रोहित पथिक की तीन कविताएँ

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कवि रोहित प्रसाद पथिक स्थान: आसनसोल, पश्चिम बंगाल। प्रकाशन: कई प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ, कहानियाँ, पुस्तक समीक्षा व रेखाचित्रों का निरन्तर प्रकाशन। एक काव्य संग्रह ” ईश्वर को मरते देखा है !” हाल ही में प्रकाशित। संप्रति: अनुगूँज अर्द्धवार्षिक साहित्य पत्रिका के संपादक सम्पर्क: के. एस. रोड़ रेल पार डीपू पाडा क्वार्टर नम्बर:(741/सी), आसनसोल-713302( पश्चिम बंगाल) मोबाइल: 8101303434/8167879455 ईमेल: poetrohit2001@gmail.com
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रेखाचित्र
कुछ लकीरें खींचने से
नहीं बनता है रेखाचित्र
वह
बन जाता है हमारा भविष्य ।
जिसे हम
धीरे-धीरे कागज़ पर उतार कर
रख सकते हैं
नहीं लिख सकते कोई मार्मिक कविता उस पर।
असल में
मैं मानता हूं कि
हर रेखाचित्र
एक कविता होती है।
2
  चित्रकार 
शुरू करूँ कैसे…?
क्योंकि
बंद मुट्ठी में मौजूद है कई रंग-बिरंगी दुनिया
कहूँ कैसे…?
अपने आप को रंगों में रंग कर।
एक चित्रकार तड़प रहा है
अपने सामने पड़े कैनवास को देख
वह सोच रहा है
क्या बनाऊँ कि बन जाएँ
एक स्वतंत्र न्यायालय
जिसमें सिर्फ और सिर्फ मेरी चित्रकारी की पेशी हो
और मैं न्यायधीश बनकर न्याय करूँ
अपने ही द्वारा बनाये गए चित्रों पर।
फिर सोचता हूँ
न्याय कर के भी मैं अन्याय ही करूँगा
क्योंकि मुझे नहीं पता
चित्रों के संविधान की भाषा
लौट जाता हूँ
निराश होकर उस गलियारे से
जहाँ आज भी मैं
फेंक आया हूँ मेरे अनगिनत कैनवास चित्र।
3
कविता बनाने की प्रक्रिया 
उपन्यास के साथ
एक गम्भीर मुलाकात
फिर वह बन गया लघु उपन्यास
गम्भीरता को ज़ेब में रखकर ही
मैं लिखता हूँ।
अब लघु उपन्यास में
मैं ज्यादा दिमाग़ लगाकर समझा
तो वह फिर कहानी बनता चला गया
कई बार तो मैं कहानी को पढ़कर
सिर्फ और सिर्फ हानि ही सहता हूँ,
क्या बताएं जनाब!
मेरा दिमाग़ कुछ ज्यादा ही
उपन्यासों की परिभाषा समझता है।
जब तक हम
गिरते हैं कहानियों की खाई में
तब तक एक दशक
हमारे जीवन में कई प्रश्न उठाते हैं?
अब जब कहानियाँ मुझसे असहमत होने के लिए
प्रार्थना करती है तब—
मैं लघुकथा की गोद में सो जाता हूँ,
तब तक लघुकथा मेड इन चाइना नहीं होता
वह होती है स्वदेशी
बिलकुल नशे की लत की तरह।
अन्त में
मैं लघुकथा की गोद से एकाएक जागता हूँ
तो ऐसा लगता है कि
लघुकथा अब टूकड़े-टूकड़े में बटकर
स्री के हर अंगों में समावेश हो चुकी है,
जिसे मैं
कविता बनने की प्रक्रिया मानता हूँ।
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