शिक्षकों के मनोविज्ञान और उनकी मनोदशा को समझा जाए

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सितम्बर का महीना शिक्षकों और हिन्दी के नाम रहता है। आज शिक्षक दिवस है और तरह – तरह के आयोजन हो रहे हैं। 5 सितम्बर ऐसा दिन है जब शिक्षकों की बात की जाती है, उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त की जाती है। कहने की जरूरत नहीं है कि विद्यार्थी इस दिन को बहुत उत्साह के साथ मनाते हैं मगर सवाल यह भी है कि शिक्षकों को समझने की जरूरत तो बनी हुई है और शिक्षक समझें, यह भी जरूरी है। आज के शिक्षक नागार्जुन के शिक्षक की तरह नहीं हैं, वह शिक्षक जो भुखमरी का शिकार हो गया। ऐसा नहीं है कि यह स्थिति अभी तक मिट गयी है मगर यह तो सच है कि शिक्षकों की जीवन शैली में सुधार आया है। परिवर्तन की यह गंगा अभी जमीनी स्तर पर नहीं पहुँची और शिक्षण भी एक सुनिश्चित सेटल जीवन की आकांक्षा पूरा करने वाला कार्यक्षेत्र ही अधिक रह गया है। विषमता तो हर ओर है और सत्य यह है कि शहर के शिक्षक गांवों में पढ़ाना नहीं चाहते और गांव के शिक्षक गांव में रहना नहीं चाहते। जो उच्च शिक्षा प्राप्त शिक्षक हैं, उनको स्कूलों में पढ़ाना अपनी शिक्षा की बर्बादी लगता है और वह हीनता बोध से ग्रस्त हैं। वस्तुतः शिक्षकों पर बढ़ते कार्यभार के बीच विद्यार्थियों के प्रति उनकी सोच को समझने की जरूरत है। तकनीक और किताबों के बीच संतुलन साधने की जरूरत है। जरूरी है कि शिक्षकों के मनोविज्ञान और उनकी मनोदशा को समझा जाए और उसके अनुरूप ही नीतियाँ बनायी जाएं। इससे भी ज्यादा जरूरी है कि हमारी शिक्षा व्यवस्था का आधार आंकड़ों पर नहीं जमीनी सच्चाई पर टिका हो तभी शिक्षा व्यवस्था मजबूत होगी। शिक्षक दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं

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