शरण मत दीजिए, समर्थ बनाइए, ऐसे ही सम्भव है आतंक का दमन

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त्योहारों का मौसम दस्तक दे चुका है और माँ दुर्गा के आगमन की तैयारियाँ भी शुरू हो चुकी हैं। कोरोना काल की दुश्वारियों के बीच भी उत्सव का उत्साह है और इस बीच नजर है कि तालिबान के आतंक राज में त्रस्त महिलाओं से हटती नहीं। स्थिति चाहे जैसी भी हो लेकिन हर हाल में खामियाजा औरतों को ही भुगतना पड़ता है। आतंक अपना नियन्त्रण स्थापित करने के लिए औरतों और बच्चों को ही हथियार बनाता है। बहुत से लोग कह सकते हैं कि आखिर तालिबान की स्थिति का भारत पर क्या असर होगा..सच तो यह है कि यह वह स्थिति है जिसे गम्भीरता से लिया जाना चाहिए। हम बेपरवाह नहीं हो सकते बल्कि अफगानिस्तान की जनता और खासकर महिलाओं के साथ खड़ा होना जरूरी है। आतंक को जड़ से समाप्त करना जरूरी है और जो इसे बढ़ावा दे रहा हो, उसका समूल विनाश आवश्यक है। हम भारतीय सौभाग्यशाली हैं कि हमने इस पावन माटी में जन्म लिया है, यह भारत माता वन्दनीय है जिसने सनातन काल से ही विश्व को समता और मानवता का पाठ पढ़ाया है परन्तु अब वह समय है जब भारत को बताना होगा कि अहंकार और आतंक का दमन कैसे किया जा सकता है। माँ महिषासुर मर्दिनी से यही प्रार्थना है कि वह अफगानिस्तान ही नहीं, विश्व के हर व्यक्ति का बल बनें जो आतंक और उत्पीड़न से जूझ रहा है। विश्व की तमाम स्त्रियों को ही नहीं, हर मनुष्य को अन्याय, अनाचार, अधर्म से लड़ने की शक्ति दें….समस्त दमनकारी शक्तियों का दमन करें…और विश्वास है कि यह होगा…अवश्य होगा..भारत ने विश्व बन्धुत्व की बात की है..यह समय है कि जब शरणागत की जगह समर्थ बनाने का अभियान चले। शरण देना किसी समस्या का स्थायी समाधान नहीं हैं, समर्थ बनाइए जिससे उत्पीड़न के विरुद्ध शस्त्र पीड़ित ही उठाए और विजयी बने…ऐसा होगा…माँ आश्छेन…।

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