विदेशी आक्रांताओं को भयभीत करने वाले महान सम्राट खारवेल

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भारतीय इतिहास में वीरों की कमी नहीं रही है। कुछ राजा तो ऐसे हुए जिनके डर से विदेशी आक्रामणकारी इलाका छोड़कर भाग जाते थे। मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद एक ऐसा ही राजवंश का कलिंग में उदय हुआ था। इसका नाम था चेदि राजवंश इसी राजवंश के महापराक्रमी राजा थे खारवेल । सम्राट अशोक के हाथों बुरी तरह पराजय के बाद कलिंग ने खारवेल के जरिए महान राज्य का तमगा हासिल कर लिया। खारवेल का शासनकाल ईसा पूर्व 193 से 170 तक रहा था। ऐसा कहा जाता है कि ग्रीक आक्रमणकारी डिमिट्रियस खारवेल का नाम सुनकर भाग गया था। एनबीटी सुपर ह्यूमन सीरीज में आज इसी प्रतापी राजा की कहानी।
कलिंग का अपराजेय सम्राट
हाथीगुम्फा के अभिलेख से खारवेल के बारे में दुनिया को जानकारी मिली थी। 2000 साल तक इस महान राजा के बारे में कोई खास जानकारी नहीं थी। ओडिशा के भुवनेश्वर के उदयगिरी की पहाड़ियों में मिली इस गुफा के अभिलेख में खारवेल के बारे में जानकारी मिली है। खारवेल ने कलिंग की सेना को इतना मजबूत बनाया था कि दुश्मन राजा उसके नाम से कांपने लगते थे। खारवेल ने कई बड़े युद्धों को जीता। इसमें मगध, अंग, सातवाहन और पांड्यन साम्राज्य (मौजूदा में तमिलनाडु) पर विजय हासिल की और कलिंग को एक अपराजेय साम्राज्य बना दिया।
अशोक के वंशज को दी मात
अशोक ने जहां कलिंग में खारवेल के पूर्वज को हराकर विजय हासिल की थी। वहीं खारवेल ने अशोक के वंश को हराया था। मगध साम्राज्य के राजा पुष्यमित्र सुंगा ने खारवेल की पराधीनता स्वीकार की थी और कलिंग के साथ हो गए थे। इसके साथ ही पुष्यमित्र ने जैन तीर्थंकर महावीर की एक मूर्ति को कलिंग को वापस की थी। करीब दशक के अपने शासनकाल में खारवेल ने कई बड़े युद्ध जीते थे। उन्होंने इस दौरान उत्तर-पश्चिम भारत से लेकर सुदूर दक्षिण तक अपने राज्य का विस्तार कर लिया था।


बड़ी समुद्री ताकत बना कलिंग
खारवेल के समय में कलिंग बड़ी समुद्री ताकत भी था। समुद्र के रास्ते इसका श्रीलंका, म्यांमार, थाईलैंड, वियतनाम, कंबोडिया, मलेशिया जैसे देशों के साथ कारोबारी रिश्ते भी थे। सत्ता मिलने के दूसरे साल ही महाराजा खारवेल ने सातकर्णी राजाओं की परवाह किए बिना पश्चिम के राज्यों पर कब्जा करने के लिए बड़ी संख्या घोड़े, हाथी, पैदल सेना को भेज दिया था। अपने शासनकाल के आठवें साल में उन्होंने मगध पर आक्रमण किया था। खारवेल खुद को सभी धर्मों को मानने वाले बताते थे। गुफा में मिले अभिलेख के अनुसार, खारवेल एक उदारवादी धार्मिक राजा थे। हाथीगुम्फा में मिले शिलालेखों के अलावा उदयगिरी और खांडगिरी में ब्राह्मी लिपी और प्रकृति भाषा लिखे में कुछ शिलालेख मिले हैं जिसमें खारवेल के बारे में जानकारी है। माना जाता है कि अपने शासनकाल के अंतिम दिनों में उन्हें अपने पुत्र कुदेपसिरी को सत्ता सौंप दी थी।
डरकर भाग गया था ग्रीक आक्रमणकारी डिमिट्रियस!
खारवेल के बारे में कहा जाता है कि उसके शौर्य के किस्से सुनकर विदेशी आक्रमणकारी भाग गया था। हाथीगुम्फा के शिलालेख में लिखी शब्द को लेकर इतिहासकारों में मतभेद है। लेकिन शिलालेख की 8वीं पंक्ति में ग्रीक आक्रमणकारी डिमिट्रियस के मथुरा भाग जाने का जिक्र जरूर है। दरअसल, खारवेल के साहस और वीरता के किस्से डिमिट्रियस सुन चुका था। जैसे ही उसे भनक लगी कि खारवेल मथुरा की तरफ चढ़ाई के लिए आ रहे हैं। वह बिना युद्ध किए ही भाग गया।
महान राजा थे खारवेल
खारवेल के शासनकाल में कलिंग में कई बड़े निर्माण कार्य का भी जिक्र हाथीगुम्फा के शिलालेख में है। इसमें सिंचाई के लिए नहरें, युद्ध, संगीत, नृत्य आदि का बड़ा जिक्र मिलता है। हाथीगुम्फा पुरात्तत्व महत्व काफी अहम माना जाता है। अभिलेख के अनुसार कलिंग पर चेदि राजवंश का शासन हुआ करता था। इस अभिलेख के अनुसार, चेदि वंश के पहले शासक राजा महामेघवाहन थे। इसी राजवंश के तीसरे शासक थे खारवेल। इस महान राजा के बारे में अभी कम लोगों को जानकारी है। लेकिन खारवेल ने ईसा पूर्व दूसरी सदी में जिस तरह का शासन किया था वो न केवल बेहतरीन था बल्कि इतिहास के दस्तावेज में भी उसका खूब जिक्र है। वो इतिहास का दस्तावेज है हाथीगुम्फा के शिलालेख।

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