जा रहे हैं कि लगता है जैसे किसी ने गाल पर थप्पड़ लगाकर हमारा सब कुछ हम से भरे बाजार लूट लिया हो। देश की स्वास्थ्य व्यवस्था इन दिनों इतनी लचर हो चुकी है कि जिनकी जेब में पैसा है, वह भी डॉक्टर और दवाई के अभाव में दम तोड़ने को विवश हैं। और गरीब लोग तो दोहरी मार झेल रहे हैं। उन्हें तो हर हाल में पिसना है, या तो रोजी रोजगार के घटते या खत्म होते अवसरों के कारण रोटी के अभाव में या फिर दवाइयों की कालाबाजारी के कारण उनके अभाव में। ऐसा लगता है कि एक लंबी अंधेरी सुरंग से हम गुजर रहे हैं। हाथ को हाथ नहीं सुझाई देता। दिमाग को उपाय नहीं दिखाई देता और यह सुरंग है कि खत्म होने में नहीं आती। बीमारी की लहर पहली हो दूसरी या फिर तीसरी, इस तरह लोगों के प्राणों को अपने साथ समेट कर ली जा रही है जैसे कोई चोर रातों रात घर भर के ही नहीं देश भर के तमाम कीमती सामानों पर हाथ साफ कर दे। ऐसे में आदमी का नाउम्मीद होना स्वाभाविक ही है लेकिन सखियों, उम्मीद का दामन छोड़कर हम कैसे और कब तक जी पाएंगे। उम्मीद के डूबने का मतलब है जीते जी मौत को स्वीकार कर लेना, इसलिए लड़ना तो जरूरी है और लड़ेंगे हम तभी जब हमारे मन में उम्मीद की शिखा रौशन रहेगी। कहते हैं, रात कितनी भी गहरी क्यों ना हो सूर्य की किरणें उसके तमाम अंधकार को सोख लेती हैं इसीलिए हमें भी अपने मन में उस किरण की प्रतीक्षा की उम्मीद को जिलाए रखना है और जितना हो सके प्रेरक साहित्य, सकारात्मक संगीत या सृजनात्मक कलाओं में जीवन की उम्मीद को ढूंढकर, उसे बचाए रखने की कोशिश करनी है। शाम कितनी भी बुझी बुझी या उदास क्यों न हो ढलती जरूर है। इसीलिए तो फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ ने उम्मीद की लौ को जलाए रखते हुए कहा-

“दिल ना-उमीद तो नहीं नाकाम ही तो है 

लम्बी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है ।।

सकारात्मक ऊर्जा की तलाश में साहित्य की शरण में जाने पर हम पाते हैं कि हमारे साहित्यकार तो अपनी ओज और उत्साह भरी रचनाओं के माध्यम से हमारे मन की निराशा को छांट कर उसमें बड़े‌ यत्न और कौशल से आशा का दीपक जलाकर हमारे मन को मुरझाने से बचा लेते हैं। कवि हरिवंश राय बच्चन की कविता की ये पंक्तियां तो हताशा से बोझिल मन को यकीनन नया जीवन देती हैं-

“उठी ऐसी घटा नभ में

छिपे सब चाँद और तारे,

उठा तूफ़ान वह नभ में

गए बुझ दीप भी सारे,

मगर इस रात में भी लौ लगाये कौन बैठा है?

अँधेरी रात में दीपक जलाये कौन बैठा है?”

इस दीपक की लौ को हमें जलाए रखने की कोशिश जरूर करनी चाहिए क्योंकि गम की शाम को तो ढलना ही है और सूरज की किरण को चमकना ही है। नरेश कुमार “शाद” के शब्दों में कहूं तो-

“इतना भी ना-उमीद दिल-ए-कम-नज़र न हो 

मुमकिन नहीं कि शाम-ए-अलम की सहर न हो ।।

सखियों, समय कैसा भी हो, बहुत दिनों तक नहीं रहता, वह चाहे सुख का हो या दुख का। तो थोड़ा धीरज तो हमें धरना ही होगा। धैर्य से हम बड़ी से बड़ी मुश्किलों का सामना भी कर‌ लेते हैं लेकिन निराशा और हताशा का शिकार होकर हम जीती हुई बाजी भी हार देते हैं। हताशा, स्वयं एक बड़ा रोग है इसीलिए हमें सावधान रहना है कि कहीं यह हमारे मन को अपनी गिरफ्त में लेकर हमारी आशा की लौ को मंद ना कर दे। यह आपदा का समय है और हमारी कठिन परीक्षा लेने पर तुला हुआ है। उम्मीद और नाउम्मीदी में जंग छिड़ी हुई है। हमें अपने मन को बड़े यत्न से साधना है ताकि उम्मीद हारने ना पाए क्योंकि वही हमारी सांसों की रफ्तार को संभालें रखती है। इसी बात को फ़ानी बदायुनी कुछ यूं बयां करते हैं-

“नाउमीदी मौत से कहती है अपना काम कर 

आस कहती है ठहर ख़त का जवाब आने को है।। 

सखियों, आज हम सबका यह फर्ज बनता है कि सिर्फ अपने बारे में न सोचें बल्कि पूरे समाज के बारे में सोचें और सब को उम्मीद की डोर में बांधने की कोशिश करें। इस समय सामूहिकता की बहुत जरूरत है। हमें एक दूसरे को हौसला देना है, एक दूसरे की हिम्मत बंधानी है और इस अंधेरी सुरंग से बाहर निकलने का रास्ता साथ मिलकर तलाशना है। अपने -अपने अंधेरे से अकेले लड़ने की जगह एक साथ मिलकर इस नाउम्मीदी के अंधेरे को हराना है। सामूहिकता में बड़ी शक्ति होती है और इस बात को समझने की जरूरत हर इन्सान को है। शहरयार इसी बात पर बल देते हुए कहते हैं-

“अब रात की दीवार को ढाना है ज़रूरी 

ये काम मगर मुझ से अकेले नहीं होगा ।।

आइए, हम सब मिलकर इस महामारी की आंधी का सामना करें और यकीन रखें कि आंधी कितनी भी तेज या विध्वंशक क्यों ना हो, इंसान उससे निपटकर जीने और हजारों बार‌ उजड़ने ओर बिखरने के बावजूद फिर से नव सृजन या नयी शुरुआत का हौसला जुटा ही लेता है। भरोसा रखिए, ये दुख और विनाश के दिन भी समाप्त होंगे ही। बस हमें सावधानीपूर्वक, धैर्य और उम्मीद का दामन थामकर इस समय को झेल लेना है। हमारी उम्मीद बची रही तो फिर से सुख के दिन अवश्य आएंगे, यही बात हमारा साहित्य भी कहता है-

“शाख़ें रहीं तो फूल भी पत्ते भी आएँगे 

ये दिन अगर बुरे हैं तो अच्छे भी आएँगे।।”

 

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