शुभजिता दीपोत्सव – देवी लक्ष्मी के साथ गणपति और सरस्वती की पूजा

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 दीपावली का पर्व हर साल कार्तिक मास की अमावस्या को मनाया जाता है। इस बार ये तिथि 24 अक्टूबर, सोमवार को है। इस पर्व से जुड़ी कई परंपराएं पुरातन समय से चली आ रही है। हालांकि इन परंपराओं में आंशिक परिवर्तन जरूर आया है, लेकिन फिर ये आज भी अपना अस्तित्व बचाए हुए है। आज हम आपको दीपावली से जुड़ी कुछ ऐसी ही परंपराओं के बारे में बता रहे हैं और उनमें छिपे कारणों को भी.

देवी लक्ष्मी के साथ गणपति और सरस्वती की पूजा क्यों?
दीपावली पर देवी लक्ष्मी के साथ बुद्धि के देवता भगवान श्रीगणेश और ज्ञान की देवी सरस्वती की पूजा भी जरूर की जाती है। कारण ये है कि जब देवी लक्ष्मी धन लेकर आए तो उसे संभालने का ज्ञान भी हमारे पास होना चाहिए, ये ज्ञान हमें देवी सरस्वती से प्राप्त होता है और बुद्धि के उपयोग से उसे निवेश करना भी हमें आना चाहिए। ये बुद्धि हमें श्रीगणेश प्रदान करते हैं। इसलिए देवी लक्ष्मी के साथ श्रीगणेश और सरस्वती का विधान बनाया गया।

क्यों देवी लक्ष्मी को चढ़ाते हैं खील?
दीपावली पूजा में देवी लक्ष्मी को खील यानी धान का लावा विशेष रूप से चढ़ाया जाता है। खील चावल से बनती है और उत्तर भारत का प्रमुख अन्न भी है। फसल के रूप में इसे देवी लक्ष्मी को चढ़ाया जाता है। शुक्र ग्रह का प्रमुख धान्य भी चावल ही होता है। शुक्र ग्रह से शुभ फल पाने के लिए भी देवी लक्ष्मी को खील का भोग लगाया जाता है।

क्यों करते हैं दीपदान?
दीपावली के पांच दिनों में दीपदान की परंपरा भी प्रमुख है। इसके पीछे कारण है कि हम प्रकृति के निकट जाएं और उसे समझें। नदी का किनारा पितरों का स्थान माना गया है। यहां दीपक लगाने से पितृ प्रसन्न होते हैं और उनकी कृपा हम पर बनी रहती है। पवित्र नदियों या सरोवर में दीपदान करने से अशुभ ग्रह भी शांत होते हैं और हमें शुभ फलों की प्राप्ति होती है।

क्यों करते हैं झाड़ू की पूजा?
दीपावली पर लक्ष्मी पूजा के दौरान झाड़ू की पूजा भी जरूर की जाती है। इसके पीछे मनोवैज्ञानिक कारण है। झाड़ू से ही हम सुबह-शाम अपने घर को साफ करते हैं और गंदगी को बाहर निकालते हैं। झाड़ू से ही हमारे घर में साफ-सफाई बनी रहती है। जो वस्तु हमारे घर को साफ करने में सहायक होती है, दीपावली पर उसकी पूजा कर उसे धन्यवाद प्रेषित किया जाता है।

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