शहर कोलकाता की इन सड़कों से रोज गुजरते हैं…नाम कैसे पड़े…क्या जानते हैं आप

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हर शहर की अपनी कहानी है। सड़कों और गलियों का अपना इतिहास है। जिन सड़कों से होकर हम गुजरते हैं…कभी सोचा है क्या आपने उनके बारे में…आखिर कैसे पड़ा उनका नाम…सूतानाटी, गोविन्दपुर और कलिकाता की कहानी तो अपनी जगह है मगर आज के इस शहर में जब हम सड़कों से गुजरते हैं तो इन सड़कों के इतिहास पर ध्यान नहीं जाता…भागम – भाग में हाथों से बहुत कुछ फिसला जा रहा है। शोध करते – करते, खोजते – खोजते जो भी जानकारी मिलती है, हम आपसे साझा करते हैं और इस बार की यह दिलचस्प जानकारी जुड़ी है कोलकाता की सड़कों के नाम से –
बड़तल्ला
बड़ाबाजार में बड़तल्ला या वटतल्ला का नाम तो आपने सुना है पर क्या आपने शायद ही कभी सोचा होगा कि एक वट वृक्ष के नाम पर किसी इलाके का नाम हो सकता है मगर इस इलाके के साथ ऐसा ही है। कभी यहाँ एक विशाल वट वृक्ष हुआ करता था और इसके तले चलता था किताबों का व्यवसाय।। पनप रहा था प्रकाशन उद्योग। हालाँकि वट तला साहित्य के स्तर को लेकर आलोचना खूब होती थी क्योंकि धार्मिक और श्रृंगारमूलक किताबें, पोथी ही यहाँ से छपती थीं…बाद में स्वयं बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय ने इसका महत्व समझा मगर वटतला बई अपने आप में इतिहास है और बड़तल्ला आज के बड़ाबाजार की बेहद व्यस्त गली।
बागबाजार
बागबाजार जगह तो बहुत पुरानी है मगर इसका नाम सुनकर आपको क्या बाग याद आता है…बाघ…? दिलचस्प बात यह है कि बाघ का बागबाजार से कोई लेना-देना नहीं है। बाग के अर्थ में उद्यान, जहां से नाम की उत्पत्ति हुई है। प्लासी के युद्ध से पहले पेरिनर्स गार्डन था, जो अंग्रेजों के लिए एक प्रमुख पर्यटन स्थल था। इस क्षेत्र की पहचान 1852 में हॉलवेल के विवरण 1874 के मिस्टर वुड के नक्शे में इस इलाके की पहचान बागबाजार के रूप में की गई है। आज जहाँ बागबाजार सार्वजनिन दुर्गोत्सव की दुर्गापूजा होती है…कभी वहाँ एक विशाल उद्यान या बाग ही हुआ करता था। यह बाग कैप्टन पेरिन का था और ‘पेरिन साहबेर बागान’ के नाम से मशहूर था और हुगली नदी के तट तक फैला था और नदी के तट पर बाजार रहा हो। इस बारे में पक्का कुछ भी कहना कठिन है मगर चारर्नाक के पहले यह पूरा इलाका सूतानाटी कहलाता था..यहाँ कई बाजार थे..अप्पजन के नक्शे (1794) में ओल्ड पाउडर मिल बाज़ार नामक बाज़ार का उल्लेख है। सम्भव है कि यही बाग और बाजार मिलकर आज के बागबाजार बन गये।
श्यामबाजार
श्यामबाजार कभी मशहूर बाजार हुआ करता था। जॉन जेफोनिया हॉलवेल ने इस बाजार का उल्लेख चार्ल्स बाजार के रूप में किया है। कहते हैं कि तत्कालीन प्रख्यात व्यवसायी शोभाराम बसाक ने अपने गृहदेवता श्यामराय (कृष्ण) के नाम पर इस बाजार का नाम रखा।
ग्रे स्ट्रीट
ग्रे स्ट्रीट कोलकाता की पहली पक्की सड़क है। इंग्लैंड के पूर्व प्रधानमंत्री चार्ल्स ग्रे के नाम पर सड़क का नाम पड़ा मगर इसका सम्बन्ध स्वाधीनता संग्राम से भी है। 8 मई 1908 को ऋषि अरविन्द जिस मकान से गिरफ्तार किये गये थे, ग्रे स्ट्रीट में आज भी वह घर है और अब यह अरविन्द सरणी कहलाता है।
हाथीबागान
1756 में नवाब सिराजुद्दौला ने कोलकाता पर आक्रमण किया और तब नवाब के हाथियों को जहाँ पर रखा गया था, आज वह जगह हाथीबागान के नाम से जानी जाती है।
चितपुर
काशीपुर इलाके में गंगा के तट पर चितपुर में है आदि चित्तेश्वरी दुर्गा मंदिर। आज जहाँ स्टैंड रोड है, कभी यहीं से बहती थी हुगली नदी…जंगल ही थे और थे डकैत, कहते हैं कि भागीरथी -हुगली नदी नदी में तैरते विशाल नीम के के पेड़ के तने से चित डकैत ने इस जयचंडी चित्तेश्वरी दुर्गा की प्रतिमा बनायी थी। बाद में मनोहर घोष नामक व्यक्ति ने चित्तेश्वरी दुर्गा का मंदिर स्थापित किया और माँ चित्तेश्वरी के नाम पर इस इलाके का नाम चितपुर पड़ा।
सोनागाछी
सोनागाछी इलाका अच्छी नजर से नहीं देखा जाता पर क्या आप जानते हैं कि इसका नाम सोनाउल्लाह गाजी नाम के पीरबाबा के नाम पर पड़ा है और कहते हैं कि इस इलाके में उनकी मजार भी है।
गारेनहाटा
गरानहाटा अब वह स्थान है जहाँ गरन लकड़ियों की नावों पर सामान लाद कर बेची और संग्रहीत की जाती थीं यानी यहाँ गोदाम हुआ करते थे…ये अनुमान है…सच पता चले तो हमें भी बताइएगा।
कुम्हारटोली
शोभाबाजार राजबाड़ी में दुर्गापूजा होती थी और तब यहाँ कुम्हारों को माँ की प्रतिमा बनाने के लिए कृष्णनगर से ले आया गया था। राजबाड़ी के पास उनके रहने की व्यवस्था की गयी थी और आज वही जगह कोलकाता की जान है….मतलब कुम्हारटोली।
ठनठनिया
कहते हैं कि इस इलाके में लोहे का काम होता था। दिन भर की ठन – ठन की आवाज से प्रेरित होकर इस जगह का नाम ही ठनठनिया पड़ गया। वहीं कुछ लोग कहते हैं कि बहुत पहले यहाँ डकैतों का उत्पात था, जब भी उनकी आहट मिलती, लोगों को सजग करने के लिए ठन -ठन करके मंदिर का घंटा बजाया जाता था…ठनठनिया काली बाड़ी यहाँ है। वहीं सुकुमार सेन लिखते हैं कि यहाँ की जमीन बंजर थी और कुदाल से मिट्टी खोदने पर ठन – ठन की आवाज आती थी इसलिए यह जगह बन गयी ठनठनिया।
बैठकखाना रोड
लालबाजार से पूर्व की ओर मराठा खात (बाद में सर्कुलर रोड और आज का ए जे सी बोस रोड) तक का इलाका कहलाता था बॉयटोकोना स्ट्रीट और इस नाम की उत्पत्ति बैठकखाना नाम से हुई है। तब इस इलाके में एक प्राचीन वट वृक्ष हुआ करता था जिसके नीचे व्यवसायी अपना माल – पत्तर लेकर बैठते थे। कहा जाता है, जॉब चार्नाक ने जब कलकत्ते को वाणिज्य केन्द्र के रूप में चुना, तब वे यहाँ आया करते थे। वुड के नक्शे में बैठकखाना के वटवृक्ष का उल्लेख है। इसके पूर्व की ओर जलाभूमि थी। 1794 में एरन एपजन के नक्शे में भी बैठकखाना का उल्लेख है मगर जो जगह दिखायी गयी है, वह आज का सियालदह स्टेशन है। आज बऊबाजार यानी विपिन बिहारी गांगुली स्ट्रीट से महात्मा गाँधी रोड तक का इलाका आज भी बैठकखाना रोड ही है। इस सड़क के दक्षिण की ओर जो राजबाड़ी है, वह भी बैठकखाना बाजार ही है।
बऊबाजार
आज का बीबीडी बाग (विनय – बादल – दिनेश बाग) से सियालदह तक यह इलाका फैला था। बाद में इसे बऊबाजार स्ट्रीट कहा जाने लगा। एक मान्यता के अनुसार विश्वनाथ मतिलाल ने अपनी पुत्रवधू के नाम पर एक बाजार लिख दिया था जो निर्मल चन्द्र स्ट्रीट में था। बाद में विकृत होकर बऊबाजार कहलाया लेकिन इतिहासकार इस व्यवसायी की पहचान नहीं कर सके हैं। एक और मान्यता के अनुसार इस इलाके में बहुत से बाजार होने के कारण यह इलाका बऊबाजार कहलाने लगा और बाद में विपिन बिहारी गांगुली स्ट्रीट नाम रखा गया।
लाल बाजार और बो बैरक
अमृतलाल बसु की आत्म स्मृति के अनुसार आज के लाल बाजार के सामने सेना की छावनी थी। सेना की छावनी के कारण ही इसे बो बैरक कहा गया।
लाल दीघी
जॉब चार्नाक के आगमन के पहले डिहि कलिकाता गाँव में लाल दीघी के अस्तित्व का उल्लेख मिलता है। लाल दीघी के पास सवर्ण रायचौधरी परिवार की कछारी के पास गृहदेवता श्याम राय मंदिर था। अनुमान है कि दोलजात्रा के उपलक्ष्य में रंग खेलने के बाद इस दीघी यानी जलाशय का रंग लाल हो उठता था इसलिए इसे लाल दीघी कहा जाने लगा। ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी ने यह काछारिबाड़ी पहले किराये पर ली और बाद में खरीद ली। वहीं कुछ लोग इस नाम के पीछे की वजह बताते हैं कि पास स्थित ओल्ड मिशन चर्च के लाल रंग की छाया इस जलाशय में पड़ने पर वह प्रतिबिम्बित होता था। यह भी कहा जाता है कि लाल चांद बसाक ने इस जलाशय का निर्माण करवाया था।
चौरंगी
आज जहाँ चौरंगी है, कभी घने जंगल हुआ करते थे। यहाँ तब तीन छोटे गाँव चौरंगी, बिरजी और कोलिम्बा थे। कहते हैं कि चौरंगी नाथ नाम के नाथ सम्प्रदाय के एक संन्यासी इस इलाके में रहते थे और उनके नाम पर ही इस जगह को चौरंगी कहा जाने लगा।
मलंगा लेन
इस इलाके में नमक के गोले बनते थे। नमक के कारोबारियों को मालंगी कहा जाता था और इसी से इस इलाके का नाम मलंगा पड़ गया।
शांखारिटोला
शंख बनाने के कारीगर यहाँ रहते थे तो इसे शांखारिटोला कहा जाने लगा।
सन्तोष मित्रा स्क्वायर
यह था नींबूतला माठ यानी मैदान। तब भुवन पाल ने यहाँ एक बाजार बसाया जो भुवन पालेर बाजार या नैड़ो गिरजा बाजार व नेबूतला बाजार के नाम से मशहूर हुआ। तब यहाँ पर नींबू के बहुत से पेड़ थे। कैरानी बागान के नाम का सम्बन्ध भी बहुत से लोग नींबू के पेड़ से जोड़ते हैं। इसके पहले इस इलाके को सेंट जेम्स स्क्वायर कहा जाने लगा और इसके बहुत पहले इस जगह का नाम था हजूरीमल टैंक। ये एक पंजाबी कारोबारी थी जिन्होंने 55 बीघा घहरा जलाशय खुदवाया इसलिए लोग इसे पद्मपुकुर या हजूरीमल टैंक कहते थे। बाद में तालाब भर दिया गया और बन गया मूचिपाड़ा थाना और कैरानी बागान क्योंकि तब इस बागान में कम्पनी के पुर्तगीज कैरानी रहा रहा करते थे। बाद में यही कैरानीबागान नींबूतला या लेबूतला माठ कहा जाने लगा। आज शहीद सन्तोष मित्र के नाम पर इसे सन्तोष मित्र स्क्वायर कहा जाता है।
टालीगंज
मेजर विलियम टेली ने 1775 -1776 में कोलकाता के साथ असम और पूर्व बंगाल को जोड़ने के लिए नाला खुदवाने और ड्रेजिंग का काम शुरू करवाया। तब ईस्ट इंडिया कम्पनी ने टेली को यह नाला देकर यातायात के लिए नौकाएं देकर टोल अदा और नाले के किनारे एक गंज या बाजार स्थापित करने की अनुमति दी थी। 1776 में यह काम पूरा हुआ और आम जनता के लिए इसे खोला गया। यह टाली नाला टेली के नाम पर टॉलीर नाला (अंग्रेजी में टेलिज कैनल ) कहा जाने लगा औऱ इनके द्वारा स्थापित बाजार टालीगंज कहा जाने लगा। नाले के पूर्व की ओर आज के टाली गंज रोड के पास कहीं यह बाजार हुआ करता था और बाद में इसके दोनों किनारों पर स्थित अंचल टालीगंज कहलाने लगा।
बालीगंज
1758 में अंग्रेजों ने मीरजाफर से डिहि पनच्चान्न यानी 55 गाँव खरीदे थे और उसी में से एक था बालीगंज। अनुमान है कि यहाँ बालू बिकती थी। 1800 से यह इलाका बालीगंज के नाम से ही मशहूर है।
पोस्ता
हुगली नदी पर पोस्ता घाट के नाम पर पोस्ता क्षेत्र का नाम रखा गया है। पुराने दिनों में, इस क्षेत्र में बंगाली व्यापारियों और बैंकरों का निवास था। उनके ऐश्वर्य और उनकी सम्पत्ति को लेकर बंगाल के इतिहास में किंवदंतियां हैं। उनमें से एक लक्ष्मीकांत धर उर्फ ​​नुकु धर थे। वह हुगली के पतन के बाद सूतानाटी आये और वहीं बस गये। ऐसा कहा जाता है कि उन्होंने मराठों के खिलाफ लड़ने के लिए अंग्रेजी शासकों को नौ लाख रुपये उधार दिए थे। उन्होंने नियमित रूप से रॉबर्ट क्लाइव को पैसे दिए। यह ज्ञात है कि जब नवकृष्ण देव उनके पास एक नौकरी की तलाश में आये थे, तो उन्होंने अंग्रेजी से नवकृष्ण देव को मिलवाया और उन्होंने उन्हें नौकरी दिलवायी। नुकु धर के पोते सुखमय राय को अपने दादा की संपत्ति विरासत में मिली। क्योंकि, उनकी माँ नुकु धर की एकमात्र संतान थीं और वह अपने दादा के एकमात्र पोते थे। जब अंग्रेज नुक्कड़ धर को ‘राजा’ की उपाधि देना चाहते थे तो नुकू धर ने अपने पोते को य़ह उपाधि को देने का अनुरोध किया। उनके अनुरोध पर, सुखमय रॉय ने राजा की उपाधि प्राप्त की और पोस्ता राजबाड़ी की स्थापना की। हालांकि, शहरी विकास और सड़क निर्माण के लिए महल के कुछ हिस्सों को अब ध्वस्त कर दिया गया है। तीन प्राचीन घर अब भी यहां हैं। ये हैं: राजबाड़ी, लालबाड़ी और ठाकुरबारी।

दमदम
बहुत से लोग दमदम नाम का सम्बन्ध फारसी और अरबी शब्द से जोड़ते हैं जहाँ इसे दमदमा कहा गया है, जिसका अर्थ ऊँचा टीला है। क्लाइव के आने से पहले ही क्लाइव हाउस था और उसके पास ऊँचा टीला भी है। यहाँ एएसआई खनन कार्य कर रही है। दमदम ऑर्डनेंस फैक्र्ट्री बाद में बनी।
तिरहट्टी
पहले यह आमड़ातला था। 1782 -83 में एडवर्ड टिरटो ने इस इलाके में बाजार बनाया औऱ इनके नाम ही तिरहट्टी बाजार नाम पड़ा।

स्त्रोत साभार – कोलकाता मेगा सिटी फेसबुक पेज

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