शिवभक्तिनी ममतामयी राजमाता महारानी अहिल्या बाई होल्कर

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अहिल्याबाई होल्कर इंदौर घराने की महारानी थी। अहिल्याबाई होल्कर अपने देश की सेवा, सादगी एवं मातृभूमि के लिए बहुत ही अच्छी साबित हुई। अहिल्याबाई एक स्त्री होने के कारण भी उन्होंने न केवल नारी जाति के विकास के लिए कार्य किए बल्कि समस्त पीड़ित जनता के लिए कार्य किया। अहिल्याबाई होल्कर की इसी कार्यप्रणाली को देख कर के वहां के लोग अहिल्याबाई होल्कर को अपना भगवान मानते थे। अहिल्याबाई होल्कर ने पीड़ित लोगों के लिए अपना संपूर्ण जीवन समर्पित कर दिया। अहिल्याबाई होल्कर एक प्रखर चरित्र वाली पतिव्रता स्त्री, उदय विचारों वाली महिला और ममतामयी विभूति थीं। अहिल्याबाई होल्कर का जन्म वर्ष 1735 ईस्वी में महाराष्ट्र राज्य के चौंढी नामक गांव में हुआ था। वह एक सामान्य से किसान की पुत्री थी। उनके पिता मान्कोजी शिन्दे के एक सामान्य किसान थे। सादगी और घनिष्ठता के साथ जीवन व्यतीत करने वाले मनकोजी की अहिल्याबाई एकमात्र अर्थात इकलौती पुत्री थी। अहिल्याबाई बचपन के समय में सीधी साधी और सरल ग्रामीण कन्या थी। अहिल्याबाई होल्कर भगवान में विश्वास रखने वाली औरत थी और वह प्रतिदिन शिवजी के मंदिर पूजन आदि करने आती थी।
आपको बता दें कि एक किसान की पुत्री अहिल्याबाई होल्कर किस प्रकार से इंदौर राज्य की महारानी बनी। इंदौर के महाराजा मल्हार राव होल्कर का वहां आना जाना लगा रहता था। एक बार मल्हार राव होल्कर पुणे जा रहे थे, वह विश्राम करने के लिए पादरी गांव के एक शिव मंदिर पर विश्राम करने के लिए रुके। उसी मंदिर पर अहिल्याबाई होल्कर प्रतिदिन पूजा अर्चना करनी आती थी।
अहिल्याबाई बहुत ही सुंदर उनके मुख मंडल पर देवी जैसा तेज और सादगी एवं सुलक्ष्णता थी। अहिल्याबाई होल्कर को देखकर मल्हार राव ने उन्हें अपनी पुत्रवधू बनाने का निश्चय किया। इस कारण उन्होंने अहिल्याबाई होल्कर के पिता से निवेदन किया। अहिल्याबाई होल्कर के लिए मल्हार राव होल्कर के पुत्र के विवाह प्रस्ताव को सुनकर के अहिल्या की पिता ने हां कर दिया। कुछ ही दिनों बाद अहिल्याबाई होल्कर का विवाह मल्हार राव होल्कर के पुत्र खंडेराव होल्कर के साथ हो गया। इस विवाह के संपन्न होने के बाद अहिल्याबाई अब एक ग्रामीण कन्या से इंदौर राज्य की महारानी बन गई। अहिल्याबाई होल्कर राजमहल पहुंचने के बाद भी उन्होंने अपनी पुराने जीवन की सादगी एवं सरलता को नहीं त्यागा। वह बहुत ही अच्छे विचारों वाली महिला थी। उनकी निष्ठा को देख कर के मल्हार राव होल्कर ने उन्हें शिक्षित बनाने के लिए उनके शिक्षा का प्रबंध उन्होंने घर पर ही कर दिया। अब अहिल्याबाई अशिक्षित अहिल्याबाई होल्कर से शिक्षित अहिल्याबाई हो गई। जब अहिल्याबाई ने अपने शैक्षणिक योग्यता प्राप्त कर ली, तब मल्हार राव होल्कर के द्वारा उन्हें राजकीय शिक्षा भी प्रदान कराया गया। मल्हार राव होल्कर अपने पुत्र की अपेक्षा अपनी पुत्रवधू पर अत्यधिक भरोसा करते थे। विवाह के कुछ वर्षों बाद अहिल्याबाई ने एक पुत्र और एक पुत्री को जन्म दिया। अहिल्याबाई होल्कर के पुत्र का नामकरण मल्हार राव होल्कर के द्वारा किया गया उन्होंने अहिल्याबाई होल्कर के पुत्र का नाम मालेराव तथा उनकी पुत्री का नाम मुक्ताबाई रखा। जब अहिल्याबाई ने अपने पुत्रों को जन्म दिया था, उस समय मराठी हिंदू राज्य की विस्तार में लगे हुए थे।  मराठा साम्राज्य के शासक अन्य राजाओं से चौथ वसूला करते थे किंतु भरतपुर के लोगों ने चौथ देने से मना कर दिया। इस बात से गुस्सा हो करके मल्हार राव ने अपने पुत्र खंडेराव होल्कर के साथ भरतपुर राज्य पर आक्रमण कर दिया। मल्हार राव होल्कर ने इस युद्ध में विजय तो प्राप्त कर ली परंतु उनके पुत्र खंडेराव होल्कर की मृत्यु हो गई। खंडेराव होल्कर की मृत्यु के बाद अहिल्याबाई होल्कर लगभग 29 वर्ष की उम्र में ही विधवा हो गयीं।


वह पति की मृत्यु के बाद स्वयं को समाप्त करना चाहती थी परंतु उनके ससुर ने उन्हें ऐसा करने से रोका। अहिल्याबाई होल्कर को व्यस्त रखने के लिए मल्हार राव होल्कर ने सारा राजपाट अहिल्याबाई होल्कर को सौंप दिया परंतु अहिल्याबाई होल्कर ने अपने 17 वर्ष के पुत्र मल्हार राव को सिंहासन पर बैठा दिया और स्वयं उनकी संरक्षिका बन कर उनका ध्यान रखती थी। इसी बीच उत्तर भारत में हो रहे एक अभियान में मल्हार राव ने सहभागिता की और इसी अभियान में कानवी पीड़ा के कारण महाराज मल्हार राव होल्कर की मृत्यु हो गयी।
अहिल्याबाई होल्कर के द्वारा किये गये कार्य
अहिल्याबाई होल्कर ने अपने पति और ससुर की मृत्यु हो जाने पर उनकी स्मृति में इंदौर राज्य तथा अन्य राज्यों में विधवाओं, अनाथो, अपंग लोगों के लिए आश्रम बनवाएं। अहिल्याबाई होल्कर ने ही कन्याकुमारी से लेकर हिमालय तक अनेक मंदिर, घाट, तालाब, दान संस्थाएं, भोजनालय, धर्मशालाएं, बावरिया इत्यादि का निर्माण करवाया। अहिल्याबाई होल्कर ने ही काशी के प्रसिद्ध मंदिर काशी विश्वनाथ और महेश्वर मंदिर तथा वहां पर स्थित घाटों को बनवाया।
इसके अतिरिक्त उन्होंने साहित्यकार कलाकार और गायकों को भी बढ़ावा दिया। अहिल्याबाई होल्कर ने अपने राज्य की रक्षा करने के लिए महिला सैन्य टुकड़ीया बनवायी तथा अनुशासित सैनिकों को भी रखा। इनके इन टुकड़ियों में ऐसे प्रशिक्षित सैनिक थे जिन्हें यूरोप और फ्रांसीसी शैली में प्रशिक्षण प्राप्त करवाया गया था। राव ने अपने पुत्र के लिए अहिल्याबाई को वधू चुन लिया।
इंदौर को एक छोटे से गाँव से बढ़ा कर आज जैसा स्वरुप देना हो या करीब तीस साल के शांतिपूर्ण शासन की व्यवस्था, राजमाता अहिल्याबाई होल्कर को कई चीजों के लिए याद किया जा सकता है। मल्हार राव होल्कर को उनपर जैसा भरोसा था, वो भी आश्चर्यजनक लग सकता है। उनकी एक चिट्ठी के हिस्से कई जगह उद्धृत होते रहते हैं, इसमें वो अहिल्याबाई को चम्बल पार कर के ग्वालियर की तरफ बढऩे के आदेश दे रहे होते हैं। चिट्ठी में बड़ी तोपों और उनका पर्याप्त गोला-बारूद रखने के आदेश हैं। कितनी देर रास्ते में रुका जा सकता है, वो तो बताया ही गया है, साथ ही रास्ते की निगरानी चौकियों की व्यवस्था भी दुरुस्त करने के आदेश हैं। उनकी तारीफ में एनी बेसेंट ने काफी लिखा है तो जवाहरलाल नेहरु भी अपनी डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया में उनकी प्रशंसा करते मिलते हैं। उनके दरबार में मराठी कवि मोरोपंत, संस्कृत के जानकार कौशली राम प्रश्रय पाते थे तो आनंदफंडी भी थे। अपने राज्य को शांतिपूर्ण शासन देने में उन्हें भले ही कामयाबी मिली हो, लेकिन ये दौर ऐसा था जब लगातार इस्लामिक आक्रमणों में मंदिर तोड़े गए थे। हिन्दुओं की स्थिति भारत में बहुत अच्छी नहीं थी। ऐसे दौर में राजमाता अहिल्याबाई होल्कर ने मंदिरों का पुन: निर्माण कराना शुरू करवाया। ये उनका राजकीय खर्च भी नहीं था, यानि प्रजा पर कर बढ़ा कर मंदिर नहीं बनवाए जा रहे थे। राजमाता की अपनी जमीनों से होने वाली आय से इन मंदिरों को बनवाया जाता था।
भारतीय संस्कृति कोश के मुताबिक उनके करवाए निर्माण काशी, गया, सोमनाथ, अयोध्या, मथुरा, हरिद्वार, कांची, अवन्ती, द्वारका, बद्रीनारायण, रामेश्वर और जगन्नाथपुरी में हैं। महाराष्ट्र और मालवा के क्षेत्र में उनके बनवाये सैंकड़ो तालाब और धर्मशालाएं भी हैं। शेरशाह सूरी की ही तरह कलकत्ता को काशी से जोडऩे वाली सड़क की मरम्मत भी उन्होंने करवाई थी। आज के तथाकथित इतिहासकार ग्रैंड ट्रंक रोड बनवाने का मुफ्त का श्रेय शेरशाह को दे देते हैं, जिसे उसने बनवाया भी नहीं था और महिला होने के कारण विदेशी परंपरा के निर्वाह के लिए राजमाता अहिल्याबाई होल्कर का नाम लेते समय हकलाने लगते हैं। भारत में तीन-चार सौ वर्ष पुराने जो भी मंदिर इस्लामिक आक्रमणों के बाद आज बचे दिखते हैं, करीब करीब हरेक के निर्माण में रानी अहिल्याबाई होल्कर का योगदान है।
अहिल्याबाई होल्कर की मृत्यु
अहिल्याबाई होल्कर की मृत्यु 13 अगस्त सन 1795 इस्वी को इंदौर राज्य में ही हुई था। अहिल्याबाई होल्कर की मृत्यु कब हुई थी, उस दिन की तिथि भाद्रपद कृष्णा चतुर्दशी थी।

(साभार – द सिम्पल हेल्प डॉट कॉम)

(भारतीय धरोहर डॉट कॉम)

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