वहम के रोग से खुद को दूर रखना जरूरी है

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प्रो, गीता दूबे

सभी सखियों को नमस्कार। उम्मीद है, आप सब सपरिवार सकुशल होंगी और जिंदगी की हर परेशानी का सामना हँसते हुए कर रही होंगी। सखियों, एक शब्द है “वहम” और यह एक शब्द कभी -कभी हमारे जेहन और जिंदगी पर इतना गहरा असर छोड़ता है कि इस से निकलकर स्वाभाविक जिंदगी जीना हमारे लिए संभव नहीं हो पाता। हालांकि कई वहम बेहद खूबसूरत भी होते हैं जिनके साए में इंसान की जिंदगी बड़ी खुशी के साथ कट जाया करती है। शायद इसीलिए बहुत बार‌ लोग -बाग, यार- दोस्त यह राय देते भी नजर आते हैं कि जिंदगी अगर बेमजा और बेमक़सद हो जाए तो उसे खुशनुमा और आसान बनाने के लिए एक खूबसूरत वहम पाल लेना चाहिए। लेकिन दुनिया तो दुनिया है। वह भला एक सी बात कब कहती है और अगर कह भी दे तो ज्यादा देर‌ तक उस पर कायम भी नहीं रहती इसीलिए कभी- कभार यही कठोर दुनिया वाले यह कहते भी नजर आते हैं कि “चाहो तो कुत्ता पाल लो, बिल्ली पाल लो लेकिन वहम बिल्कुल ना पालना”। इसके पीछे यह कारण हो सकता है कि यह वहम कभी -कभी आप की जिंदगी को इतना नकली या बनावटी बना देता है कि उस से निकलना किसी के लिए भी मुश्किल हो जाता है। 

सखियों, आज मैं उसी “वहम” की बात कर रही हूं जो कभी- कभार हमारी जिंदगी दूभर या मुश्किल बना देता है। मनोविज्ञान की भाषा में कहें तो बहुत मर्तबा वहम हमारी जिंदगी का सबसे बड़ा मर्ज बन जाता है और उस मर्ज का इलाज किसी डॉक्टर के पास नहीं होता। वहमी आदमी को‌ तरह- तरह के वहम होते हैं। किसी को‌ वहम होता है कि उसकी तबियत सही नहीं है और‌ वह जिस किसी भी बीमारी या उसके लक्षणों के बारे में सुनता है, उन पर गहराई से विचार करने के बाद उन्हें खुद में मौजूद पाता है। ऐसे वहमी आदमी को लगता है कि दुनिया की हर बीमारी उसे है और वह यकीनी और बेयकीनी के बीच डूबता -उतराता रहता है। इसी विषय पर 1979 में एक हास्य फिल्म भी बनी थी, “मेरी बीवी की शादी”। इसके मुख्य किरदार, जिसकी भूमिका अमोल पालेकर ने निभाई थी, को भी बीमारी का वहम है और उसे लगता है कि वह जल्दी ही मरने वाला है। इसी कारण वह न केवल मरणोपरांत अपनी समाधि पर लगवाने के लिए पत्थर पर अपना नाम खुदवा लेता है बल्कि अपनी पत्नी के लिए दूसरे पति की तलाश भी शुरू कर देता है। फिल्म का तो अंत सुखद होता है लेकिन इस तरह का वहम कई बार जिंदगी को जहन्नुम भी बना देता है। अब कोई रोग हो तो उसका इलाज़ मुमकिन भी है लेकिन वहम का इलाज भला कैसे हो। तभी तो किसी समझदार आदमी ने कहा है कि “वहम का इलाज हकीम लुकमान के पास भी नहीं है।”

सखियों, इस दुनिया में सेहतमंद दिखाई देने वाला आदमी भी बहुत बार ऐसे घातक वहम रूपी मानसिक बीमारी का शिकार हो जाता है जो उसकी ही नहीं उसके आस- पास के लोगों की जिंदगी भी दूभर कर देता है। लोगों को तरह- तरह के वहम होते हैं। किसी को लगता है कि सारी दुनिया ही उसकी दुश्मन‌ है और‌ वह लोगों की भीड़ से भागता फिरता है। कोई अपने आप को दुनिया का सबसे खूबसूरत और दानिशमंद आदमी समझने का वहम पाल लेता है और सारी दुनिया को खुद से कमतर समझता हुआ क्रमशः लोगों से दूर हो जाता है। किसी को वहम होता है कि उस पर लगातार नजर रखी जा रही है या उसके खिलाफ साज़िश रची जा रही है और‌ वह हर घड़ी चौकन्ना रहता है। यह अतिरिक्त सतर्कता एक तरह के रोग में बदल जाती है जिसका परिणाम बहुधा घातक होता है। इसी तरह किसी -किसी को वहम हो जाता है कि दुनिया भर के लोग उसका मजाक उड़ाया करते हैं और इस कारण वह तमाम लोगों को अपना दुश्मन समझता हुआ, अकेलेपन में रहने का आदी हो जाता है। किसी को यह वहम हो जाता है कि फलां आदमी और औरत उस पर जान छिड़कता या छिड़कती हैं और यह वहम उसकी जान का अजाब बन जाता है। जब वहम टूटता है तो इसके कई घातक परिणाम भी दिखाई देते हैं। लब्बो लुआब यह है कि जब तक वहम एक खूबसूरत अहसास की तरह रहता है, वह कई बार पुरसुकून भी होता है। जैसे शायर अपने वहम की दुनिया में पड़ा हुआ अजीब से ख्यालात में डूबा हुआ फ़ानी बदायुनी की तरह कह बैठता है-

“न इब्तिदा की ख़बर है न इंतिहा मालूम 

रहा ये वहम कि हम हैं सो वो भी क्या मालूम ।”

इसका मतलब यह हुआ कि कुछ वहम ऐसे भी होते हैं जो इस मुश्किल जिंदगी को थोड़ा आसान जरूर बना देते हैं और आदमी इस बेआराम, बेरहम दुनिया में इस खूबसूरत वहम के सहारे खुद को बहलाते हुए किसी ना किसी तरह जीने का बहाना जरूर ढूंढ लेता है, ठीक उसी तरह जैसे अदा जाफ़री ढूंढ लेते हैं-

“लोग बे-मेहर न होते होंगे 

वहम सा दिल को हुआ था शायद ।”

यह बात मानने में हमें गुरेज़ नहीं होनी चाहिए कि कुछ ऐसे तसल्ली बख्श वहम न हो तो इंसान की जिंदगी दूभर हो जाए। कुछ ऐसे ही वहम समर्पित प्रेमी भी पाल‌ लेते हैं और अपने महबूब की यादों से ही अपना दिल बहला लेते हैं और उसके ना मिलने पर‌ भी झूठे वहम का बहाना बना कर खुद को तसल्ली दे देते हैं। इसी तरह के ख्यालात शेख़ इब्राहीम ज़ौक़ पेश करते हुए कहते हैं-

 

“क्या जाने उसे वहम है क्या मेरी तरफ़ से 

जो ख़्वाब में भी रात को तन्हा नहीं आता ।।”

लेकिन जो वहम आप को बीमार बना दें, उनसे तो भरसक बचने की कोशिश करनी चाहिए क्योंकि अगर आप इसमें सुध -बुध खोकर डूब गए तो आपके लिए मुश्किल खड़ी हो जाएगी, तब न दवा से काम बनेगा, ना दुआ ही काम आएगी, शायर यगाना चंगेज़ी की जुबां में कहें तो-

“दर्द हो तो दवा भी मुमकिन है 

 वहम की क्या दवा करे कोई ।।”

और यह वहम आदमी को कभी- कभार आदमी नहीं रहने देता, उसे गुनाह की दुनिया में भी ढकेल देता है, अब वह गुनाह उसे किस राह पर कितनी दूर तक ले जाएगा, यह तो हालात पर निर्भर करता है। हम इस वहम की गिरफ्त में आकर बीमार और‌ गुनहगार न बन जाएं इसीलिए हसरत मोहानी साहब की तजवीज पर भी गौर फरमाने की जरूरत है-

“हम जौर-परस्तों पे गुमाँ तर्क-ए-वफ़ा का 

 ये वहम कहीं तुम को गुनहगार न कर दे ।”

इसी कारण सबा अकबराबादी इस वहम नामक बीमारी से मुक्त होने की कोशिश करते हुए कुछ बेबसी के साथ कहते नजर आते हैं-

“कब तक नजात पाएँगे वहम ओ यक़ीं से हम 

उलझे हुए हैं आज भी दुनिया ओ दीं से हम ।”

सखियों, वहम के सवाल पर इतनी बात करने का कारण यही है कि आप इस बीमारी से भी अपने आप को बचा कर रखें।  शरीर के रोग का इलाज हम जितनी तत्परता से करते हैं, उतना ध्यान अगर मन के रोग पर भी दें और समय रहते उसका इलाज कर‌ लें तो हमारी जिंदगी आसान भी हो जाएगी और खुशहाल भी। इसीलिए वहम के रोग को कल्पना की दुनिया से निकलकर जिंदगी की हकीकत में तब्दील मत होने दीजिए नहीं तो जिंदगी की दुश्वारियां बेइंतहा बढ़ जाएंगी। इन्हीं दुश्वारियों से दामन बचाने की खातिर सूफी और शायर इस दुनिया और इसकी बहुत सी बातों और रवायतों को भी वहम ही मानते हुए कह बैठते हैं-

“ये तमाशा-ए-इल्म-ओ-हुनर दोस्तो

कुछ नहीं है फ़क़त काग़ज़ी वहम है।” (नईम रज़ा भट्टी)

आज विदा, सखियों। अगले हफ्ते फिर मुलाकात होगी।

 

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