रेखा श्रीवास्तव की तीन कविताएँ

0
61
रेखा श्रीवास्तव

1.

जी हाँ, मैंने प्रेम किया है
बहुत ज्यादा प्रेम किया है
प्रेम में डूब गयी हूँ
प्रेममय हो गयी हूँ
हाँ, मैंने प्रेम किया है
गीत गुनगुनाती हूँ
वादा भी किया है
साथ रहने का इरादा भी है
जी हाँ, मैंने प्रेम किया है
मैं प्रेम में पागल हो चुकी हूँ
कुछ और दिखता नहीं
केवल प्रेम ही प्रेम दिखता है
न मीरा, न राधा, इनमें से कोई नहीं मैं
डूबा हुआ है मेरा मन
हाँ, मैंने बहुत प्रेम कर लिया है
जल रहे होंगे जलने वाले
भनक सबको मिल रही होगी
जी हाँ, मैंने प्रेम कर लिया है
तुमने बिल्कुल सही सुना
सही समझा
मैंने प्रेम किया है
जी हाँ,
मैंने खुद से प्रेम किया है
अपने आप से प्रेम
किया है
इतना प्रेम किया है कि
आँखें, दिल मेरे ही प्रेम
में गोते खा रहा है
जी हाँ, मैंने खुद से प्रेम
किया है
और कोई खता नहीं की
ना ही कोई भूल
मैंने खुद से किया है प्यार
और
उससे भी बड़ी बात
खुद को किया है स्वीकार

 

2.

बाईपास

बाईपास
बाईपास के
एक तरफ
फुटपाथ है
दुकानें है
नल से धीरे-धीरे आता पानी है
कतार में लोग है
नहाती युवतियाँ है
छोटे-छोटे कमरे है
कमरों से ज्यादा लोग है
कुछ बाहर, कुछ अंदर है
नंगे पैर खेलते बच्चे है
भाई-बहन हाथ थामे
स्कूल जा रहे हैं
फटे-पुराने बैग से किताब झांक रहा है
बड़े-बुजुर्ग बाहर कुर्सी पर बैठे गपिया रहे हैं
संकरी सड़कों पर
ऑटो, रिक्शा, बस है
उसके बीच से
बच्चों की आती-जाती फुटबॉल है
वहीं,
दूसरी ओर
पांच सितारा होटल है
चौड़ी-चौ़ड़ी सड़कें हैं
ऊँचे-ऊँचे मकान है
मकानों में फ्लैट है
फ्लैट में कमरे भरे पड़े है
पर उसमें रहने के लिए
लोग नहीं है
नामी-गिरामी रेस्टोरेंट है
त्योहारों पर कतारें लगी है
तेज रफ्तार से चलती
निजी वाहनों की भरमार है
उन वाहनों से झांकता
पपी ( पालतू कुत्ता ) है

 

3.
गिरो गिरो
जरूर गिरो
पर
इतना ही गिरो
जहाँ से खुद
उठ सको
गिरो गिरो
जरूर गिरो
पर याद रहे
इतना
मत गिरना
जहाँ से तुम्हें
उठाने के लिए
किसी और को
गिरना पड़े

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

twelve + 10 =