रथयात्रा पर विशेष – ये है पुरी का जगन्नाथ धाम

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श्री जगन्नाथ मंदिर की चारों दिशाओं में चार प्रवेश द्वार हैं, जो क्रमशः पूर्व मे सिंह द्वार / मोक्ष द्वार, दक्षिण अश्व द्वार / काम द्वार, पश्चिम व्याघ्र द्वार / धर्म द्वार, उत्तर मे हाथी द्वार / कर्म द्वार स्थापित है। मंदिर के सिंह द्वार पर कोणार्क सूर्य मंदिर से लाया अरुण स्तंभ स्थापित किया गया है, तथा कोणार्क मंदिर के मुख्य विग्रह भगवान सूर्य देव को भी यहीं स्थापित कर दिया गया है।

मंदिर के अश्व द्वार के साथ ही हनुमान जी का छोटा सा मंदिर है, जिसमें श्री हनुमंत लाल की विशाल विग्रह उपस्थित है। मंदिर का आर्किटेक्चर कलिंग शैली द्वारा चूना पत्थर से बना है। अभी इस मंदिर को संरक्षित करने के लिए आर्कियालजी ऑफ इंडिया ने मंदिर की बाहरी दीवारों पर सफेद रंग का जंग रोधक लेप लगाने का काम शुरू कर दिया गया है। हिंदू पंचांग के अनुसार मंदिर में एकादशी दर्शन का विशेष महत्व है। हिंदू मान्यताओं के अनुसार में हरि एवं हर दोनों को शाश्वत मित्र माना गया है। अतः जहाँ-जहाँ हरि निवास करते हैं वहीं आस-पास हर का भी निवास निश्चित है। ऐसे संयोग के अंतर्गत ही भुवनेश्वर के लिंगराज मंदिर को पुरी जगन्नाथ धाम के जोड़ीदार के रूप में माना गया है।

श्री जगन्नाथ रथ यात्रा
विश्व प्रसिद्ध श्री रथ यात्रा, जगन्नाथ धाम का सबसे प्रमुख त्योहार/मेला/उत्सव है। इस पवित्र यात्रा का आरंभ श्री जगन्नाथ मंदिर से होता है, और मौसी माँ मंदिर होते हुए श्री गुंडिचा मंदिर तक संपन्‍न होती है। इन तीनों मंदिरों को जोड़ती हुई तीन किलोमीटर लम्बी ग्रांडरोड है। जहाँ भगवान जगन्नाथ, भ्राता बलभद्र और बहन सुभद्रा दिनभर यात्रा करते हैं। इस यात्रा में देश-विदेश से इतने भक्त शामिल होते हैं, कि ग्रांड रोड पर पैर रखने की जगह मिलना मुश्किल होती है। जगह-जगह भक्तों द्वारा, भक्तों के लिए जल-पान व भोज की व्यवस्था की जाती है।

जगन्नाथ धाम या गोवर्धन मठ?

भारत के पूर्व दिशा में स्थित जगन्नाथ पुरी उड़ीसा राज्य में स्थित है। पुरी भार्गवी व धोदिया नदी के बीच में बसा हुआ है और बंगाल की खाड़ी में विलीन हो जाती है। पुरी जगन्नाथ रथ यात्रा के लिए विश्‍व प्रसिद्ध है। द्वारका की तरह पुरी में शंकराचार्य मठ मंदिर के साथ-साथ जुड़ा नहीं है। गोवर्धन मठ मंदिर से कुछ दूरी पर देवी विमला मंदिर के साथ स्थित है।

आदि गुरु शंकराचार्य के अनुसार जगन्नाथ धाम को गोवर्धन मठ का नाम दिया गया है। गोवर्धन मठ के अंतर्गत दीक्षा प्राप्त करने वाले सन्यासियों के नाम के पीछे आरण्य नाम विशेषण लगाया जाता है। इस मठ का महावाक्य है प्रज्ञानं ब्रह्म तथा इसके अंतर्गत आने वाला वेद ऋग्वेद  को रखा गया है। गोवर्धन मठ के प्रथम मठाधीश पद्मपाद थे। पद्मपाद जी आदि शंकराचार्य के प्रमुख चार शिष्यों में से एक थे।

(साभार – भक्ति भारत)

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