रामकृष्ण मिशन के अथक प्रयास का साक्षी है स्वामी विवेकानंद के पैतृक आवास का पुनरुद्धार कार्य

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सुषमा त्रिपाठी कनुप्रिया

स्वामी विवेकानन्द का घर हमेशा से उत्सुकता और कौतुहल का विषय रहा है। विवेकानन्द रोड आना – जाना तो हमेशा से होता रहा मगर घर कभी खोज नहीं सकी…यह इच्छा मन में दबी रही। आज स्वामी विवेकानन्द की जन्मस्थली को लेकर जो पड़ताल आपके सामने है, वह इसी जिज्ञासा का परिणाम और एक इच्छापूर्ति की सन्तुष्टि है। हम लिख सकते हैं, बता सकते हैं मगर अनुभूति का जो रोमांच है….वह तो यहाँ आकर ही मिलेगा इसलिए आप दुनिया के किसी भी कोने में यह आलेख पढ़ रहे हों…हमारी पड़ताल देख रहे हों…वह यहाँ आकर इस अद्भुत स्मृति को अवश्य देखें। रामकृष्ण मिशन की तत्परता, समर्पण, परिश्रम ने स्वामी जी का खोयी स्मृति को जीवन्त बनाकर पूरी मानव जाति का उपकार किया है। यह सब एक पुनरुद्धार कार्य का सुफल है जिसका बीड़ा रामकृष्ण मिशन ने उठाया…बगैर उसे जाने यह गाथा अधूरी है तो देखते हैं…समर्पण और निष्ठा के इतिहास की एक झलक –

आज यह स्वामी जी का घर रामकृष्ण मिशन स्वामी विवेकानन्द का पैतृक आवास एवं सांस्कृतिक केन्द्र कहलाता है लेकिन यह यात्रा इतनी आसान भी नहीं थी और यहाँ जो संग्रहालय है…वह आपको इतिहास के अनोखे पन्ने तक ले जाता है। इस घर का जीर्णोद्धार हुआ और नये सिरे से सजाया गया…तब उद्घाटन हुआ 26 सितम्बर 2004 को। स्वामी जी के पैतृक आवास को लेकर बांग्ला में कोई पुस्तक नहीं थी मगर अब बांग्ला में एक पुस्तक उपलब्ध है। पुस्तक स्वामी एकरूपानंद द्वारा लिखी गयी है और पुस्तक का नाम है ‘रामकृष्ण मिशन स्वामी विवेकानंद पैतृक आवास ओ सांस्कृतिक केन्द्रेर इतिवृत’।

दशकों के परिश्रम और निष्ठा की कहानी है यह पुनरुद्धार कार्य

रामकृष्ण परमहंस के शिष्य स्वामी प्रेमानंद की इच्छा थी कि स्वामी विवेकानंद के पैतृक आवास का उपयोग हो। इस पर स्वामी ओम्कारेश्वरानंद ने स्वामी प्रेमानंद के कथन का उल्लेख किया है। स्वामी प्रेमानंद लिखते हैं, ‘मेरी इच्छा है कि स्वामी जी का पैतृक आवास खरीदा जाये और वहाँ पर एक विशाल शिव मंदिर बने जिसमें एक प्रार्थना सभागार और एक पुस्तकालय हो। श्री ठाकुर और स्वामी जी के नाम पर रोज प्रार्थना हो, भक्ति गीत, ध्यान हो, शास्त्रों को पढ़ा जाये, नियमित व्याख्यान हों, व्यायामशाला हो। जो युवा बेलूर मठ नहीं आ सकते, वे यहाँ आ सकें…अगर कोलकाता में ऐसे भवन की स्थापना हो तो यह उनके लिए अच्छा होगा। स्वामी जी की शिक्षा का प्रसार युवाओं में हो सकेगा तो यह देश को भी लाभ पहुँचा सकेगा।’

पर क्या यह सब इतना आसान था? हालांकि स्वामी विवेकानंद की जन्मस्थली को समुचित स्मारक के रूप में स्थापित करने की इच्छा संन्यासी और भक्त दशकों से महसूस कर रहे थे लेकिन 1963 तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया जा सका था। स्वामी विवेकानंद के जन्म शताब्दी वर्ष 1963 के पूर्व 1962 में तत्कालीन पश्चिम बंगाल सरकार ने स्वामी जी की जन्म स्थली पर एक स्मारक स्थापित करने का निर्णय लिया। तब राज्य सरकार ने रामकृष्ण मिशन से इस बारे में पूछा कि क्या मिशन की रुचि इस कार्य में है, साथ ही मिशन से सरकार ने एक निश्चित प्रस्ताव देने को भी कहा। रामकृष्ण मिशन की शताब्दी कमेटी ने प्रस्ताव तैयार कर सरकार को सौंपा। राज्य सरकार ने प्रस्ताव को स्वीकार किया और 1963 में भूमि अधिग्रहण कानून के तहत अधिसूचना जारी की। इस तरह की अधिसूचना 1973 और 1974 में भी जारी की गयी। तब तक मूल भवन ध्वस्त हो चला था, यहाँ पर 54 परिवार और छोटे व्यावसायिक केन्द्रों का भी कब्जा था। किरायेदारों ने अधिग्रहण प्रक्रिया को चुनौती देते हुए अदालत का दरवाजा खटखटाया। यह मामला 30 साल तक चला।

अधिग्रहण के पूर्व ऐसी हो गयी थी यह विरासत

आखिरकार 1993 में स्वामी विवेकानंद के विश्व धर्म सम्मेलन में दिये गये वक्तव्य के शताब्दी वर्ष में रामकृष्ण मिशन ने किरायेदारों के साथ सीधे बातचीत से समस्या सुलझाने का निर्णय हाईकोर्ट की सहमति से लिया। तय हुआ कि रामकृष्ण मिशन किरायेदारों को वैकल्पिक आवास मुहैया करवायेगा और राज्य सरकार पूरी इमारत के साथ उससे लगी जमीन को अधिग्रहीत कर रामकृष्ण मिशन को सौंप देगी। तब तक स्वामी जी का पैतृक घर ध्वंसावशेष में तब्दील हो चुका था। ध्वस्त स्थापत्य, शेड्स और कचरे को साफ करना एक दुष्कर कार्य था। सबसे पहले यहाँ रह रहे 143 परिवारों और छोटे व्यवसायियों को कहीं और बसाना था। रामकृष्ण मिशन ने कलकत्ता इम्प्रूवमेंट ट्रस्ट से जमीन खरीदी और 6 तल्ले की इमारत बनवायी जिसमें 28 फ्लैट थे। यह काफी नहीं था इसलिए मिशन ने सरकार और निजी एजेन्सियों से और अधिक फ्लैट्स और भवन खरीदे जिसमें 6 करोड़ रुपये का खर्च आया । इस काम में 7 साल लग गये। जब यह काम पूरा हुआ तो राज्य सरकार ने स्वामी विवेकानंद का पैतृक आवास और उससे संलग्न भूमि का अधिग्रहण किया और 26 मई 1999 को रामकृष्ण मिशन को सौंप दिया।

कहते हैं कि स्वामी जी सप्तर्षियों में से एक थे। चित्र में जो शिशु है, वह ठाकुर रामकृष्ण परमहंस हैं और संन्यासी कोई और नहीं स्वामी विवेकानंद है…इसका उल्लेख भी है

इसके अतिरिक्त संन्यासियों के आवास, प्रस्तावित ग्रामीण एवं बस्ती उन्नयन कार्य, कार पार्किंग के लिए मिशन ने स्वतन्त्र रूप से 3, गौरमोहन मुखर्जी स्ट्रीट का उत्तरी किनारे पर भी भूमि खरीदी। इसके अतिरिक्त भूगर्भ जल के टैंक, एक इलेक्ट्रिक मीटर कक्ष, जेनरेटर कक्ष, और रामकृष्ण मंच नामक एक ओपन एयर ऑडिटोरियम के लिए भी जमीन खरीदी गयी। रामकृष्ण मिशन ने स्वामी जी के पैतृक आवास की मूल संरचना में कोई बदलाव नहीं किया और भवन के मूल स्थापत्य को बहाल रखते हुए फिर से संरक्षित किया। जून 1999 से वास्तविक रूप में पुनरुद्धार कार्य आरम्भ हुआ।
हाई कोर्ट के आर्काइव से भवन का मूल नक्शा खोजकर निकाला गया। तकनीकी अध्यन किया गया और बाद में जोड़े गये अतिरिक्त भवनों की पहचान की गयी। इससे मूल भवन को चिन्हित करने में आसानी हुई। सबसे बड़ी उपलब्धि थी कि ठाकुरदालान को खोज निकाला गया जो इस जीर्ण – शीर्ण तीन मंजिले भवन के पीछे छुपा था जिसे कब्जादारों ने जोड़ा था। ईंटों पर से ईंट हटाकर ठाकुरदालान को खोज निकाला गया। इसका मिलना और पुनरुद्धार होना ही वास्तव में एक चमत्कार ही है।

इसी कक्ष में हुआ था स्वामी जी का जन्म,अब यह मंदिर है

यह कार्य आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया तथा डेवलपमेंट कन्सल्टेंट्स प्राइवेट लिमिटेड की मदद से किया गया। इस निर्माण कार्य के लिए वही सामग्री इस्तेमाल की गयी जो 18 शताब्दी के भवन निर्माण कार्य में उपयोग में लायी जाती थी इसलिए पुनरुद्धार के बाद संरक्षित भवन हेरिटेज भवन कहलाता है। केन्द्र सरकार, राज्य सरकार, दानदाताओं और भक्तों ने इस कार्य के लिए आर्थिक सहयोग दिया। तत्कालीन मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य, कोलकाता के पूर्व मेयर सुब्रत मुखर्जी, स्थानीय सांसद तथा विधायक समेत स्थानीय संस्थाएं सहायता के लिए आगे आयीं।
10 मार्च 2001 को मिशन के तत्कालीन उपाध्यक्ष स्वामी गहनानंदजी महाराज ने प्रस्तावित रामकृष्ण मिशन स्वामी विवेकानंद स्मारक तथा सांस्कृतिक केन्द्र का शिलान्यास किया। 26 सितम्बर 2004 में तत्कालीन मिशन महासचिव स्वामी स्मरणानंद जी महाराज ने इस हेरिटेज भवन संलग्न नव स्थापित संन्यासी आवास का उद्घाटन किया इसी दिन यह ऐतिहासिक भवन आम जनता के लिए खोला गया। 1 अक्टूबर 2004 को तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. ए.पी. जे. कलाम ने सांस्कृतिक केन्द्र का उद्घाटन किया। 1 जनवरी को मिशन के तत्कालीन अध्यक्ष आत्मास्थानानंद जी महाराज ने 12.6 फीट की स्वामी विवेकानंद की कांस्य प्रतिमा का उद्घाटन किया।

अब एक झलक अतीत की तरफ, ये है दत्त परिवार का इतिहास

इस शिवलिंग की पूजा भुवनेश्वरी देवी करती थीं औऱ इनकी आराधना से ही स्वामी विवेकानंद का जन्म हुआ इसी कारण से वे उनको बचपन में वीरेश्वर भी कहती थीं

स्वामी विवेकानन्द के मँझले भाई महेन्द्रनाथ दत्त के अनुसार दत्त परिवार की जमीन्दारी आमलाछाड़ा नामक किसी स्थान पर थी। इसके बाद दत्त परिवार बर्दवान के कालना महकमे के डेरियाटोना (डेरेटोना) गाँव में रहने लगा। दत्त परिवार की जमीन्दारी से जुड़ा होने के कारण गाँव का नाम हुआ दत्त डेरियाटोना। मुगल शासकों के समय से ही लम्बे अरसे दत्त परिवार ने सुखपूर्वक निवास किया। इसके बाद अंग्रेजों के समय रामनिधि दत्त अपने पुत्र रामजीवन और पौत्र रामसुन्दर दत्त को लेकर गोविन्दपुर आए। आज आप जिस जीपीओ को देखते हैं, वहीं इन्होंने निवास (बांग्ला में बसतबाटी) बनाया। 1776 में नवाब सिराजुद्दौला ने ईस्ट इंडिया कम्पनी का दुर्ग ध्वस्त किया। बाद में ईस्ट इंडिया कम्पनी ने दत्त परिवार से यह जगह छोड़ने को कहा क्योंकि ईस्ट इंडिया कम्पनी यहाँ नया दुर्ग बनाना चाहती थी। दत्त परिवार को पुनर्वास दिया गया उत्तर कोलकाता के सूतानाटी अन्तर्गत आने वाले सिमुलिया (शिमला या सिमला) अंचल के मधु राय लेन। तब यह इलाका जंगल हुआ करता था जिसे साफ करने के लिए ईस्ट इंडिया कम्पनी ने 14 रुपये दिये। इस तरह दत्त परिवार शिमला स्ट्रीट यानी आज के विवेकानंद रोड में वास करने लगा। रामनिधि और रामजीवन ऊँचे पद पर थे। समय के साथ परिवार और समृद्धि, दोनों में वृद्धि हुई, घर अनुपयोगी होने लगा। तब 300 साल पहले स्वामी विवेकानन्द के परदादा राममोहन दत्त ने 3, गौरमोहन मुखर्जी स्ट्रीट पर यह भव्य भवन बनवाया।  12 जनवरी 1863 में स्वामी विवेकानन्द का जन्म इसी घर में हुआ और यहीं उनका बचपन गुजरा।

प्रधान कार्यालय

शिमुलिया का वह मकान
शिमुलिया में कुल 4 बीघा जमीन दत्त परिवार की थी। इसमें से डेढ़ बीघा जमीन पर मूल निवास स्थान बना, शेष ढाई बीघा जमीन पर थी पुष्करिणी (तालाब), अस्तबल, फूल – फलों से लदा बागान और कर्मचारियों के लिए रहने की जगह। यह पुष्करिणी या तालाब आज के विवेकानंद रोड और विधान सरणी का संयोग स्थल हुआ करती थी। 2 नम्बर गौरमोहन मुखर्जी स्ट्रीट में 4 कट्ठा जमीन पर राममोहन दत्त का विशाल अस्तबल था। आज इस जगह पर रामकृष्ण मिशन स्वामी विवेकानंद का पैतृक आवास तथा सांस्कृतिक केन्द्र का प्रधान कार्यालय और स्कूल ऑफ लैंग्वेजेस है। मूल इमारत बाहरी महल और अन्दरमहल, दो भागों में विभक्त थी। श्रद्धालुओं और आम जनता के लिए कक्ष विन्यास किया गया है जिससे स्वामी जी के जीवन की घटनाओं को सुगमता से समझाया जा सके।
मूल भवन में प्रथम दो कमरे किसके थे, यह जाना नहीं जा सका है। सम्भवतः यह बैठकखाना था। दूसरे कमरे में स्वामी जी के परिवार की वंशावली है।
मकान की एक झलक
बाहिर महल में था ठाकुर दालान, स्वामी जी के पिता विश्वनाथ दत्त का कमरा, नरेन्द्र नाथ का अध्ययन अथवा बुद्ध दर्शन कक्ष, भूपेन्द्रनाथ, महेन्द्रनाथ के कक्ष, स्वामी जी का परिधान कक्ष और संगीत चर्चा का घर। दीवारें बड़ी – बड़ी तस्वीरों से सजी रहती थीं।
वहीं अन्दरमहल स्त्रियों के लिए था। स्वामी जी की माँ भुवनेश्वरी देवी का कमरा, बड़ी बहन स्वर्णमयी का कमरा, शिव मंदिर, स्वामी जी का जन्मस्थान, ध्यान कक्ष, ठाकुर भंडार, दादी श्यामा सुन्दरी देवी का कक्ष। ठाकुरदालान पश्चिममुखी था और उसके सामने था बड़ा प्रांगण। कई बैठकखाने थे। हावड़ा के सलकिया में राममोहन दत्त की 2 उद्यान बाटी थीं और खिदिरपुर में भी कुछ सम्पत्ति थी। महेन्द्र दत्त लिखते हैं कि तब नरेन को खोजते हुए रामकृष्ण परमहंस अक्सर यहाँ आया करते थे मगर भीतर कभी प्रवेश नहीं करते थे और नन्हे भूपेन को गोद में लेकर दुलार करते।
आज का भवन

आज यह भवन रामकृष्ण मिशन के परिश्रम से सुसज्जित है। आप यहाँ पर विवेकानंद के जीवन से जुड़ी घटनाओं का चित्रण झाँकियों में देख सकते हैं। स्वामी जी का जन्म जिस कक्ष में हुआ था, वह आज विवेकानन्द मंदिर है। पिता विश्वनाथ दत्त की लिखावट, स्वामी जी द्वारा प्रयुक्त वाद्य यंत्र से लेकर खेल के सामान, उनके परिधान..सब सुरक्षित हैं। वह शिवलिंग हैं…जिसकी आराधना करके माता भुवनेश्वरी देवी को पुत्र नरेन मिला था। बहुत कम लोग जानते हैं कि बचपन में इसी कारण से माता नरेन को वीरेश्वर भी बुलाया करती थीं। दीवारों पर बड़ी – बड़ी तस्वीरें और उपरोक्त सभी कक्ष हैं। जब आप सीढ़ियों से ऊपर चढ़ते हैं तो एक विशाल चित्र ध्यान खींचता है। चित्र में सप्तऋषि हैं और सामने बैठे ऋषि के कान में एक शिशु कुछ कह रहा है। स्वामी सारदानन्द जी महाराज ने लीला प्रसंग में लिखा है कि बाद में स्वयं ठाकुर ने उन सबको बताया था कि यह शिशु ठाकुर रामकृष्ण परमहंस हैं और यह ऋषि कोई और नहीं बल्कि स्वयं स्वामी विवेकानंद हैं। शिशु इनको कह रहा है कि वे धरती पर जा रहे हैं और ऋषि भी पीछे से आएं। इस घटना को लाइट एंड साउंड शो के माध्यम से समझाने का प्रयास किया गया है। नरेन्द्र के जन्म के पहले ठाकुर भाव समाधि में एक दिन यही दृश्य देखा था और नरेन को देखकर वे समझ गये थे…यही नरेन्द्र के प्रति उनके आकर्षण का कारण भी था।
शिकॉगो धर्म सम्मेलन को लेकर थ्री डी फिल्म प्रदर्शित की जाती है और इस घर का पुनरोद्धार किस तरह किया गया…उसे लेकर भी एक वीडियो प्रदर्शित किया जाता है। मुख्य द्वार पर स्वामी जी की विशाल कांस्य प्रतिमा है और इसके सामने है प्रधान कार्यालय तथा पुस्तक विक्रय केन्द्र। इसके साथ ही है साधु व कर्मियों का निवास, निवेदिता भवन। निवेदिता भवन में चिकित्सा सेवाएं दी जाती हैं। कम्प्यूटर प्रशिक्षण केन्द्र भी है। इस समय 850 सीटों वाले वातानुकूलित सभागार का निर्माण कार्य चल रहा है जिसका स्वप्न स्वामी प्रेमानंद ने देखा था, आज मिशन उसे साकार कर रहा है और यह मानव जाति पर ऐसा उपकार है जिसे इतिहास हमेशा याद रखेगा।

स्त्रोत साभार – रामकृष्ण मिशन स्वामी विवेकानंदेर पैतृक आवास ओ सांस्कृतिक केन्द्रेर इतिवृत (पुस्तक)

स्त्रोत साभार – रामकृष्ण मिशन स्वामी विवेकानंद का पैतृक आवास तथा सांस्कृतिक केन्द्र की वेबसाइट 

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