‘रसिकबिहारी’ प्यारो प्रतीम, सिर बिधनां लिख दौनौ’

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प्रो. गीता दूबे

सभी सखियों को नमस्कार। सखियों, आज मैं आप को एक और मध्ययुगीन भक्त कवयित्री की कथा सुनाऊंगी जो “राजस्थान की मोनालिसा” के नाम से भी चर्चित हैं। सौन्दर्य, भक्ति, प्रेम और काव्यमयता का अद्भुत संयोजन मिलता है, उनके व्यक्तित्व और कवित्त में, जिनका एक नाम “बनी -ठनी” या “बणी- ठणी” भी है। यह बात और है कि उसके वास्तविक नाम का पता नहीं चलता। वह किशनगढ़ के महाराजा सावंत सिंह (18 वीं शताब्दी) की दासी थीं जो महाराज से अगाध प्रेम भी करती थीं। महाराजा जो स्वयं एक कवि और कला पारखी थे, भी अपनी इस दासी से बहुत प्रेम करते थे। एक और मत के अनुसार वह कलाप्रेमी महाराज की शिष्या भी थीं। सावंत सिंह स्वयं एक कुशल चित्रकार भी थे। उन्होंने एक बार अपनी इस प्रिय दासी को रानियों जैसी पोशाक और आभूषण पहनाकर उनका एक चित्र बनाया। वह चित्र उन्होंने तत्कालीन राज चित्रकार निहालचंद को दिखाकर उनकी राय मांगी। निहालचंद ने उन्हें कुछ सुझाव दिए जिनके अनुसार राजा ने पुनः चित्र में संशोधन करके, उसे अपने व्यक्तिगत संग्रहालय में शामिल कर लिया। बाद में निहालचंद ने अपने सामने, वह चित्र दोबारा बनवाकर, उसे सार्वजनिक रूप से दरबार में प्रर्दशित किया। इस चित्र की बहुत प्रशंसा हुई और चित्र में चित्रित स्त्री अर्थात दासी को नाम दिया गया “बणी -ठणी” जो राजस्थानी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है, सजी संवरी। इस चित्र की ख्याति के उपरांत उस दासी को सब “बणी ठणी” कह कर ही संबोधित करने लगे। निहालचंद ने बणी ठणी को आदर्श बनाकर और भी कई चित्र बनाएँ जो इतने चर्चित हुए कि किशनगढ़ चित्रकला की शैली को बणी ठणी के नाम से जाना जाने लगा। बणी ठणी का पहला चित्र सन 1700 के आस- पास बना था। इन चित्रों की आज भी विदेशों में अच्छी मांग है। 

एक ओर बणी ठणी के चित्रों की ख्याति आसमान छूने लगी तो दूसरी ओर  राजा सावंत सिंह और बनी- ठनी का प्रेम उत्तरोत्तर प्रगाढ़ होता गया और उनकी जोड़ी में प्रजा को राधा कृष्ण की छवि दिखाई देने लगी। राजा को नागरीदास, चितेरे, अनुरागी, मतवाले आदि कई नामों से नवाजा गया तो उनकी प्रिय दासी को भी कलावंती, किर्तनिन, लवलीज, नागर रमणी, राजस्थान की मोनालिसा, राजस्थान की राधा आदि नामों से पुकारा गया। निहालचंद ने राजाज्ञा से राजा और सभी कमी, जो बाद में उनकी उपपत्नी बन गईं, को राधा कृष्ण के रूप में अपने चित्रों में अमरत्व प्रदान किया। इन चित्रों में कला, सौन्दर्य और प्रेम -भावना का अद्भुत संयोजन दिखाई देता है।

कालांतर में पारिवारिक विवादों के चलते महाराज सावंत सिंह का घर परिवार से मोहभंग हो गया और वह राजपाट त्याग कर, अपने पुत्र सरदार सिंह को राजगद्दी सौंपकर, वृंदावन आ गए तथा वल्लभाचार्य के पंथ में दीक्षित हुए। वह नागरीदास नाम से कृष्ण काव्य की रचना करने लगे। बणी ठणी भी उनके साथ ही वृंदावन आ गईं और रसिक बिहारी मंदिर के महंत रसिक देव से दीक्षा ग्रहण की तथा “रसिक बिहारी” के नाम से कविता लिखने लगीं। इन कविताओं में श्रीकृष्ण और राधिका के जन्म के विवरणों के साथ उनके बीच प्रेम के स्फुरण और उसकी प्रगाढता के जीवंत चित्रण के साथ ही कुंज विहार, रास-क्रीड़ा, होली, साँझ, हिंडोला, पनघट आदि विविध लीला-प्रसंगों का वर्णन अत्यंत सरसता से हुआ है। राधा- कृष्ण के प्रेम में पगे अत्यंत मनोहारी पदों की रचना रसिक बिहारी ने की है और उनकी विविध लीलाओं का अत्यंत सरस और मार्मिक वर्णन भी किया है। राधा के उपवन में झूला झूलने और कृष्ण द्वारा छिपकर इस मनोहर दृश्य को निहारने का एक सुंदर प्रसंग निम्नलिखित पद में बड़ी स्वाभाविक रूप में चित्रित किया गया है-

“धीरे झूलो री राधा प्यारी जी । 

 

नवल रंगीली सबै झुलावत गावत सखियाँ सारी जी । 

 

फरहरात अंचल चल चचल लाज न जात सँभारी जी । 

 

कुंजन ओट दुरे लखि देखत प्रीतम रसिक बिहारी जी ।”

बणी ठणी  अर्थात रसिक बिहारी के काव्य में नायिका भेद का वर्णन भी अत्यंत कुशलतापूर्वक हुआ है और वह इसके लिए भी जानी जाती हैं।  प्राय: यह माना जाता है कि रीतिकालीन कवियों ने ही नख -शिख वर्णन के कवित्त और पदों की रचना की है लेकिन कुछ कवयित्रियों ने भी इस क्षेत्र में अपनी काव्य क्षमता का प्रदर्शन किया है जिनमें रसिक बिहारी का नाम भी लिया जा सकता है। राधिका की रसभरी रतनारी आँखों के सौन्दर्य को इस पद में बहुत ही खूबसूरती से उकेरा गया है-

“रतनारी हो थारी आंखड़ियाँ।

प्रेम छकी रस-बस अलंसाणी जाणि कमल की पांखड़ियाँ॥

सुन्दर रूप लुभाई गति मति हौं गई ज्यूं मधु मांखड़ियाँ।

रसिकबिहारी वारी प्यारी कौन बसी निसि कांखड़ियाँ॥”

भक्त नागरीदास ने ब्रह्म कुंड पर सांझी अर्थात ब्रज की लोक कला पर केंद्रित मेले का आयोजन भी किया और भक्तिन रसिक बिहारी ने सांझी पर कई मार्मिक पदों की रचना की। सांझी का एक पद आपके अवलोकनार्थ उद्धृत है जिसमें गोपियों के सज धजकर सांझी खेलने का मनोरम वर्णन किया गया है और प्रियतम कृष्ण की मनोदशा का भी यथार्थ चित्रण हुआ है जो गोपियों का रूप निहार कर ठगे से रह जाते हैं – 

“खेले सांझी साँझ प्यारी|

गोप कुंवरि साथणी लियां सांचे चाव सों चतुर सिंगारी||

फूल भरी फिरें फूल लेण ज्यौ भूल री फुलवारी|

रहया ठग्या लखि रूप लालची प्रियतम रसिक बिहारी||”

रसिक बिहारी का ब्रज, राजस्थानी और पंजाबी भाषा पर समान अधिकार था। पंजाबी में रचित एक वियोग का पद देखिए जिसमें बिछड़े जोड़ों को आपस में मिला देने को उन्होंने सबाब का काम अर्थात पुण्य कार्य कहा है-

“बहि सौंहना मोहन यार फूल है गुलाब दा| 

रंग रंगीला अरु चटकीला गुल होय न कोई जबाब दा|

उस बिन भंवरे ज्यों भव दाहें यह दिल मुज बेताब| 

कोई मिलावै रसिक बिहारी नू है यह काम सबाब दा || “

रसिक बिहारी की कविताओं में ब्रज की लोक संस्कृति का भी जीवंत चित्रण मिलता है। रसखान की ही भांति वह उस स्थान विशेष से भी प्रेम करती थीं जो उनके आराध्य राधा कृष्ण की क्रीड़ा स्थली रही थी इसीलिए उन्होंने ब्रज के लोक समारोहों और उत्सवों को भी अपनी कविताओं में कुशलता से उतारा है। ब्रज की होली का एक मनभावन दृश्य उनके पद में साकार हो उठा है-

” होरी होरी कहि बोले सब ब्रज की नारि । 

 

नन्द गाँव बरसानो हिलि मिलि गावत इत उत रस की गारि । 

 

उड़त गुलाल अरूण भयो अम्बर चलत रंग पिचकारि कि धारि। 

 

रसिक विहारी भानु-दुलारी नायक संग खेलें खेलवारि ।”

रसिक बिहारी एक उच्च कोटि की कवयित्री थी। उनकी कविताओं में प्रेम, शृंगार, भक्ति और लोक-संस्कृति, इन सभी का सुंदर निदर्शन मिलता है। कवयित्री होने के साथ ही वह अत्यंत रूपवती और गुणवंत नारी भी थीं जिनका कला और कविता के इतिहास में अक्षुण्ण स्थान है। वह एक समर्पित प्रेमिका और एकनिष्ठ भक्त भी थीं। उनके द्वारा रचित भक्ति का एक पद आपके साथ साझा करते हुए मैं आज की बात समाप्त करूंगी। उद्धृत पद में भक्त के ह्रदय की बेबाकी को अभिव्यक्ति मिली है जो प्रेम और भक्ति के लिए दुनिया वालों की परवाह नहीं करता और भक्ति के अथाह सागर में डूबकर ही आनंद की प्राप्ति करता है-

“मैं अपनो मन-भावन लीनौं, इन लोगन को कहा न कीनौं।

मन दै मोल लयौ री सजनी, रतन अमोलक नन्ददुलारे॥

नवल लाल रंग भीनो।

कहा भयो सब के मुख मोरे, मैं पायो पीव प्रबीनौं।

 ‘रसिकबिहारी’ प्यारो प्रतीम, सिर बिधनां लिख दौनौ॥”

 

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