रौनक कम हुई है मगर हिम्मत नहीं टूटी बड़ाबाजार के व्यवसायियों की

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आज दिवाली है और दिवाली पर शहर की रौनक का कोई जवाब नहीं होता। कोरोना के कारण बाजार की चमक पर असर पड़ा है. यह सच है मगर शहर अपनी रौनक से महामारी पर जीवन की जीत का सिक्का जमा रहा है। कोलकाता में दिवाली पर बड़ाबाजार इलाके में दुकानें सज उठती हैं, नजारा ऐसा होता है कि इलाके की गलियों में तिल रखने की भी जगह नहीं मिलती मगर इस बार ऐसा नहीं है। अलबत्ता कोरोना के कारण व्यवसायी सजग हैं और जब आप बड़ाबाजार के कॉटन स्ट्रीट इलाके में दिवाली बाजार की हलचल देखने जाते हैं तो इस बात का पता तब चलता है जब आप स्टॉलों पर नो मास्क, नो सेल की नोटिस देखते हैं। मोलभाव पहले की तरह चल रहे होते हैं, थोड़ी नोंक – झोक…यही तो लॉकडाउन के दिनों में याद आती रही है। गलियों से गुजरते हुए मिठाई की खुशबू, तोरण, रंग – बिरंगे दीये, स्टीकर…जब दिखते हैं…तो कदम बस ठहर जाते हैं। धनतेरस की धमक बर्तनों की दुकानों पर मौजूद दिखी।


रवीन्द्र सरणी पर 100 साल से अधिक पुरानी बर्तनों की दुकान बैजनाथ प्रसाद महावीर प्रसाद स्थित है, वक्त के साथ अब यहाँ पर स्टील, पीतल और कांसे के बर्तन, बाल्टी, टिफिन बॉक्स से लेकर घरेलू उपकरण तक मिलते हैं। यहाँ के प्रतिनिधि किशन केसरवानी कहते हैं कि कोरोना का असर तो पड़ा है मगर बाजार पहले की तुलना में 10 – 15 प्रतिशत सुधर रहा है। जाहिर है कि कोरोना का असर खरीददारी पर पड़ा है…खरीददारी हो भी रही है बस बर्तनों के मामले में अब बजट पर जोर दिया जा रहा है।
रवीन्द्र सरणी से हम आगे बांसतल्ला की ओर चले तो गली में दिनेश सोनकर की सजी – धजी दुकान मिली और खासियत यह है कि आप यहाँ एक ही दुकान से दिवाली और पूजा का सारा सामान खरीदते हैं। लक्ष्मी – गणेश की मूर्ति, तोरण, रंगोली, पूजा सामग्री, मोमबत्ती, यहाँ पर सब उपलब्ध है। सोनकर बिक्री से खुश नजर नहीं आये…जाहिर है कि कोरोना की मार से जब बिक्री ठप हो जाए तो व्यवसायी खुश रहे भी तो कैसे।


जब आप बांसतल्ला से आगे निकलते हैं तो बड़ाबाजार का वह इलाका नजर आता है..जहाँ एक साथ कई दुकानें लगती हैं। दिवाली के तीन दिन पहले से ही यहाँ पर बड़े वाहनों का प्रवेश निषेध हो जाता है…। दूर – दूर तक सजे – धजे स्टॉल दिखते हैं और खरीददारों की भीड़। बड़ाबाजार छोड़कर कहीं और बस जाने वाले भी दिवाली की खरीददारी के लिए बड़ाबाजार का ही रुख करते हैं….दुकानें तो अब भी हैं मगर सख्त ताकीद के साथ ही मास्क न पहनने वालों से कोई सौदा नहीं होगा। सुरक्षा के लिए पुलिस कर्मी भी हैं और इनकी पैनी नजर हर चीज पर है।

हैरत की बात यह है कि लोग उन चीजों को लेकर भी मोलभाव करते दिखे जिसे वे शॉपिंग मॉल से मनमानी कीमत पर खरीदते हैं। ख्याल अपना – अपना हो सकता है मगर क्या मनमानी न सही, कीमतें जब वाजिब हों तो क्या मोलभाव जरूरी है? ये तो निर्णय आपका है मगर लक्ष्य तो हम सबका एक ही है…आत्मनिर्भर भारत..तो बैठे क्यों हैं…और किसी त्योहार का ही इन्तजार क्यों…आम दिनों में भी स्थानीय कारीगरों को प्रोत्साहन दीजिए…वोकल फॉर लोकल बनिए…खरीददारी…स्थानीय लोगों से ही करिए।

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