वापसी

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प्रो. प्रेम शर्मा

आरती को लगभग 14 वर्ष हो गए थे लता के घर काम करते हुए। इतनी जिम्मेदारी और निपुर्णता से वह घर के सारे काम करती कि लता उसके काम में कभी कोई त्रुटि न निकाल पाती। घर की सफाई करना, बर्तन मांजना, बाजार करना-यह सब तो उसके काम थे ही-खाना बनाने की जिम्मेदारी भी उसी की थी। लता नौकरी करती थी। उसकी अनुपस्थिति में उसके दोनों बच्चे जब विद्यालय से घर लौटते तो आरती आकर खाना गर्म करती और उन्हें खिलाती। आरती का घर लता के घर के पीछे वाली गली में ही था, इसलिए उसे बार-बार आने में परेशानी नहीं होती थी।
लता के पति विकास ने एक दिन लता से कहा था-” तुम बहुत आलसी हो गई हो हर काम आरती पर छोड़ देती हो। घर संभालना तुम्हारी जिम्मेदारी है।”
“मुझे आरती पर पूरा विश्वास है।”
संक्षिप्त सा उत्तर दिया था लता ने।
बुधवार का दिन था। लता अपने कमरे में बैठी एक पुस्तक पढ़ रही थी। आरती उसके बेटे मोहित के कमरे में सफाई कर रही थी। अचानक किसी चीज के गिरने की आवाज आई। गर्दन घुमा कर लता ने बेटे के कमरे की तरफ देखा। आरती किसी चीज को साड़ी में लपेटकर कमर में ठूंँस रही थी। वह अवाक उसे देखे जा रही थी पर कुछ कहा नहीं। प्रतिदिन की तरह टाटा— बाय-बाय- करते हुए हंँसते-हंँसते हाथ हिलाते हुए आरती चली गई।
अगले दिन लता तैयार होकर विद्यालय चली गई। रह-रहकर उसकी आंखों के सामने वह दृश्य घूम जाता ।बार बार एक प्रश्न उसके मन में उठता -“आरती क्या ले गई?”
विद्यालय से लौटकर उसने मोहित के कमरे की अनगिनत चीजें हिलाकर –उठाकर –जानने की कोशिश की- आखिर वह क्या ले गई? हर वस्तु कमरे में यथास्थान थी। आरती शाम को काम पर नहीं आई। अगले दिन भी वह अनुपस्थित रही। संदेह विश्वास में बदल गया। लता ने अपने दरबान को उसके घर भेजा । उत्तर मिला -आरती घर पर नहीं है।
लता बेचैन हो उठी। रात्रि के भोजन के पश्चात लता ने बात शुरू करते हुए विकास से कहा-
“आज आरती आई नहीं।”
विकास-” वह भी तो इंसान है, कभी तो छुट्टी लेगी।”
लता-” बात वह नहीं है कुछ गड़बड़ है।”
विकास-क्या हुआ?
लता-“हूं—आरती परसों यानि बुधवार को जब मोहित का कमरा साफ कर रही थी उस समय मैंने उसे कमर में कुछ ठूंँसते हुए देखा था। वह कुछ ले गई है । मैंने सुनील को उसके घर भेजा था वह घर पर नहीं है। वह कल भी नहीं आई थी।
विकास-“और सिर चढ़ाओ। जो काम करना हो ,आरती करे। अब भुगतो!”पहले पता लगाओ क्या गायब है।”
लता-” मैंने अलमारी शेल्फ सब देख लिया है।”
विकास-“उसी समय उसे क्यों नहीं टोका?”
लता-“मैंने सपने में भी कभी नहीं सोचा था कि आरती कोई गलत काम कर सकती है।”
विकास-“खैर भूल जाओ। अब उसकी वापसी तो तुम्हारे घर होगी नहीं। तुम किसी और काम वाली को ढूंढना शुरू करो।”
लता के दिल और दिमाग में एक तूफान मचा हुआ था। एक तो अनुत्तरित प्रश्न था- क्या ले गई? दूसरे गत 14 वर्षों में आरती ने उसे जो आराम दिया वह दूसरा कोई देगा नहीं।
अगले दिन विद्यालय से जब लता घर लौटी तो आरती को दरवाजे के बाहर खड़ा पाया। क्रोध से लता का चेहरा लाल हो गया। विचित्र नजरों से उसने आरती को देखा।अपने बैग से चाबी निकाल दरवाजा खोला और अंदर प्रवेश किया। आरती एक कदम आगे बढ़ी और दहलीज पर आकर खड़ी हो गई।
आरती-“भाभी जी मुझसे एक गलती हो गई।”
लता- बड़ी निर्लज्ज है! गलती करके फिर यहां आकर खड़ी हो गई।
आरती-“भाभी जी मोहित भैया का कमरा जब साफ कर रही थी तो शेल्फ से उनका चश्मा नीचे गिर गया और टूट गया। मैं वह आंँचल में बांधकर दुकान पर ले गई। दुकानदार ने कागज मांगे। मैंने उससे कहा-जैसा दायाँ कांँच है वैसा ही बाँयां भी लगा दो। भाभी जी उसने कल नहीं दिया। मैं डर गई थी इसीलिए कल नहीं आई। सॉरी–भाभी जी”
आरती कहती जा रही थी और लता शर्मिंदगी और पश्चाताप के मिले-जुले भावों में बहती जा रही थी पश्चात्ताप के आंँसुओं की झड़ी नैनों के माध्यम से बह चली। आरती को लता ने गले से लगा लिया और फूट पड़ी। पश्चात्ताप के आंँसुओं के साथ आरती की वापसी के एहसास ने लता को राहत भी पहुंँचाई।

 

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